आगरा। दिव्य सेवा ट्रस्ट आगरा की ओर से रविवार को होटल ओपल कोर्टयार्ड सिकंदरा में चिकित्सक-रोगी संबंध विषय पर सार्थक एवं विचारोत्तेजक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में चिकित्सा जगत, समाजसेवा और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता की। परिचर्चा में चिकित्सक और रोगी के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए विश्वास, संवेदना, संवाद, पारदर्शिता, सम्मान और मानवीय व्यवहार को जरूरी बताया गया।
वक्ताओं ने कहा कि चिकित्सा सेवा को केवल बीमारी के उपचार तक सीमित नहीं किया जा सकता। रोगी जब चिकित्सक के पास पहुंचता है तो वह बीमारी के साथ चिंता, भय, उम्मीद और विश्वास भी लेकर आता है। ऐसे में चिकित्सक का व्यवहार उपचार की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। रोगी की बात धैर्यपूर्वक सुनना, उसकी स्थिति और भावनाओं को समझना तथा उपचार के संबंध में उसे सरल एवं स्पष्ट जानकारी देना चिकित्सकीय सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कार्यक्रम में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और नई तकनीकों के साथ सेवा भावना एवं मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों की मौजूदगी में हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. पंकज नगाइच ने चिकित्सक-रोगी संबंध में विश्वास और संवाद को चिकित्सा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि चिकित्सक के पास आने वाला रोगी केवल बीमारी का उपचार कराने नहीं आता बल्कि वह चिकित्सक पर भरोसा करके अपनी समस्या सामने रखता है। ऐसे में चिकित्सक की जिम्मेदारी है कि रोगी की बात को धैर्यपूर्वक सुने और उसकी स्थिति तथा भावनाओं को समझे।
रोगी को उपचार के संबंध में उचित जानकारी देना भी चिकित्सकीय सेवा का अहम हिस्सा है। जब रोगी और चिकित्सक के बीच विश्वास का वातावरण बनता है तो उपचार की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाती है। उन्होंने कहा कि संवाद की कमी से रोगी के मन में कई तरह की आशंकाएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए चिकित्सा व्यवस्था में बेहतर संवाद को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।

कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि चिकित्सा केवल रोग के उपचार तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव सेवा का महत्वपूर्ण कार्य है। चिकित्सक और रोगी के बीच बेहतर संवाद, पारदर्शिता, सम्मान और आपसी विश्वास को बढ़ावा देना आज समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में आधुनिक सुविधाएं और तकनीक लगातार विकसित हो रही हैं।
इससे उपचार की क्षमता बढ़ी है लेकिन केवल तकनीकी सुविधाओं से चिकित्सा सेवा पूर्ण नहीं हो सकती। चिकित्सक की सेवा भावना, संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। रोगी के साथ सम्मानजनक व्यवहार उसे मानसिक रूप से मजबूत करता है और उपचार के प्रति सकारात्मक सोच पैदा करता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सकों को आधुनिक चिकित्सा के साथ मानवीय मूल्यों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।

मुख्य वक्ता डॉ. ए.के. गुप्ता ने चिकित्सक-रोगी संबंध के विभिन्न पहलुओं पर प्रभावी ढंग से विचार रखते हुए कहा कि चिकित्सा का मूल उद्देश्य केवल रोग का उपचार करना नहीं बल्कि रोगी के मन में विश्वास पैदा करना भी है। उन्होंने कहा कि आज चिकित्सा विज्ञान तेजी से आधुनिक हो रहा है। नई-नई तकनीकें उपचार को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके बावजूद चिकित्सक की संवेदनशीलता, धैर्य और मानवीय व्यवहार का कोई विकल्प नहीं है।
चिकित्सक को रोगी की बीमारी के साथ उसकी चिंता, भय और मानसिक स्थिति को भी समझना चाहिए। कई बार बीमारी से अधिक चिंता और भय रोगी के मन को प्रभावित करता है। ऐसे में चिकित्सक के कुछ भरोसेमंद शब्द रोगी के मनोबल को मजबूत कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सक और रोगी के बीच विश्वास जितना मजबूत होगा, चिकित्सा व्यवस्था उतनी ही प्रभावी और मानवीय बनेगी। रोगी को उसकी बीमारी और उपचार के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलने से उसका भरोसा बढ़ता है और वह उपचार प्रक्रिया में अधिक सकारात्मक तरीके से शामिल होता है।

