नई दिल्ली। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति अब भारत के ईंधन बाजार का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। कभी पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन अब इथेनॉल मिश्रण 20 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलेगा और कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी। दूसरी ओर, इस नीति को लेकर यह सवाल भी लगातार उठता है कि जब इथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी उत्पादन से जुड़े संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ेगा तो क्या चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ेगा? आम वाहन मालिक के लिए बड़ा सवाल यह भी है कि E20 पेट्रोल से माइलेज कितना बदलेगा और भविष्य में पेट्रोल-डीजल वाहनों की जगह कौन-से वाहन सड़क पर ज्यादा दिखाई देंगे।

पेट्रोल में कितना इथेनॉल मिल रहा है?
भारत ने इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल यानी EBP कार्यक्रम के तहत पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की मात्रा लगातार बढ़ाई है। 2013-14 में मिश्रण 1.5 प्रतिशत से भी कम था। इसके बाद 2022-23 में यह करीब 12.06 प्रतिशत, 2023-24 में 14.60 प्रतिशत और 2024-25 में 19.24 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2025-26 में नवंबर से जून के बीच औसत मिश्रण 20 प्रतिशत दर्ज किया गया। सरकार ने 20 प्रतिशत का लक्ष्य मूल रूप से 2030 के लिए रखा था, जिसे आगे बढ़ाकर Ethanol Supply Year 2025-26 कर दिया गया और भारत ने इसे लक्ष्य से पांच साल पहले हासिल कर लिया।
इसका सीधा मतलब यह है कि E20 पेट्रोल में मात्रा के हिसाब से लगभग 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार अब पेट्रोल की बिक्री अचानक 20 प्रतिशत कम कर देगी। पेट्रोल की जगह इथेनॉल का एक हिस्सा मिलाया जा रहा है। सरकार ने जुलाई 2026 तक 20 प्रतिशत से आगे नियमित राष्ट्रीय मिश्रण बढ़ाने का कोई निर्णय नहीं लिया है। इससे आगे जाने का फैसला वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन तथा वाहन निर्माताओं, तेल कंपनियों और शोध संस्थानों से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा।
इथेनॉल आखिर बनता किससे है?
भारत में इथेनॉल के लिए गन्ना प्रमुख फीडस्टॉक में से एक है, लेकिन यही पूरी कहानी नहीं है। गन्ने के रस, सिरप और शीरे के अलावा मक्का और चावल जैसे अनाज से भी इथेनॉल बनाया जाता है। सरकार ने चीनी मिलों को अतिरिक्त गन्ने और उपलब्ध फीडस्टॉक को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया है।
इथेनॉल उत्पादन की क्षमता भी तेजी से बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2013 में करीब 215 करोड़ लीटर की क्षमता से बढ़कर 31 अक्टूबर 2025 तक यह 1,953 करोड़ लीटर हो गई। 2026 में कुल उत्पादन क्षमता करीब 2,000 करोड़ लीटर तक पहुंचने की जानकारी सरकार ने दी है।
क्या गन्ना इथेनॉल में जाने से चीनी महंगी हुई?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी महंगी होने की एकमात्र वजह इथेनॉल नीति है। चीनी की कीमतों पर गन्ने की पैदावार, चीनी उत्पादन, मौसम, मिलों की लागत, घरेलू मांग, निर्यात नीति, सरकारी स्टॉक और बाजार की परिस्थितियों का भी असर पड़ता है।
हां, इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने या चीनी से जुड़े फीडस्टॉक का इस्तेमाल बढ़ने से चीनी और इथेनॉल के बीच संसाधनों का संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार Sugar Season 2022-23 में 43 लाख टन चीनी इथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई थी। 2023-24 में यह 24 लाख टन और 2024-25 में 34 लाख टन रही। सरकार ने यह व्यवस्था भी रखी है कि घरेलू खपत के लिए चीनी की उपलब्धता बनी रहे और इथेनॉल के लिए डायवर्जन की समय-समय पर समीक्षा की जाए।
यानी नीति का उद्देश्य केवल गन्ने को पेट्रोल में बदलना नहीं है, बल्कि चीनी उद्योग के अतिरिक्त उत्पादन, किसानों की आय और देश की ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाना है।
क्या फायदा?
