आगरा। उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में पारिवारिक विवादों के निस्तारण की रफ्तार चिंता का विषय बन गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि वर्ष 2025 के अंत तक प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में 4,07,130 मामले लंबित हैं। आगरा में भी लंबित मामलों की संख्या 11,600 तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि न्याय में हो रही देरी का सबसे अधिक असर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में लंबित मामलों की संख्या एक बार फिर चार लाख के पार पहुंच गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के संयुक्त रजिस्ट्रार (RTI) एवं केंद्रीय सहायक जन सूचना अधिकारी द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उपलब्ध कराए गए आंकड़ों से यह स्थिति सामने आई है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन को उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 के अंत तक प्रदेश की सभी फैमिली कोर्ट्स में कुल 4,07,130 मामले लंबित हैं। यह पिछले पांच वर्षों का सबसे अधिक आंकड़ा है।
आरटीआई के अनुसार वर्ष 2021 की शुरुआत में प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में 4,01,553 मामले लंबित थे। उसी वर्ष 2,50,933 नए मामले दर्ज हुए जबकि 2,45,836 मामलों का निस्तारण हुआ। वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 4,06,650 हो गई।

वर्ष 2022 में 4,06,650 लंबित मामलों के साथ शुरुआत हुई। इस दौरान 2,72,229 नए मामले दर्ज हुए और 2,85,167 मामलों का निस्तारण किया गया। इसके बाद लंबित मामलों की संख्या घटकर 3,93,712 रह गई।
वर्ष 2023 में 3,93,712 लंबित मामलों के साथ शुरुआत हुई। इस वर्ष 2,93,845 नए मामले दर्ज हुए जबकि 2,90,682 मामलों का निस्तारण हुआ। इसके बाद वर्ष के अंत में लंबित मामलों की संख्या 3,96,875 पहुंच गई।
वर्ष 2024 में 3,96,875 लंबित मामलों से शुरुआत हुई। इस दौरान 2,77,997 नए मामले दर्ज हुए और 2,74,933 मामलों का निस्तारण किया गया। वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 3,99,939 हो गई।
वर्ष 2025 में 3,99,939 मामलों के साथ शुरुआत हुई। पूरे वर्ष में 2,87,078 नए मामले दर्ज हुए जबकि 2,79,890 मामलों का निस्तारण किया गया। नए मामलों की संख्या निस्तारित मामलों से लगभग 7,200 अधिक रहने के कारण लंबित मामलों का आंकड़ा बढ़कर 4,07,130 पहुंच गया।
आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि प्रदेश में हर वर्ष करीब ढाई से तीन लाख नए पारिवारिक विवाद अदालतों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि न्यायालय लगभग उतने ही मामलों का निस्तारण भी कर रहे हैं, लेकिन नए मामलों की लगातार बढ़ती संख्या के कारण लंबित मामलों में कोई बड़ी कमी नहीं आ पा रही है। वर्ष 2022 और 2023 में पेंडेंसी में हल्की गिरावट जरूर दर्ज की गई, लेकिन 2024 और 2025 में यह फिर तेजी से बढ़ गई।
आरटीआई में यह भी सामने आया है कि लखनऊ, कानपुर नगर, प्रयागराज (इलाहाबाद), आगरा, बरेली और मेरठ जैसे बड़े जिलों में लंबित मामलों का सबसे अधिक बोझ है। इनमें लखनऊ की फैमिली कोर्ट सबसे अधिक दबाव में है। वहीं शामली, सोनभद्र, चंदौली और कासगंज जैसे अपेक्षाकृत छोटे जिलों में मामलों की संख्या कम है। इससे स्पष्ट होता है कि अधिक आबादी और शहरीकरण वाले जिलों में पारिवारिक विवादों की संख्या भी अधिक है।
आगरा फैमिली कोर्ट की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। पिछले पांच वर्षों में यहां लंबित मामलों की संख्या लगभग 10,700 से 11,600 के बीच बनी हुई है। वर्ष 2021 में 11,489 लंबित मामलों के साथ शुरुआत हुई। उस वर्ष 7,920 नए मामले दर्ज हुए और 8,141 मामलों का निस्तारण हुआ, जिससे लंबित मामले घटकर 11,268 रह गए।
