आगरा। आलू और शकरकंद की खेती करने वाले किसानों के लिए बड़ी पहल की तैयारी है। अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र सीसार्क (CSARC) को विश्वस्तरीय अनुसंधान, नवाचार और ज्ञान-साझाकरण के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है। आगरा में हुई सीसार्क की दूसरी समन्वय समिति की बैठक में भारत के साथ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश सहित दक्षिण एशिया के किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर अनुसंधान और तकनीक विकसित करने पर चर्चा हुई। बैठक में 10 हेक्टेयर भूमि के उपयोग को लेकर राष्ट्रीय उद्यानिकी बोर्ड और सीसार्क के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किए गए। इस सुविधा से अनुसंधान, प्रदर्शन और प्रशिक्षण गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

बैठक का आयोजन 22 अगस्त को आगरा में किया गया। इसमें भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र और दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों के कृषि एवं अनुसंधान संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक की संयुक्त अध्यक्षता अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र पेरू के महानिदेशक डॉ. सीमोन हेक और भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव अतिश चंद्र ने की।
बैठक में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव एवं उद्यानिकी आयुक्त डॉ. प्रभात कुमार, उत्तर प्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव उद्यान बाबूलाल मीणा, सीआईपी के उप महानिदेशक विज्ञान एवं नवाचार डॉ. ह्यूगो कैम्पोस, नेपाल कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय आलू अनुसंधान कार्यक्रम से डॉ. युवराज भुसाल, राष्ट्रीय उद्यानिकी बोर्ड के प्रबंध निदेशक कपिल मीणा और सीसार्क के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और वैज्ञानिक मौजूद रहे। भूटान के कृषि विभाग के निदेशक यॉन्तेन ग्यांत्शो और बांग्लादेश के कृषि मंत्रालय के अपर मुख्य सचिव मुस्तफा कमाल वर्चुअल माध्यम से बैठक से जुड़े।

बैठक में सीसार्क की भूमिका को केवल आगरा या भारत तक सीमित रखने के बजाय पूरे दक्षिण एशिया के लिए उपयोगी बनाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने कहा कि आलू और शकरकंद के क्षेत्र में सीसार्क को ऐसा केंद्र बनाया जाना चाहिए, जहां किसानों की वास्तविक समस्याओं पर अनुसंधान हो और उसके आधार पर उपयोगी तकनीक तैयार की जाए। भारत के साथ नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित करने की दिशा में काम करने की बात कही गई। इसके साथ वैज्ञानिक सहयोग, ज्ञान-साझाकरण और सरकारी संस्थानों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
सीसार्क को भारत की वैज्ञानिक और कृषि क्षमता को दक्षिण एशिया के देशों की जरूरतों और अनुभवों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। भारत में विकसित तकनीकों और सफल प्रयोगों को पड़ोसी देशों तक पहुंचाने के साथ दूसरे देशों में विकसित स्थानीय तकनीकों से भी सीखने का प्रयास किया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें अलग-अलग देश अपने अनुभव साझा करें और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए मिलकर काम करें। इसे दक्षिण-दक्षिण सहयोग का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

बैठक में नेपाल, बांग्लादेश और भूटान सहित दक्षिण एशिया के अन्य देशों के कृषि अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। इसमें ज्ञान, जर्मप्लाज्म, तकनीक, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और मानव संसाधन के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई। संयुक्त अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से अलग-अलग देशों की कृषि जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करने पर सहमति बनी।
किसानों के खेत तक पहुंचेगा अनुसंधान
बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि आधुनिक अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी माना जाएगा जब उसका परिणाम किसानों के खेत तक पहुंचे। केवल प्रयोगशालाओं में नई तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है। उसका इस्तेमाल किसान आसानी से कर सकें और इससे उनकी उत्पादकता, आय और आजीविका में सुधार हो, इस दिशा में काम करने की जरूरत है। इसी उद्देश्य से सीसार्क में ऐसे अनुसंधान कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया जिनका सीधा संबंध खेती और किसानों की जरूरतों से हो।