इथेनॉल मिश्रण का सबसे बड़ा फायदा भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। भारत अपनी जरूरत के करीब 88.5 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में घरेलू स्तर पर बने इथेनॉल का हिस्सा बढ़ने से कुछ मात्रा में आयातित पेट्रोलियम की जरूरत कम होती है।
सरकार के अनुसार 2014-15 से मई 2026 तक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण 310 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल का प्रतिस्थापन हुआ और 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई। इसी अवधि में किसानों की अतिरिक्त आय 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। सरकार ने करीब 930 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन में कमी का भी अनुमान दिया है।
इसका अर्थ यह हुआ कि इथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल में मिलावट के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कृषि बाजार और पर्यावरण नीति के संयुक्त कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
आम वाहन मालिक पर क्या असर पड़ेगा?
E20 का सबसे सीधा असर वाहन के माइलेज पर पड़ सकता है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा घनत्व कम होता है। इसलिए समान दूरी के लिए कुछ वाहनों में ईंधन खपत बढ़ सकती है। सरकार ने भी माना है कि E20 पर पुराने E10-कैलिब्रेटेड चार-पहिया वाहनों में ईंधन दक्षता में मामूली कमी हो सकती है।
हालांकि E20 के लिए डिजाइन और कैलिब्रेट किए गए नए वाहनों में यह प्रभाव अलग हो सकता है। अप्रैल 2023 से E20 ईंधन के अनुरूप सामग्री अनुकूलता हासिल की जा चुकी थी और अप्रैल 2025 से E20-ट्यून्ड इंजन वाले वाहनों को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था।
सरकार के जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार 20 करोड़ से अधिक दोपहिया और तीन करोड़ से अधिक पेट्रोल कारें E15 से E20 मिश्रणों पर चल चुकी हैं और सरकार के अनुसार इथेनॉल मिश्रण से व्यापक स्तर पर इंजन खराब होने का सत्यापित प्रमाण नहीं मिला है।
क्या आगे पेट्रोल खत्म कर दिया जाएगा?
फिलहाल ऐसा कोई सरकारी फैसला नहीं है कि पेट्रोल को अचानक बंद कर दिया जाएगा। उलटे सरकार ने स्पष्ट किया है कि 20 प्रतिशत से ऊपर राष्ट्रीय स्तर पर इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। E85 यानी 85 प्रतिशत इथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल वाला ईंधन भी उपलब्ध कराया गया है, लेकिन यह सामान्य पेट्रोल के लिए नहीं, बल्कि विशेष रूप से प्रमाणित Flex Fuel Vehicles के लिए है।
इसलिए आने वाले वर्षों में एक साथ कई तरह के वाहन दिखाई देने की संभावना है—E20 पेट्रोल वाले सामान्य पेट्रोल वाहन, Flex Fuel Vehicles, हाइब्रिड वाहन, इलेक्ट्रिक वाहन और कुछ क्षेत्रों में CNG जैसे वैकल्पिक ईंधन वाले वाहन।
भविष्य में कौन-से वाहन बढ़ेंगे?
भविष्य का ऑटोमोबाइल बाजार केवल पेट्रोल या केवल इलेक्ट्रिक पर निर्भर रहने वाला नहीं दिखता। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सरकार PM E-DRIVE जैसी योजनाएं चला रही है। जुलाई 2026 के सरकारी डैशबोर्ड के अनुसार PM E-DRIVE के तहत 2025-26 में 12.61 लाख से अधिक ई-वाहनों का पंजीकरण दर्ज किया गया था, जिनमें बड़ी संख्या इलेक्ट्रिक दोपहिया और तीनपहिया वाहनों की रही।
यानी शहरों में इलेक्ट्रिक स्कूटर, ई-रिक्शा और इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। लंबी दूरी और भारी वाहनों में तकनीक के विकास के साथ इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड, वैकल्पिक ईंधन और भविष्य में अन्य कम-कार्बन तकनीकों का मिश्रण देखने को मिलेगा।
पर्यावरण को कितना फायदा?
