नई दिल्ली। त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले एक महीने में खुदरा बाजार में चीनी का भाव 48.18 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। कई स्थानों पर यही चीनी 70 रुपये किलो तक बिक रही है। कीमतों पर नियंत्रण के लिए सरकार ने आयात बढ़ाने, कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा लगाने और नई फसल की पेराई जल्द शुरू कराने की तैयारी की है। 10 लाख टन चीनी का शुल्क-मुक्त आयात किया जा रहा है। 30 नवंबर तक कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा लागू है जबकि एक सितंबर से थोक उपभोक्ता अपनी 15 दिन की खपत से अधिक चीनी नहीं रख सकेंगे। सरकार का कहना है कि अक्टूबर में पेराई शुरू होने तक घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और बढ़ी कीमतों के लिए एथेनॉल नीति को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। इस बीच 2026-27 के वैश्विक बाजार में करीब 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान है। घरेलू उत्पादन का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन से घटकर 306 लाख टन रह गया है। गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर रोग के साथ अत्यधिक बारिश से जलभराव को उत्पादन में कमी की प्रमुख वजह बताया गया है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने और नई पेराई अक्टूबर में शुरू होने के बीच अगले डेढ़-दो महीने बाजार के लिए अहम रहने वाले हैं।

त्योहारों की खरीदारी से पहले बढ़ा चीनी का खर्च
चीनी की कीमत में अचानक आई तेजी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है। आम तौर पर त्योहारों के दौरान मिठाई और दूसरे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने से चीनी की खपत भी बढ़ जाती है। ऐसे समय में खुदरा भाव में करीब 17 रुपये प्रति किलो की वृद्धि उपभोक्ताओं के लिए अतिरिक्त खर्च का कारण बन रही है।
खुदरा बाजार में 65 रुपये किलो का भाव कई जगह सामान्य हो चुका है जबकि कुछ बाजारों में 70 रुपये किलो तक बिक्री की जानकारी सामने आई है। यानी जिस वस्तु की कीमत कुछ समय पहले 50 रुपये से कम थी वह अब कई जगह काफी महंगी हो गई है। आने वाले दिनों में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहार होने के कारण बाजार में मांग और बढ़ने की संभावना है।
सरकार ने तीन मोर्चों पर शुरू की तैयारी
कीमतों में तेजी को रोकने के लिए सरकार ने एक साथ तीन स्तरों पर काम शुरू किया है। पहला कदम बाजार में तत्काल उपलब्धता बढ़ाना है। इसके लिए शुल्क-मुक्त आयात का रास्ता अपनाया जा रहा है। दूसरा कदम जमाखोरी पर नियंत्रण का है। तीसरे स्तर पर नई फसल की पेराई जल्द शुरू कराने की कोशिश की जा रही है ताकि घरेलू उत्पादन बाजार में जल्दी पहुंच सके।
सरकार का उद्देश्य नई फसल आने तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में चीनी बनाए रखना है। इससे त्योहारों के दौरान अचानक आपूर्ति का दबाव बढ़ने से कीमतों में और तेजी आने की आशंका को कम किया जा सकेगा।
जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा
चीनी की उपलब्धता पर निगरानी बढ़ाने के लिए कारोबारियों के स्टॉक की सीमा तय की गई है। 30 नवंबर तक कारोबारी अधिकतम 400 टन चीनी का स्टॉक रख सकेंगे। इसके अलावा एक सितंबर से थोक उपभोक्ताओं के लिए भी सीमा लागू होगी। वे अपनी 15 दिन की खपत से अधिक चीनी अपने पास नहीं रख पाएंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार में कृत्रिम कमी पैदा होने से रोकना है। केंद्र और राज्यों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में उपलब्ध स्टॉक का भौतिक सत्यापन भी करेंगी। इससे कागजों में दर्ज स्टॉक और वास्तविक उपलब्धता के बीच अंतर की जांच की जा सकेगी।
10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से तत्काल आपूर्ति बढ़ेगी
बाजार में तुरंत चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन चीनी का शुल्क-मुक्त आयात किया जाएगा। वैश्विक बाजार में भी इस समय कमी का अनुमान है। वर्ष 2026-27 में दुनिया में करीब 33 लाख टन चीनी की कमी रहने की संभावना जताई गई है। देश में 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात किया जा रहा है।