वर्ष 2022 में 11,268 मामलों के साथ शुरुआत हुई। इस दौरान 10,511 नए मामले दर्ज हुए जबकि 10,850 मामलों का निस्तारण किया गया। वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या 10,929 रह गई।
वर्ष 2023 में 10,929 लंबित मामलों से शुरुआत हुई। इस वर्ष 11,432 नए मामले दर्ज हुए और 11,376 मामलों का निस्तारण हुआ। वर्ष के अंत में लंबित मामलों की संख्या 10,985 पहुंच गई।
वर्ष 2024 में 10,985 मामलों के साथ शुरुआत हुई। इस दौरान 12,356 नए मामले दर्ज हुए जबकि 12,614 मामलों का निस्तारण किया गया। इससे लंबित मामलों की संख्या घटकर 10,727 रह गई।
वर्ष 2025 में आगरा में 10,727 मामलों के साथ शुरुआत हुई। पूरे वर्ष में 12,746 नए मामले दर्ज हुए जबकि 11,873 मामलों का निस्तारण किया गया। इसके बावजूद वर्ष के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 11,600 हो गई, जो वर्ष 2022 के बाद सबसे अधिक है।
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता केसी. जैन ने इन आंकड़ों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट का गठन पारिवारिक विवादों का शीघ्र और संवेदनशील समाधान करने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन चार लाख से अधिक मामलों का लंबित होना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने कहा कि इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है, जिन्हें भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और अन्य पारिवारिक मामलों में वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि अधिक पेंडेंसी वाले जिलों में अतिरिक्त फैमिली कोर्ट और न्यायाधीश नियुक्त किए जाएं। मीडिएशन और सुलह-समझौता व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए, तीन वर्ष से अधिक पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं, ई-फाइलिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल केस मैनेजमेंट को बढ़ावा दिया जाए तथा अनावश्यक स्थगन पर सख्ती की जाए।
केसी. जैन ने यह भी बताया कि परिवार न्यायालयों में ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था लागू कराने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (रिट पिटीशन सिविल संख्या 667/2024) दायर की है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट नोटिस जारी कर चुका है और अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को निर्धारित है। उनका मानना है कि ऑनलाइन सुनवाई शुरू होने से दूसरे जिलों और राज्यों में रहने वाले पक्षकारों की उपस्थिति आसान होगी तथा मामलों का निस्तारण पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो सकेगा।
उत्तर प्रदेश फैमिली कोर्ट्स: वर्षवार लंबित मामलों का विवरण (RTI के अनुसार)
| वर्ष | 01 जनवरी को लंबित (Opening) | वर्ष में नए मामले (Institution) | वर्ष में निस्तारित (Disposal) | वर्ष के अंत में लंबित (Closing) |
|---|---|---|---|---|
| 2021 | 4,01,553 | 2,50,933 | 2,45,836 | 4,06,650 |
| 2022 | 4,06,650 | 2,72,229 | 2,85,167 | 3,93,712 |
| 2023 | 3,93,712 | 2,93,845 | 2,90,682 | 3,96,875 |
| 2024 | 3,96,875 | 2,77,997 | 2,74,933 | 3,99,939 |
| 2025 | 3,99,939 | 2,87,078 | 2,79,890 | 4,07,130 |
स्रोत: इलाहाबाद हाईकोर्ट से RTI के तहत प्राप्त वर्षवार समेकित आंकड़े।
आगरा फैमिली कोर्ट: वर्षवार लंबित मामलों का विवरण
| वर्ष | 01 जनवरी को लंबित (Opening) | वर्ष में नए मामले (Institution) | वर्ष में निस्तारित (Disposal) | वर्ष के अंत में लंबित (Closing) |
|---|---|---|---|---|
| 2021 | 11,489 | 7,920 | 8,141 | 11,268 |
| 2022 | 11,268 | 10,511 | 10,850 | 10,929 |
| 2023 | 10,929 | 11,432 | 11,376 | 10,985 |
| 2024 | 10,985 | 12,356 | 12,614 | 10,727 |
| 2025 | 10,727 | 12,746 | 11,873 | 11,600 |
स्रोत: इलाहाबाद हाईकोर्ट से RTI के तहत प्राप्त आगरा फैमिली कोर्ट के वर्षवार आंकड़े।
