आगरा। सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (एसएनएमसी) में चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। कॉलेज में पहली बार किडनी प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किया गया। क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित और लंबे समय से डायलिसिस करा रहे 32 वर्षीय मरीज को उसकी पत्नी ने अपनी किडनी दान की। एसएनएमसी और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) लखनऊ की विशेषज्ञ टीम के संयुक्त प्रयास से यह जटिल प्रत्यारोपण सफल हुआ। सर्जरी के बाद मरीज और उसकी पत्नी दोनों की स्थिति स्थिर है और दोनों तेजी से स्वस्थ हो रहे हैं। किडनी प्राप्त करने वाले मरीज की नई किडनी ने भी काम करना शुरू कर दिया है। इस सुविधा के शुरू होने से आगरा और आसपास के जिलों के मरीजों को किडनी प्रत्यारोपण के लिए बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।
एसएनएमसी में हुए इस पहले किडनी प्रत्यारोपण को आगरा मंडल के लिए चिकित्सा क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। अब तक गंभीर किडनी रोग से जूझ रहे मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए दिल्ली, लखनऊ या जयपुर जैसे शहरों में जाना पड़ता था। इससे मरीजों और उनके परिवारों पर इलाज के साथ यात्रा और रहने का अतिरिक्त खर्च भी पड़ता था। स्थानीय स्तर पर यह सुविधा मिलने से जरूरतमंद मरीजों को अपने क्षेत्र में ही उच्चस्तरीय उपचार उपलब्ध हो सकेगा।
यह प्रत्यारोपण मुख्यमंत्री असाध्य रोग उपचार योजना के तहत मिली वित्तीय सहायता से संभव हुआ। योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर मरीज को उपचार के लिए सहायता मिली, जिससे महंगे किडनी प्रत्यारोपण का खर्च वहन करना संभव हो सका। इस पहल से यह भी सामने आया कि सरकारी चिकित्सा संस्थान में जरूरतमंद मरीज को जटिल उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।
प्रत्यारोपण की प्रक्रिया सुबह 9:30 बजे शुरू हुई और दोपहर 3:00 बजे तक चली। इस दौरान एसजीपीजीआई लखनऊ की विशेषज्ञ टीम ने एसएनएमसी की स्थानीय टीम के साथ मिलकर पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया। किडनी प्रत्यारोपण जैसे जटिल उपचार में नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी और एनेस्थीसिया समेत कई विभागों की विशेषज्ञता की जरूरत होती है। एसएनएमसी की टीम ने विभिन्न विभागों के सहयोग से मरीज और किडनी दानकर्ता की पूरी प्रक्रिया को संभाला।
एसएनएमसी के प्रधानाचार्य एवं डीन डॉ. प्रशांत गुप्ता ने इस उपलब्धि को एसएनएमसी और पूरे आगरा मंडल के लिए ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू होने से गरीब और जरूरतमंद मरीजों को काफी लाभ मिलेगा। उन्होंने इस सफलता के लिए एसएनएमसी की पूरी टीम को बधाई दी और एसजीपीजीआई लखनऊ की विशेषज्ञ टीम के सहयोग और मार्गदर्शन के लिए आभार जताया।
नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. अपूर्व जैन ने बताया कि प्रत्यारोपण के बाद मरीज और उसकी पत्नी दोनों की स्थिति पूरी तरह स्थिर है। दोनों तेजी से रिकवर कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित की गई किडनी ने अच्छी तरह से काम करना शुरू कर दिया है। चिकित्सकों की टीम दोनों की लगातार निगरानी कर रही है, ताकि ऑपरेशन के बाद की स्थिति पर नजर रखी जा सके और स्वास्थ्य में सुधार को सुनिश्चित किया जा सके।
इस ऐतिहासिक प्रत्यारोपण में एसजीपीजीआई लखनऊ की विशेषज्ञ टीम में यूरोलॉजी और किडनी प्रत्यारोपण से जुड़े डॉ. एमएस अंसारी, डॉ. संजय कुमार सुरेका और डॉ. आशीष रंजन शामिल रहे। नेफ्रोलॉजी की जिम्मेदारी डॉ. मानस रंजन बेहरा ने संभाली। एनेस्थीसिया टीम में डॉ. तपस कुमार सिंह और डॉ. बोनचनपल्ली मोहन कुमार रहे। नर्सिंग स्टाफ में सोसाकुट्टी विल्सन, विजय कुमार और आकांक्षा गौतम ने सहयोग किया।
एसएनएमसी की नेफ्रोलॉजी टीम में विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. अपूर्व जैन के साथ डॉ. मुदित खुराना और डॉ. कैरवी भारद्वाज शामिल रहे। यूरोलॉजी विभाग से डॉ. प्रशांत लवानिया, डॉ. अंकुश गुप्ता, डॉ. विजय त्यागी, डॉ. प्रदीप देब और डॉ. अभिषेक पाठक ने भूमिका निभाई। एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. योगिता द्विवेदी, डॉ. अर्चना अग्रवाल, डॉ. राजीव पुरी, डॉ. अतिहर्ष मोहन और डॉ. प्रवीण पांडेय ने प्रत्यारोपण प्रक्रिया में सहयोग किया।
एसएनएमसी में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू होने से आगरा के साथ आसपास के जिलों के मरीजों के लिए उपचार का एक नया विकल्प तैयार हुआ है। किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय जांच और उपयुक्त स्थिति में प्रत्यारोपण की सुविधा स्थानीय स्तर पर मिल सकेगी। इससे मरीजों का समय और इलाज से जुड़ा आर्थिक बोझ कम होने की उम्मीद है।
एसएनएमसी की इस उपलब्धि से सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में जटिल उपचार की सुविधाओं के विस्तार का रास्ता भी मजबूत हुआ है। विशेषज्ञ टीमों के सहयोग से शुरू हुई यह सुविधा आने वाले समय में उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, जिन्हें किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत है। पहले सफल प्रत्यारोपण के बाद मरीज और डोनर की स्थिर स्थिति ने मेडिकल कॉलेज की टीम का उत्साह भी बढ़ाया है। कॉलेज प्रशासन और चिकित्सकों ने इसे मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
