आगरा। फतेहपुर सीकरी क्षेत्र की करीब 3,000 से 7,000 वर्ष पुरानी रॉक पेंटिंग्स के संरक्षण का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इनके संरक्षण की अनुमति दे दी है। टेक्निकल इवैल्यूएशन समिति की बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया। इन प्राचीन शैल चित्रों में दंतिला हाथी (Tusked Elephant), बाघ, हिरण, नीलगाय, सांड, मानव और वनस्पति के चित्र मिले हैं। शिकार के दृश्य भी इन रॉक पेंटिंग्स में दर्ज हैं। वहीं रसूलपुर की पहाड़ियों में जटिल अल्पना शैली की ज्यामितीय और प्रतीकात्मक रॉक आर्ट भी पाई गई है। इनके संरक्षण से आगरा को प्राचीन मानव जीवन से जुड़ी विरासत के रूप में नई पहचान मिलने और क्षेत्र में एक नए पर्यटन स्थल के विकसित होने की उम्मीद जगी है।

इन रॉक पेंटिंग्स को हजारों वर्ष पुराने मानव जीवन का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है। शैल चित्रों में तत्कालीन मानव जीवन, उसकी गतिविधियों और प्रकृति के प्रति उसके संबंधों की झलक दिखाई देती है। इनमें बनाए गए पशु, मानव, वनस्पति और शिकार के दृश्य उस दौर के जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। विशेष रूप से दंतिला हाथी का चित्र इस प्राचीन शैल कला को अलग पहचान देता है। बाघ, हिरण, नीलगाय और सांड जैसे पशुओं के चित्र भी उस समय के प्राकृतिक परिवेश और मानव जीवन के संबंधों की ओर संकेत करते हैं।

फतेहपुर सीकरी क्षेत्र के रसूलपुर की पहाड़ियों में मिली रॉक आर्ट में जटिल अल्पना भी शामिल है। इनमें ज्यामितीय और प्रतीकात्मक आकृतियां दिखाई देती हैं। इस प्रकार यहां मिली शैल कला केवल पशु और मानव आकृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उस समय की कल्पना, प्रतीकों और कलात्मक अभिव्यक्ति के भी प्रमाण मिलते हैं। विशेषज्ञों के लिए यह सामग्री प्रागैतिहासिक मानव के जीवन और उसकी रचनात्मकता को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

इन शैल चित्रों को लेकर लंबे समय से संरक्षण की जरूरत महसूस की जा रही थी। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने इन्हें संरक्षण दिलाने के लिए करीब आठ वर्षों तक प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़े तत्कालीन मंत्री प्रहलाद पटेल और मीनाक्षी लेखी तथा वर्तमान मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को कई बार ज्ञापन दिए। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक से भी दो बार मुलाकात कर रॉक पेंटिंग्स के महत्व और इनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जानकारी दी।
डॉ. भट्टाचार्य ने इन प्राचीन शैल चित्रों के संरक्षण के लिए सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया। इसके अलावा विभिन्न विभागों और कार्यालयों में कई बार संपर्क किया गया। उन्होंने इस विरासत को संरक्षित कराने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री को भी कई बार पत्र लिखे। लगातार किए गए इन प्रयासों के बाद अब ASI की टेक्निकल इवैल्यूएशन समिति की बैठक में संरक्षण से संबंधित प्रस्ताव पारित होने की सूचना मिली है। इससे रॉक पेंटिंग्स के संरक्षण की दिशा में आगे की प्रक्रिया शुरू होने का रास्ता खुल गया है।
संरक्षण की अनुमति मिलने की सूचना के बाद इस प्रयास से जुड़े लोगों में खुशी है। करीब आठ वर्षों से प्राचीन शैल चित्रों के संरक्षण की मांग को लेकर प्रयास कर रहे डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उनका कहना है कि हजारों वर्ष पुराने इन शैल चित्रों का संरक्षण केवल कुछ चित्रों को बचाना नहीं है, बल्कि यह प्राचीन मानव जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाणों को सुरक्षित रखने का प्रयास है। इनके संरक्षण से आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राचीन विरासत को देख और समझ सकेंगी।
फतेहपुर सीकरी पहले से ही ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। ऐसे में क्षेत्र में मौजूद हजारों वर्ष पुराने रॉक पेंटिंग्स का संरक्षण होने से इसकी पहचान को एक नया आयाम मिल सकता है। वर्तमान में फतेहपुर सीकरी का पर्यटन मुख्य रूप से मुगलकालीन स्थापत्य और ऐतिहासिक स्मारकों से जुड़ा है, लेकिन रॉक पेंटिंग्स के संरक्षण और उनके व्यवस्थित विकास से यहां पर्यटन का एक नया स्वरूप सामने आ सकता है। इससे प्राचीन इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित किया जा सकता है।
इन रॉक पेंटिंग्स में दर्ज मानव, पशु, वनस्पति और शिकार के दृश्य उस समय के जीवन की तस्वीर सामने रखते हैं। करीब तीन से सात हजार वर्ष पुराने माने जा रहे इन चित्रों के संरक्षण से आगरा के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ सकता है। रसूलपुर की पहाड़ियों में मौजूद ज्यामितीय और प्रतीकात्मक शैल कला इस विरासत को और महत्वपूर्ण बनाती है। यदि संरक्षण के बाद इन स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाता है तो स्थानीय स्तर पर भी लोगों को रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर मिल सकते हैं।
ASI की अनुमति और टेक्निकल इवैल्यूएशन समिति में प्रस्ताव पारित होने के बाद अब उम्मीद है कि इन रॉक पेंटिंग्स के संरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हजारों वर्ष पुराने इन शैल चित्रों को सुरक्षित रखने से आगरा को प्राचीन मानव सभ्यता और शैल कला से जुड़ी एक नई पहचान मिल सकती है। साथ ही फतेहपुर सीकरी के पर्यटन मानचित्र में एक नया स्थल जुड़ने की संभावना भी मजबूत हुई है। लंबे समय से संरक्षण की मांग कर रहे लोगों के लिए यह सूचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि करीब आठ वर्षों के प्रयास के बाद इन प्राचीन शैल चित्रों को संरक्षित करने की दिशा में ठोस कदम उठाया गया है।
