आगरा। सिकंदरा स्थित एलआईसी कार्यालय की लाइब्रेरी में एक मादा एशियन पाम सिवेट के पहुंचने से कर्मचारियों में हलचल मच गई। सूचना पर पहुंची वाइल्डलाइफ एसओएस की रैपिड रिस्पॉन्स टीम ने सिवेट का सुरक्षित रेस्क्यू किया। नाक पर हल्की चोट मिलने के बाद उसका उपचार किया गया और स्वस्थ होने पर उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया। यह घटना शहरों में बढ़ते मानव-वन्यजीव संपर्क और घटते प्राकृतिक आवासों की ओर भी संकेत करती है।

सिकंदरा स्थित जीवन बीमा निगम (एलआईसी) कार्यालय की लाइब्रेरी में उस समय कर्मचारियों के बीच हलचल मच गई, जब वहां एक एशियन पाम सिवेट दिखाई दी। कार्यालय कर्मचारियों की सतर्कता और वाइल्डलाइफ एसओएस की त्वरित कार्रवाई के चलते इस दुर्लभ वन्यजीव को सुरक्षित बचा लिया गया। प्राथमिक उपचार और निगरानी के बाद उसे उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया।

जानकारी के अनुसार, एलआईसी कार्यालय भवन की लाइब्रेरी में कर्मचारियों ने एक अनजान वन्यजीव को देखा। पहचान होने पर पता चला कि वह एशियन पाम सिवेट है। किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचने के लिए कर्मचारियों ने तत्काल लाइब्रेरी का दरवाजा बंद कर दिया, ताकि जानवर भवन के अन्य हिस्सों में न जा सके और सुरक्षित रूप से एक स्थान पर बना रहे। इसके बाद कर्मचारियों ने वाइल्डलाइफ एसओएस की आगरा-मथुरा रैपिड रिस्पॉन्स यूनिट की हेल्पलाइन पर सूचना दी।

सूचना मिलते ही रैपिड रिस्पॉन्स टीम मौके पर पहुंची और लाइब्रेरी की सावधानीपूर्वक तलाशी शुरू की। जांच के दौरान सिवेट एक टेबल के नीचे छिपी हुई मिली। विशेषज्ञों के अनुसार, एशियन पाम सिवेट स्वभाव से बेहद शर्मीले और रात में सक्रिय रहने वाले जीव होते हैं। किसी अनजान वातावरण में पहुंचने पर वे अक्सर सुरक्षित स्थान तलाशकर छिप जाते हैं। टीम ने पूरे एहतियात और सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए सिवेट को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया।

रेस्क्यू के बाद किए गए स्वास्थ्य परीक्षण में पता चला कि यह एक मादा एशियन पाम सिवेट है। उसकी नाक पर हल्की चोट भी मिली। चोट को देखते हुए उसे तत्काल वाइल्डलाइफ एसओएस की ट्रांजिट फैसिलिटी में ले जाया गया, जहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की निगरानी में उसका उपचार शुरू किया गया। चिकित्सा प्रक्रिया के तहत घाव की ड्रेसिंग की गई और 24 घंटे तक उसकी लगातार निगरानी की गई, ताकि उसकी स्थिति पूरी तरह स्थिर हो सके।
वेटेरिनरी टीम द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण और निगरानी के बाद यह पुष्टि की गई कि सिवेट पूरी तरह स्वस्थ है और उसे वापस जंगल में छोड़ा जा सकता है। इसके बाद वन्यजीव विशेषज्ञों ने उसे ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र में छोड़ा, जहां उसके लिए पर्याप्त भोजन, आश्रय और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध हो सके। इस तरह समय पर मिले उपचार और देखभाल के कारण सिवेट सुरक्षित रूप से अपने प्राकृतिक आवास में लौट सकी।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, एशियन पाम सिवेट वन पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह प्रजाति बीजों के प्रसार में अहम भूमिका निभाती है, जिससे जंगलों के पुनर्जीवन और हरित क्षेत्र के विस्तार में मदद मिलती है। यही कारण है कि इस जीव को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत संरक्षण प्राप्त है। यह वही श्रेणी है जिसमें देश के कई महत्वपूर्ण और संरक्षित वन्यजीव शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में शहरों और शहरी क्षेत्रों के आसपास एशियन पाम सिवेट के दिखाई देने की घटनाएं बढ़ी हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण प्राकृतिक आवासों का लगातार सिकुड़ना, हरित क्षेत्रों में कमी और तेजी से हो रहा शहरी विस्तार है। जंगलों और मानव बस्तियों के बीच की दूरी कम होने से वन्यजीवों को भोजन और आश्रय की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों तक आना पड़ रहा है। इससे मानव और वन्यजीवों के बीच संपर्क की घटनाएं बढ़ रही हैं।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी कार्तिक सत्यनारायण ने कहा कि एलआईसी कार्यालय के कर्मचारियों की सूझबूझ और जिम्मेदार व्यवहार इस रेस्क्यू अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण साबित हुआ। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों ने घबराहट दिखाने के बजाय लाइब्रेरी को सुरक्षित रखा और तुरंत विशेषज्ञों को सूचना दी। इससे सिवेट को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची और उसे सुरक्षित बचाया जा सका।
वाइल्डलाइफ एसओएस में कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स के निदेशक बैजू राज एम.वी. ने कहा कि एशियन पाम सिवेट सामान्यतः इंसानी आबादी से दूर रहना पसंद करती है। ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि शहरी विस्तार और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों के बीच टकराव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि समय पर सहायता मिलने से इस सिवेट को सुरक्षित बचाया जा सका और अब वह अपने प्राकृतिक वातावरण में लौट चुकी है।
यह घटना न केवल एक सफल रेस्क्यू अभियान की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि वन्यजीवों के प्रति जागरूकता, संवेदनशीलता और त्वरित प्रतिक्रिया किस तरह मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग ऐसे मामलों में घबराने के बजाय प्रशिक्षित रेस्क्यू टीमों को सूचना दें, तो वन्यजीवों को सुरक्षित बचाया जा सकता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को भी कम किया जा सकता है।

