आगरा। गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी गिलियन-बैरे सिंड्रोम से पीड़ित 65 वर्षीय बुजुर्ग का एसएन मेडिकल कॉलेज में सफल उपचार किया गया। कई दिनों तक चली विशेषज्ञ चिकित्सा और गहन निगरानी के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट गया। इस सफलता ने एक बार फिर संस्थान की चिकित्सा क्षमता और विशेषज्ञता को सामने लाया है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में समय पर लिया गया सही निर्णय कई बार असंभव लगने वाली परिस्थितियों को भी बदल देता है। सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में सामने आया एक मामला इसका जीवंत उदाहरण बन गया है। यहां चिकित्सकों ने एक ऐसे बुजुर्ग मरीज को स्वस्थ जीवन लौटाने में सफलता हासिल की, जिसकी हालत अस्पताल पहुंचने के समय बेहद गंभीर थी और जिसके बचने की उम्मीदें लगातार कम होती जा रही थीं।
65 वर्षीय मरीज को अचानक शरीर में बढ़ती कमजोरी, चलने-फिरने में परेशानी और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत होने लगी थी। परिवार के लोग जब उसे उपचार के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे तो चिकित्सकीय जांच के दौरान उसकी स्थिति चिंताजनक पाई गई। विशेषज्ञों ने प्रारंभिक परीक्षणों और लक्षणों के आधार पर पाया कि मरीज गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस) नामक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित है।
चिकित्सकों के अनुसार यह बीमारी सामान्य तौर पर कम देखने को मिलती है, लेकिन जब यह गंभीर रूप धारण कर लेती है तो मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपनी ही नसों को नुकसान पहुंचाने लगती है। इसके परिणामस्वरूप हाथ-पैरों में कमजोरी बढ़ती जाती है और कई बार शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक इसका असर पहुंच जाता है।
मरीज के मामले में भी बीमारी तेजी से बढ़ रही थी। सबसे अधिक चिंता की बात यह थी कि श्वसन प्रणाली प्रभावित हो चुकी थी और मरीज स्वयं सांस लेने में सक्षम नहीं रह गया था। यह स्थिति किसी भी चिकित्सकीय टीम के लिए बड़ी चुनौती होती है क्योंकि ऐसे मामलों में थोड़ी सी देरी भी गंभीर परिणाम दे सकती है।
मरीज की नाजुक स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल आईसीयू में भर्ती किया गया। वहां वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. नवनीत अग्रवाल और डॉ. अतिहर्ष मोहन अग्रवाल के नेतृत्व में उपचार की विस्तृत योजना तैयार की गई। विशेषज्ञों ने निर्णय लिया कि मरीज को निरंतर निगरानी में रखते हुए उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
आईसीयू में भर्ती होने के बाद मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया, ताकि उसके शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे और श्वसन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। इसके साथ ही उसे इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (आईवीआईजी) थेरेपी दी गई। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार गिलियन-बैरे सिंड्रोम के गंभीर मामलों में यह थेरेपी बेहद प्रभावी मानी जाती है और रोग की प्रगति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उपचार के दौरान चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की टीम लगातार मरीज की निगरानी करती रही। हर घंटे उसकी शारीरिक स्थिति का आकलन किया गया। मेडिकल टीम का प्रयास था कि बीमारी के प्रभाव को जल्द से जल्द नियंत्रित किया जाए और मरीज के शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली को बहाल किया जा सके।
लगातार उपचार और देखरेख का सकारात्मक परिणाम सामने आने लगा। कुछ दिनों बाद मरीज की शारीरिक प्रतिक्रिया बेहतर होने लगी और शरीर उपचार का साथ देने लगा। चिकित्सकों ने धीरे-धीरे उसकी स्थिति में आ रहे बदलावों को दर्ज किया और उपचार को उसी अनुरूप आगे बढ़ाया।
करीब सात दिनों तक आईसीयू में रहने के बाद मरीज की स्थिति स्थिर हो गई। सांस लेने की क्षमता में सुधार आने लगा और अन्य शारीरिक गतिविधियां भी सामान्य होने लगीं। इसके बाद उसे आईसीयू से सामान्य वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उसकी रिकवरी प्रक्रिया जारी रही।
वार्ड में भर्ती रहने के दौरान भी चिकित्सकों ने नियमित रूप से मरीज की जांच की। स्वास्थ्य में लगातार सुधार होने पर मेडिकल टीम ने राहत महसूस की। कुछ समय बाद सभी आवश्यक चिकित्सकीय मानकों पर मरीज की स्थिति संतोषजनक पाए जाने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय लिया गया।
अस्पताल से डिस्चार्ज के समय मरीज और उसके परिजन भावुक दिखाई दिए। उन्होंने चिकित्सकों और पूरे मेडिकल स्टाफ के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जिस समय मरीज अस्पताल पहुंचा था, उस समय परिवार बेहद चिंतित था। लेकिन डॉक्टरों ने जिस तत्परता और संवेदनशीलता के साथ उपचार किया, उससे उन्हें लगातार भरोसा मिलता रहा।
परिजनों ने अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था और उपलब्ध सुविधाओं की भी सराहना की। उनका कहना था कि गंभीर बीमारी के बावजूद मरीज को समय पर सभी आवश्यक उपचार उपलब्ध कराए गए, जिससे उसकी जान बच सकी। उन्होंने डॉक्टरों की विशेषज्ञता और समर्पण को इस सफलता का सबसे बड़ा कारण बताया।
प्राचार्य एवं डीन डॉ. प्रशांत गुप्ता ने कहा कि संस्थान का लक्ष्य प्रत्येक मरीज को बेहतर और जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज में गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम चौबीसों घंटे कार्य कर रही है और आधुनिक चिकित्सा संसाधनों का लाभ मरीजों तक पहुंचाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि गिलियन-बैरे सिंड्रोम जैसे मामलों में समय पर पहचान, सटीक निदान और त्वरित उपचार सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस मरीज के मामले में पूरी टीम ने समन्वय के साथ कार्य किया, जिसका परिणाम सफल उपचार के रूप में सामने आया। यह उपलब्धि संस्थान की चिकित्सा दक्षता और टीमवर्क का प्रमाण है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अचानक हाथ-पैरों में कमजोरी, झनझनाहट, चलने में परेशानी या सांस लेने में दिक्कत महसूस हो तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है। समय पर उपचार मिलने से मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
एसएन मेडिकल कॉलेज की यह सफलता केवल एक मरीज के जीवन को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सरकारी चिकित्सा संस्थानों में जटिल और दुर्लभ बीमारियों का भी उच्च स्तर पर उपचार संभव है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की मेहनत, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों की बदौलत एक बुजुर्ग मरीज ने मौत के मुहाने से लौटकर नई जिंदगी की शुरुआत की है।