बेहतर और जलवायु-सहिष्णु आलू एवं शकरकंद की किस्मों का विकास प्रमुख प्राथमिकता में रखा गया है। इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण बीज व्यवस्था, आधुनिक उत्पादन तकनीक, रोगों की पहचान और निदान, जैव-सुदृढ़ीकरण, डिजिटल कृषि और टिकाऊ खेती पर भी काम किया जाएगा। बाजार और पूरी मूल्य श्रृंखला से जुड़ी तकनीकों को भी अनुसंधान का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य खेती से लेकर बाजार तक किसानों को बेहतर तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव अतिश चंद्र ने कहा कि सीसार्क देश की कृषि को अधिक उत्पादक, तकनीक आधारित, बाजार से जुड़ी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने जलवायु के बदलते प्रभावों को देखते हुए ऐसी आलू और शकरकंद की किस्मों पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई जो बदलती परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। उन्होंने बाजार की मांग के अनुरूप और पोषण की दृष्टि से बेहतर किस्मों पर भी अनुसंधान की जरूरत बताई।
उन्होंने आधुनिक बीज प्रणालियों और टिकाऊ उत्पादन तकनीकों को मजबूत करने पर जोर दिया। इसके साथ वैज्ञानिक संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य सरकारों, निजी क्षेत्र और विकास से जुड़े संस्थानों के बीच बेहतर सहयोग को जरूरी बताया। इससे अनुसंधान के परिणाम तेजी से खेतों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
आगरा बनेगा बड़े अनुसंधान नेटवर्क का केंद्र
बैठक में आगरा में सीसार्क की स्थापना के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा हुई। उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में शामिल है और आगरा भी महत्वपूर्ण आलू उत्पादन क्षेत्र है। ऐसे में यहां स्थित सीसार्क को स्थानीय जरूरतों से जोड़ते हुए राष्ट्रीय और दक्षिण एशियाई स्तर के अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। इसे क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित करने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक में सुझाव दिया गया कि सीसार्क की गतिविधियों को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित न रखा जाए। उत्तर प्रदेश के साथ पश्चिम बंगाल, हरियाणा और ओडिशा में चल रहे आलू से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाते हुए गुजरात, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और अन्य प्रमुख आलू एवं शकरकंद उत्पादक क्षेत्रों को भी नेटवर्क से जोड़ा जाए। इससे अलग-अलग राज्यों में होने वाले अनुसंधान, तकनीकी प्रयोग और किसानों के अनुभव एक-दूसरे तक पहुंच सकेंगे।

देश के विभिन्न हिस्सों को एक नेटवर्क में जोड़ने से वैज्ञानिकों को अलग-अलग जलवायु और कृषि परिस्थितियों में आलू और शकरकंद की खेती को समझने का अवसर मिलेगा। इसके आधार पर क्षेत्र के अनुसार तकनीक और किस्मों पर काम किया जा सकेगा। दक्षिण एशियाई स्तर पर भी संयुक्त अनुसंधान, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग को बढ़ाने की योजना है।
सीआईपी और आईसीएआर की साझेदारी को मिलेगी नई गति
बैठक में अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के बीच पांच दशक से अधिक पुराने सहयोग का भी उल्लेख किया गया। सीसार्क के माध्यम से इस साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने की संभावना जताई गई। उन्नत प्रजनन, जीनोमिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, आधुनिक बीज प्रणालियों, रोग निदान, जलवायु-स्मार्ट कृषि, जैव-सुदृढ़ीकरण और वैज्ञानिकों की क्षमता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत किया जा सकता है।
इस साझेदारी का लाभ केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को दक्षिण एशिया के अन्य देशों के साथ साझा करने के अवसर भी बढ़ेंगे। इससे क्षेत्र के अलग-अलग देशों में आलू और शकरकंद की खेती से जुड़ी समस्याओं पर संयुक्त रूप से काम करने का रास्ता मजबूत होगा।
पांच साल की अनुसंधान योजना पर चर्चा
समन्वय समिति की बैठक में सीसार्क की स्थापना के बाद अब तक हुई प्रगति की समीक्षा भी की गई। इसमें आधारभूत ढांचे, वैज्ञानिक कार्यक्रमों, मानव संसाधन, विभिन्न संस्थानों के साथ साझेदारी और अनुसंधान से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। बजट, उपलब्ध संसाधनों और आने वाले समय की जरूरतों की भी समीक्षा की गई।