इथेनॉल को नवीकरणीय ईंधन माना जाता है और पेट्रोल में इसका मिश्रण जीवाश्म ईंधन की मांग को कुछ हद तक कम कर सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 से जुलाई 2025 तक इथेनॉल मिश्रण से करीब 736 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन में कमी आई। इसे सरकार ने करीब 30 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर पर्यावरणीय लाभ के रूप में बताया है।
लेकिन पर्यावरणीय लाभ को भी संतुलित नजर से देखना होगा। इथेनॉल उत्पादन में पानी, खेती की जमीन, ऊर्जा और परिवहन संसाधनों की जरूरत होती है। इसलिए भविष्य की नीति में केवल पेट्रोल में इथेनॉल बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; अनाज, कृषि अवशेष और दूसरी गैर-खाद्य जैविक सामग्री से दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।
आम जनता के लिए असली तस्वीर क्या है?
आम उपभोक्ता के लिए इस नीति के तीन सीधे मायने हैं। पहला, पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी अब 20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, इसलिए E20-संगत वाहन खरीदना भविष्य की जरूरतों को देखते हुए महत्वपूर्ण होगा। दूसरा, पुराने वाहन में माइलेज और निर्माता की E20 compatibility की जानकारी देखना जरूरी है। तीसरा, इथेनॉल नीति से पेट्रोल पंप पर पेट्रोल की कीमत अपने आप 20 प्रतिशत कम नहीं होगी, क्योंकि पेट्रोल की खुदरा कीमत में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, टैक्स, रिफाइनिंग, परिवहन और अन्य लागत शामिल होती हैं।
दूसरी ओर, किसानों और चीनी उद्योग के लिए इथेनॉल एक अतिरिक्त बाजार बन गया है। सरकार के अनुसार 2014-15 से जून 2025 तक इथेनॉल फीडस्टॉक के लिए किसानों को करीब 1.21 लाख करोड़ रुपये का भुगतान हुआ था।
इस पूरी नीति का सबसे बड़ा सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि पेट्रोल में कितना इथेनॉल मिलाया जा रहा है, बल्कि यह है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा, किसान आय, चीनी की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण—इन सभी के बीच संतुलन कैसे बनाएगा।
फिलहाल तस्वीर साफ है: E20 भारत की मौजूदा पेट्रोल नीति का हिस्सा बन चुका है, पेट्रोल बंद करने का कोई फैसला नहीं है और 20 प्रतिशत से आगे जाने पर अभी कोई राष्ट्रीय निर्णय नहीं हुआ है। आगे का रास्ता इलेक्ट्रिक वाहनों, हाइब्रिड, Flex Fuel और अन्य वैकल्पिक ईंधनों के साथ मिश्रित परिवहन व्यवस्था की ओर जाता दिखाई दे रहा है। यही बदलाव आने वाले वर्षों में वाहन बाजार, किसानों, चीनी उद्योग और आम उपभोक्ता—सभी पर असर डालने वाला है।
आगरा में 8,857 इलेक्ट्रिक वाहन, पेट्रोल वाहनों की संख्या लाखों में; E20 से बदल सकता है सफर का तरीका
आगरा। पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 को लेकर देशभर में चर्चा के बीच आगरा के वाहन बाजार की तस्वीर भी तेजी से बदल रही है। जिले में इलेक्ट्रिक वाहनों की मौजूदगी बढ़ रही है, वहीं पेट्रोल से चलने वाले प्रमुख वाहन वर्गों में दोपहिया और कारों की संख्या लाखों में है। उपलब्ध वाहन पंजीकरण आंकड़ों के अनुसार आगरा में ई-रिक्शा और ई-रिक्शा विद कार्ट मिलाकर 8,857 इलेक्ट्रिक वाहन दर्ज हैं। दूसरी ओर मोटरसाइकिल, स्कूटर, मोपेड और कार जैसे प्रमुख वाहन वर्गों की संख्या सात लाख से अधिक है।
आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 5,86,554 मोटरसाइकिल और स्कूटर दर्ज हैं। इसके अलावा 10,250 मोपेड, 5,695 मोटर कैब और 1,54,108 मोटर कार पंजीकृत हैं। मोटरसाइकिल और स्कूटर के अन्य दर्ज वर्गों को जोड़ने पर दोपहिया वाहनों की संख्या और बढ़ जाती है। हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड में प्रत्येक वाहन के साथ उसका ईंधन प्रकार अलग से दर्ज नहीं है, इसलिए इन सभी वाहनों को सीधे पेट्रोल वाहन या E20-compatible वाहन घोषित करना उचित नहीं होगा।
इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 8,857
उपलब्ध रिकॉर्ड में इलेक्ट्रिक श्रेणी के तौर पर E-Rickshaw (Passenger) के 7,074 और E-Rickshaw with Cart (Goods) के 1,783 वाहन दर्ज हैं। दोनों को मिलाने पर संख्या 8,857 होती है। यह आंकड़ा बताता है कि आगरा में खासकर सार्वजनिक और माल ढुलाई से जुड़े छोटे परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों की मौजूदगी दर्ज हो चुकी है।
ई-रिक्शा और पेट्रोल वाहनों के बीच बड़ा अंतर यह है कि इलेक्ट्रिक वाहन पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल पर निर्भर नहीं होते। इसलिए E20 नीति का सीधा असर इलेक्ट्रिक वाहनों के ईंधन पर नहीं पड़ता। इन वाहनों के लिए बैटरी, चार्जिंग व्यवस्था और बिजली की उपलब्धता ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।
पेट्रोल वाहनों पर E20 का सवाल
आगरा में सबसे बड़ा वाहन वर्ग मोटरसाइकिल और स्कूटर का है। रिकॉर्ड में 5.86 लाख से अधिक M-Cycle/Scooter दर्ज हैं। इसके बाद मोटर कारों की संख्या 1.54 लाख से अधिक है। मोपेड और मोटर कैब को जोड़ने पर पेट्रोल आधारित व्यक्तिगत और व्यावसायिक परिवहन का संभावित आधार और बड़ा दिखाई देता है।
यहीं E20 पेट्रोल का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ वाहन की E20 compatibility महत्वपूर्ण होगी। हालांकि उपलब्ध जिलेवार वाहन आंकड़े केवल वाहन वर्ग और संख्या बताते हैं, उनमें यह जानकारी नहीं है कि कौन-सा वाहन E10, E20 या किसी अन्य ईंधन मिश्रण के लिए प्रमाणित है। इसलिए केवल पंजीकरण आंकड़ों के आधार पर E20-compatible वाहनों की सटीक संख्या बताना संभव नहीं है।
आम वाहन मालिक के लिए क्या मायने?
आगरा में बड़ी संख्या में दोपहिया और कारें होने के कारण E20 नीति का प्रभाव आम वाहन मालिकों तक पहुंचना स्वाभाविक है। नए वाहन खरीदने वालों के लिए वाहन निर्माता द्वारा दी गई E20 compatibility की जानकारी महत्वपूर्ण होगी। पुराने वाहन मालिकों के लिए भी यह देखना जरूरी होगा कि उनका वाहन किस इथेनॉल मिश्रण के लिए डिजाइन किया गया है।
दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या यह संकेत देती है कि शहर का परिवहन धीरे-धीरे एक ही ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तकनीकों की ओर बढ़ रहा है। एक तरफ E20 पेट्रोल वाले वाहन होंगे, तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक वाहन और आगे चलकर हाइब्रिड तथा अन्य वैकल्पिक ईंधन वाले वाहन भी परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं।
आगरा के उपलब्ध आंकड़े फिलहाल एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं 8,857 इलेक्ट्रिक वाहन दर्ज हैं, जबकि मोटरसाइकिल-स्कूटर और मोटर कार जैसे प्रमुख वाहन वर्गों की संख्या 7.40 लाख से अधिक है।
इसलिए E20 को लेकर आगरा में असली बदलाव केवल पेट्रोल के मिश्रण तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में वाहन खरीदने का फैसला करते वक्त लोग ईंधन की कीमत के साथ वाहन की तकनीक, E20 compatibility, माइलेज, रखरखाव और इलेक्ट्रिक विकल्पों को भी देखेंगे।