आयात के जरिए घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाने की कोशिश है ताकि नई फसल आने तक कीमतों पर दबाव कम किया जा सके। अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण खपत बढ़ने वाली है। ऐसे में आयात को बाजार की तत्काल जरूरत पूरी करने के उपाय के रूप में देखा जा रहा है।
चीनी उत्पादन में करीब 37 लाख टन की कमी
भारत में सामान्य तौर पर हर साल 320 से 340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है। इसके मुकाबले घरेलू जरूरत लगभग 280 से 290 लाख टन रहती है। उत्पादन और खपत के बीच अंतर के कारण सामान्य परिस्थितियों में 40 से 50 लाख टन का स्टॉक बचा रहता है। यही अतिरिक्त मात्रा बाजार को अचानक आने वाली कमी से सुरक्षा देती है।
इस बार उत्पादन घटने का असर उपलब्ध स्टॉक पर भी पड़ा है। मौजूदा चीनी सत्र में शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन उत्पादन का था। बाद में यह अनुमान घटकर लगभग 306 लाख टन रह गया। यानी पहले लगाए गए अनुमान की तुलना में करीब 37 लाख टन कम उत्पादन की संभावना है।
गन्ने की बीमारी और बारिश ने घटाई पैदावार
उत्पादन में कमी के पीछे गन्ने में लगने वाले रेड रॉट और टॉप बोरर रोग को प्रमुख कारण बताया गया है। इन रोगों के कारण गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई। इसके अलावा अत्यधिक बारिश से खेतों में जलभराव की स्थिति बनी। लंबे समय तक पानी जमा रहने से भी गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा और उत्पादन घटा।
कम उत्पादन का असर चीनी मिलों तक पहुंचने वाली गन्ने की मात्रा पर भी पड़ता है। यही वजह है कि बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी है और सरकार नई पेराई जल्दी शुरू कराने की कोशिश कर रही है।
अक्टूबर की पेराई पर टिकी बाजार की उम्मीद
नई पेराई अक्टूबर में शुरू होने की उम्मीद है। इससे पहले अगस्त से नवंबर तक त्योहारों का दौर चलेगा। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली के दौरान मिठाई तथा खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने से चीनी की खपत में भी इजाफा होगा। दूसरी ओर नई फसल की चीनी बाजार में आने में अभी समय है।
ऐसे में आने वाले डेढ़ से दो महीने बाजार के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सरकार की कोशिश है कि आयात और स्टॉक नियंत्रण के जरिए इस अवधि में पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे और नई पेराई शुरू होने के बाद घरेलू बाजार को अतिरिक्त उत्पादन का सहारा मिल सके।
एथेनॉल नीति पर सरकार ने दिया स्पष्टीकरण
चीनी की कीमतों में तेजी के बीच एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने इस कारण को कीमत बढ़ने की वजह मानने से इनकार किया है। सरकार के मुताबिक वर्ष 2022-23 में एथेनॉल के लिए चीनी का 12 प्रतिशत हिस्सा डायवर्ट किया गया था। अब यह हिस्सा घटकर नौ प्रतिशत रह गया है।
सरकार का यह भी कहना है कि देश में बनने वाले एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज और खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है। इसलिए चीनी से एथेनॉल उत्पादन के कारण घरेलू बाजार में मौजूदा कमी पैदा होने की बात को सरकार स्वीकार नहीं कर रही है।
उपभोक्ताओं के लिए अगले दो महीने अहम
चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के बीच सबसे ज्यादा नजर खुदरा बाजार पर रहेगी। त्योहारों की बढ़ती मांग, उत्पादन में कमी और अक्टूबर में नई पेराई शुरू होने के बीच सरकार के कदम यह तय करेंगे कि बाजार में कीमतों पर कितना दबाव रहता है।
आयात से अतिरिक्त चीनी उपलब्ध कराने, स्टॉक सीमा के जरिए जमाखोरी रोकने और मिलों में भौतिक सत्यापन कराने के फैसलों का असर आने वाले दिनों में दिखाई दे सकता है। सरकार की चुनौती यह है कि त्योहारों की बढ़ी हुई मांग के बीच बाजार में पर्याप्त चीनी बनी रहे और उपभोक्ताओं को बढ़ी कीमतों का अतिरिक्त बोझ न उठाना पड़े।