बैठक में वर्ष 2025-26 के अनुसंधान, प्रसार और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी रखी गई। इसके साथ वर्ष 2026 से 2031 तक की अनुसंधान एवं विकास योजना और वर्ष 2026-27 की वार्षिक कार्ययोजना भी समिति के सामने प्रस्तुत की गई। सदस्यों ने सीसार्क की भविष्य की दिशा, अनुसंधान की प्राथमिकताओं, संस्थागत विकास और साझेदारियों को लेकर सुझाव दिए।
दक्षिण एशिया के किसानों के लिए बनेगा साझा मंच
बैठक में सीसार्क को दक्षिण एशिया में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का सक्रिय और परिणाम देने वाला मंच बनाने पर सहमति बनी। इसके माध्यम से तकनीक के हस्तांतरण के साथ संयुक्त अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, जर्मप्लाज्म और ज्ञान का आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और संयुक्त नवाचार को बढ़ावा दिया जाएगा।
इस व्यवस्था का सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाने की योजना है। अलग-अलग देशों में सफल तकनीकों और खेती के तरीकों को दूसरे क्षेत्रों में आजमाया जा सकेगा। वैज्ञानिक, कृषि विश्वविद्यालय, सरकारी विभाग, निजी क्षेत्र और किसान एक साथ काम कर सकेंगे। इससे नई तकनीक विकसित करने से लेकर उसके खेत में इस्तेमाल तक की प्रक्रिया को मजबूत किया जा सकता है।
समिति के सदस्यों ने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में सीसार्क अनुसंधान से खेत, खेत से बाजार और भारत से दक्षिण एशिया तक ज्ञान और तकनीक पहुंचाने वाली प्रभावी कड़ी बनेगा। इसका अंतिम लक्ष्य किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने के साथ खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करना, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता बढ़ाना है।
सीसार्क फार्म के लिए 10 हेक्टेयर भूमि का समझौता
बैठक के दौरान राष्ट्रीय उद्यानिकी बोर्ड और सीसार्क के बीच 10 हेक्टेयर भूमि के उपयोग को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। सीसार्क फार्म के लिए भूमि के उपयोग से जुड़े दस्तावेजों को इस समझौते के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया। समझौते पर राष्ट्रीय उद्यानिकी बोर्ड के प्रबंध निदेशक कपिल मीणा और अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र के महानिदेशक डॉ. सीमोन हेक ने हस्ताक्षर किए।
10 हेक्टेयर भूमि का यह प्रावधान सीसार्क की अनुसंधान, प्रदर्शन और प्रशिक्षण गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां वैज्ञानिक प्रयोगों के साथ नई तकनीकों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे। इससे किसानों, वैज्ञानिकों और कृषि से जुड़े लोगों तक नई तकनीकों को पहुंचाने में मदद मिलेगी।
समिति के सदस्यों ने देखा सीसार्क फार्म
बैठक के बाद समन्वय समिति के सदस्यों ने सिंगना स्थित सीसार्क फार्म का भ्रमण किया। भ्रमण का नेतृत्व एनबीसीसी के कार्यकारी निदेशक प्रदीप शर्मा ने किया। इस दौरान सदस्यों को सीसार्क परिसर में चल रहे निर्माण कार्यों और आधारभूत ढांचे की प्रगति के बारे में जानकारी दी गई।
समिति के सदस्यों को केंद्र में विकसित की जा रही सुविधाओं और भविष्य में होने वाली अनुसंधान गतिविधियों के लिए तैयार किए जा रहे ढांचे के बारे में भी बताया गया। भ्रमण के दौरान सदस्यों ने सीसार्क को आलू और शकरकंद के आधुनिक क्षेत्रीय अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में हो रहे काम को देखा।
सीसार्क के विकास से आगरा को केवल आलू उत्पादन के लिए ही नहीं बल्कि कृषि अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में भी नई पहचान मिलने की संभावना है। आगरा की स्थानीय कृषि जरूरतों को दक्षिण एशिया के व्यापक कृषि परिदृश्य से जोड़कर काम करने से किसानों के लिए नए अवसर तैयार हो सकते हैं। आने वाले समय में यहां विकसित तकनीक और ज्ञान को दूसरे राज्यों तथा पड़ोसी देशों तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जाएगा।
इस तरह आगरा में स्थापित हो रहा सीसार्क आलू और शकरकंद की खेती से जुड़े अनुसंधान को नई दिशा देने की तैयारी में है। विश्वस्तरीय अनुसंधान, बेहतर बीज, जलवायु के अनुकूल किस्में, आधुनिक खेती, रोग नियंत्रण, डिजिटल तकनीक और बाजार से जुड़ी व्यवस्था पर एक साथ काम होने से किसानों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है। 10 हेक्टेयर भूमि के समझौते और अनुसंधान योजनाओं के साथ केंद्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। यदि अनुसंधान के परिणाम प्रभावी ढंग से किसानों तक पहुंचते हैं तो सीसार्क आगरा के साथ पूरे दक्षिण एशिया में आलू और शकरकंद की खेती के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
