आगरा। आगरा के नाई की मंडी स्थित प्राचीन वैष्णव पीठ श्री प्रेमनिधि मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन भाद्रपद कृष्ण नवमी पर पारंपरिक नंदोत्सव दधि-कांदो का आयोजन हुआ। जन्माष्टमी पर ठाकुर जी के प्राकट्य के बाद नंद बाबा और यशोदा मैया के घर छाए आनंद और उत्सव की लीला को मंदिर में भक्तिभाव के साथ जीवंत किया गया। बाल स्वरूप ठाकुर जी को सुसज्जित पालने में विराजमान कराया गया। वैष्णवजनों ने बाल गोपाल के दर्शन कर पालना झुलाया और बधाई पद गाए।
मंदिर परिसर नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की जैसे बधाई पदों और हवेली संगीत से गूंज उठा। उत्सव का विशेष आकर्षण पारंपरिक दधि-कांदो रहा, जिसमें हल्दी, दूध और दही के छिड़काव के बीच वैष्णवजन उल्लास में झूम उठे। नृत्य, संकीर्तन और बधाई गीतों के बीच पूरे मंदिर परिसर में गोकुल के नंदोत्सव जैसा वातावरण दिखाई दिया।

श्री प्रेमनिधि मंदिर में नंदोत्सव का आयोजन पुष्टिमार्गीय सेवा-मर्यादा और वात्सल्य भाव के अनुसार किया गया। जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण के प्राकट्य की खुशी मनाने के बाद अगले दिन नंदोत्सव के माध्यम से नंद बाबा और यशोदा मैया के घर हुए आनंद को उत्सव के रूप में मनाया गया। मंदिर में बाल स्वरूप ठाकुर जी को पालने में विराजमान कराया गया तो दर्शन के लिए पहुंचे वैष्णवजनों में विशेष उत्साह दिखाई दिया। भक्तों ने बाल गोपाल के दर्शन किए और पालना झुलाकर अपनी श्रद्धा और वात्सल्य भाव व्यक्त किया। इस दौरान मंदिर में लगातार बधाई पदों का गायन होता रहा।
‘नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ की गूंज के बीच मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय रहा। बधाई पदों के साथ हवेली संगीत ने उत्सव की पारंपरिकता को और गहरा किया। वैष्णवजन ठाकुर जी के बाल स्वरूप की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता अनुभव करते हुए उत्सव में शामिल हुए। मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं के लिए यह केवल दर्शन का अवसर नहीं रहा, बल्कि बाल स्वरूप प्रभु के प्रति वात्सल्य और प्रेम को व्यक्त करने का अवसर भी बना।
मंदिर के मुख्य सेवा अधिकारी हरि मोहन गोस्वामी और प्रभु के सेवा अधिकारी सुनीत गोस्वामी ने बताया कि पुष्टिमार्ग में नंदोत्सव का विशेष महत्व है। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के प्राकट्य के बाद नंद बाबा के घर हुए आनंदोत्सव को सेवा और भाव के माध्यम से मंदिर में अनुभव किया जाता है। ठाकुर जी के बाल स्वरूप के प्रति वात्सल्य भाव इस उत्सव का प्रमुख आधार है। भक्त प्रभु को बालक मानकर उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता अनुभव करते हैं। इसी भाव के साथ मंदिर में नंदोत्सव की परंपरा निभाई गई।
उत्सव के दौरान दधि-कांदो ने श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह पैदा किया। हल्दी, दूध और दही के छिड़काव के साथ वैष्णवजन उल्लास में झूमते नजर आए। बधाई गीतों और कीर्तन के बीच दधि-कांदो की पारंपरिक रस्म पूरी की गई। श्रद्धालुओं ने नृत्य और संकीर्तन के माध्यम से नंदोत्सव की खुशी मनाई। मंदिर परिसर में मौजूद लोग इस धार्मिक उत्सव के माहौल में शामिल होते रहे। दधि-कांदो के दौरान उमड़ा उल्लास नंदोत्सव की पारंपरिक छवि को सामने लाता रहा।
नंदोत्सव के दौरान मंदिर की सेवा-मर्यादा और आयोजन की परंपरा का भी विशेष ध्यान रखा गया। बाल स्वरूप ठाकुर जी के लिए पालना सजाया गया और उन्हें उसमें विराजमान कराया गया। इसके बाद वैष्णवजनों ने पालना झुलाया। जन्म की बधाइयों के पदों का गायन हुआ। हवेली संगीत के माध्यम से भी ठाकुर जी की सेवा और उत्सव को आगे बढ़ाया गया। मंदिर परिसर में मौजूद वैष्णवजन इन सभी आयोजनों में शामिल होते रहे और बधाई गीतों के साथ नंदोत्सव की खुशी मनाते रहे।
मंदिर प्रबंधक दिनेश पचौरी ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं। आयोजन के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए व्यवस्थाओं का ध्यान रखा गया। संपूर्ण आयोजन की व्यवस्था आशीष पचौरी, रानू, विशाल, राजेश धाकड़, राहुल, हर्षुल और सागर शिवहरे ने संभाली।
नंदोत्सव में मंदिर से जुड़े लोगों और वैष्णवजनों की सहभागिता रही। जन्माष्टमी के अगले दिन मनाए जाने वाले इस पारंपरिक उत्सव में ठाकुर जी के बाल स्वरूप के प्रति भक्तों का वात्सल्य भाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया। मंदिर में बधाई पदों, कीर्तन और हवेली संगीत की गूंज के बीच श्रद्धालु उत्सव में शामिल हुए। दधि-कांदो के दौरान दूध, दही और हल्दी के छिड़काव के साथ वातावरण उल्लास से भर गया। वैष्णवजनों ने नृत्य और संकीर्तन करते हुए नंदोत्सव की खुशी साझा की।
इस अवसर पर सुरेश पचौरी, महेश, मनीष अग्रवाल आदि मौजूद रहे। पूरे आयोजन में बाल स्वरूप ठाकुर जी की सेवा, बधाई गायन, पालना झुलाने और दधि-कांदो की परंपरा के माध्यम से जन्माष्टमी के बाद नंद बाबा के घर छाए आनंद को मंदिर में अनुभव किया गया। श्री प्रेमनिधि मंदिर में मनाया गया यह नंदोत्सव पुष्टिमार्गीय परंपरा, वात्सल्य भाव और भक्तों के उल्लास का संगम रहा।
