आगरा। आगरा के शहीद स्मारक पर शनिवार को UGC रोलबैक और आरक्षण में बदलाव की मांग को लेकर चल रहे सवर्ण समाज के सत्याग्रह में उस समय हंगामा खड़ा हो गया, जब मंच से ही नेताओं के बीच तीखी तकरार शुरू हो गई। करणी सेना के उपाध्यक्ष राजीव चौहान ने दक्षिण विधानसभा के विधायक और कैबिनेट उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय पर मंच से गंभीर आरोप लगाए और उन्हें लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की। इसके बाद मंच पर मौजूद दूसरे नेताओं ने माइक संभालने की कोशिश की। विवाद बढ़ने के बाद क्षत्रिय समाज से जुड़े कुछ लोग सत्याग्रह स्थल से चले गए। दोपहर तक आंदोलन स्थल पर भीड़ भी कम होती दिखाई दी और सत्याग्रह के नेतृत्व को लेकर आपसी मतभेद खुलकर सामने आ गए।
सत्याग्रह में विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब ब्राह्मण नेता पवन समाधिया ने मंच से पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को किसी दूसरे व्यक्ति से बातचीत नहीं करने की बात कही। इस दौरान उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पांच लोगों के नामों का उल्लेख किया। राजीव चौहान का आरोप था कि जिन पांच लोगों का नाम मंच से लिया गया, वे सभी ब्राह्मण समाज से जुड़े हैं। उनका कहना था कि जब आंदोलन में अलग-अलग समाज के लोग शामिल हैं तो नेतृत्व और मंच पर किसी एक समाज का प्रभाव दिखाई नहीं देना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर उन्होंने मंच पर अपनी नाराजगी जतानी शुरू कर दी।

विवाद की दूसरी कड़ी क्षत्रिय समाज से जुड़ी विधायक रानी पक्षालिका को लेकर मंच से की गई कथित टिप्पणी को लेकर सामने आई। राजीव चौहान ने कहा कि रानी पक्षालिका क्षत्रिय समाज की नेता हैं और उनके नाम को लेकर मंच से टिप्पणी किए जाने पर समाज के लोगों में पहले से नाराजगी है। उनका सवाल था कि यदि आंदोलन किसी एक समाज का नहीं बल्कि सभी समाजों का है तो फिर किसी जनप्रतिनिधि का नाम लेकर टिप्पणी करने की जरूरत क्यों पड़ी। इसी बात को लेकर उन्होंने मंच से अपनी नाराजगी जाहिर की और योगेंद्र उपाध्याय पर भी आरोप लगाए।
राजीव चौहान ने मंच से योगेंद्र उपाध्याय के खिलाफ बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने कई बार मंत्री को लेकर ‘चोर’ शब्द का इस्तेमाल किया। यह टिप्पणी सामने आते ही मंच पर मौजूद दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं में हलचल मच गई। कुछ लोगों ने उनसे माइक लेने का प्रयास किया। माहौल बिगड़ता देख मंच पर मौजूद लोगों ने स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन राजीव चौहान लगातार अपनी बात रखने पर अड़े रहे। कुछ देर बाद वह मंच से नीचे भी आ गए और वहां मौजूद लोगों के बीच अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर सत्याग्रह की एकजुटता पर दिखाई दिया। विवाद के बाद क्षत्रिय महासभा से जुड़े लोगों के वहां से चले जाने की बात सामने आई। इससे आंदोलन में शामिल अलग-अलग समूहों के बीच पहले से मौजूद मतभेद खुलकर सामने आ गए। जिस सत्याग्रह में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और UGC रोलबैक जैसे मुद्दों को लेकर एकजुटता दिखाने का दावा किया जा रहा था, उसी के मंच पर समाज और नेतृत्व को लेकर विवाद शुरू हो गया।
सत्याग्रह स्थल पर मौजूद लोगों के बीच भी इस घटनाक्रम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहीं। कुछ लोगों का कहना था कि आंदोलन का मुद्दा बड़ा है और मंच पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से उसका असर कमजोर पड़ रहा है। वहीं कुछ लोग नेताओं के बीच बढ़ते मतभेद को आंदोलन के लिए नुकसानदायक बता रहे थे। दोपहर बाद शहीद स्मारक पर पहले की अपेक्षा कम लोग दिखाई दिए। इसी दौरान एक युवक ने नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि नेता बनने चले थे, लेकिन चार लोग भी नहीं जुटा पाए। इस टिप्पणी से भी वहां मौजूद लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई।
आंदोलन के मंच पर हुए इस घटनाक्रम ने नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्याग्रह की शुरुआत में जिन मुद्दों को लेकर लोगों को जोड़ने की कोशिश की गई थी, वे मुद्दे पीछे छूटते नजर आए और मंच पर नेताओं के बीच विवाद चर्चा का केंद्र बन गया। खासतौर पर एक समाज के नेताओं के नाम लिए जाने और दूसरे समाज के नेताओं के नाम नहीं लिए जाने को लेकर उठे सवाल ने आंदोलन के भीतर प्रतिनिधित्व को लेकर बहस छेड़ दी।

राजीव चौहान का कहना था कि यदि आंदोलन में सभी समाजों की भागीदारी है तो मंच पर भी सभी समाजों को बराबर सम्मान और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्होंने रानी पक्षालिका को लेकर हुई टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई और कहा कि क्षत्रिय समाज से जुड़े लोगों की भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी क्रम में उन्होंने योगेंद्र उपाध्याय को लेकर भी सवाल उठाए। हालांकि मंच से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस घटनाक्रम से सामने नहीं होती है।
शनिवार को हुए इस विवाद ने सत्याग्रह की दिशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ आंदोलनकारी UGC रोलबैक और आरक्षण में बदलाव जैसे मुद्दों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एकत्र हुए थे, वहीं दूसरी तरफ मंच पर नेताओं के बीच विवाद और आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया। इससे आंदोलन में शामिल अलग-अलग संगठनों के बीच तालमेल को लेकर तस्वीर साफ नहीं रही। क्षत्रिय समाज से जुड़े लोगों के जाने के बाद स्थल पर भीड़ कम होती गई और सत्याग्रह का माहौल पहले जैसा नहीं दिखाई दिया।
अब इस विवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आंदोलनकारी दोबारा एक मंच पर आकर मूल मुद्दों पर एकजुट हो पाएंगे या मंच पर शुरू हुआ यह विवाद आंदोलन को अलग-अलग गुटों में बांट देगा। शनिवार की घटना ने यह जरूर दिखा दिया कि आरक्षण और UGC से जुड़े मुद्दों पर शुरू हुआ सत्याग्रह अब केवल मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके भीतर नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और अलग-अलग समाजों की भागीदारी को लेकर भी खींचतान सामने आने लगी है। देर शाम पुलिस शहीद स्मारक पर बैठे सभी लोगों को पकड़कर पुलिस लाइन ले आई। पुलिस के अनुसार सत्याग्रह आंदोलनकारियों के पास कोई अनुमति नहीं थी। वहीं सत्याग्रह के संयोजक अरुण उपाध्याय ने बताया कि हमने अपनी बात उच्चाधिकारियों तक पहुंचा दी है। देर रात सभी काे छोड़ दिया गया। इसके बाद सत्याग्रह समाप्त हो गया।