विशिष्ट अतिथि विजय पाल सिंह चौहान ने कहा कि रोगी और उसके परिवार के लिए बीमारी का समय मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। बीमारी की स्थिति में परिवार के लोग भी चिंता और तनाव से गुजरते हैं। ऐसे समय में चिकित्सक का व्यवहार रोगी के मनोबल को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चिकित्सक यदि रोगी और उसके परिवार से सहजता तथा संवेदनशीलता के साथ बात करता है तो कठिन परिस्थितियों में भी भरोसा कायम रहता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा सेवा में संवेदनशीलता और सेवा भावना को हमेशा सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। चिकित्सा का उद्देश्य केवल उपचार उपलब्ध कराना नहीं बल्कि रोगी को मानसिक संबल देना भी होना चाहिए।
वक्ता सुरेश कुशवाह ने चिकित्सक-रोगी संबंध में संवाद की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कई बार संवाद की कमी से गलतफहमियां उत्पन्न होती हैं। चिकित्सक और रोगी के बीच सहज, स्पष्ट एवं सम्मानपूर्ण संवाद से विश्वास का वातावरण तैयार किया जा सकता है।

रोगी अपनी समस्या खुलकर चिकित्सक को बताए और चिकित्सक भी उसकी बात को गंभीरता से सुने तो उपचार के दौरान पैदा होने वाली कई परेशानियों को दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रोगी को उपचार के संबंध में जानकारी उसकी समझ के अनुरूप दी जानी चाहिए। उन्होंने समाज में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक समाज बीमारी की गंभीरता को समय रहते समझ सकता है और उचित चिकित्सा सुविधा लेने में भी पीछे नहीं रहता।
मुख्य विचारक डॉ. डी.वी. शर्मा ने परिचर्चा में रोगियों के दृष्टिकोण को प्रमुखता से रखते हुए कहा कि रोगी चिकित्सक के पास केवल बीमारी का उपचार कराने नहीं बल्कि विश्वास और उम्मीद लेकर आता है। रोगी चाहता है कि चिकित्सक उसकी बात को धैर्यपूर्वक सुने, उसकी आशंकाओं को समझे और उपचार के संबंध में उसे सरल भाषा में स्पष्ट जानकारी दे।
कई बार चिकित्सकीय शब्दावली रोगी के लिए कठिन होती है। ऐसे में यदि चिकित्सक सहज भाषा में बीमारी और उपचार की स्थिति समझाता है तो रोगी को अपनी स्थिति बेहतर तरीके से समझ आती है। चिकित्सक का संवेदनशील एवं मानवीय व्यवहार रोगी के विश्वास को मजबूत करता है और उपचार के प्रति सकारात्मक भावना पैदा करता है। उन्होंने कहा कि रोगी को यह महसूस होना चाहिए कि चिकित्सक उसकी समस्या को समझने और उसके उपचार में पूरी गंभीरता के साथ प्रयास कर रहा है।
कार्यक्रम की स्वागताध्यक्ष डॉ. अलका सेन ने स्वागत भाषण देते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित लोगों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि चिकित्सक-रोगी संबंध केवल बीमारी और उपचार का संबंध नहीं बल्कि विश्वास, संवेदना और मानवीय जुड़ाव का संबंध है। चिकित्सक के पास आने वाला प्रत्येक रोगी अलग परिस्थिति और मानसिक स्थिति के साथ आता है।
इसलिए उसके साथ संवेदनशील व्यवहार जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज और चिकित्सा जगत के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। समाज के लोगों को भी चिकित्सा व्यवस्था की चुनौतियों और चिकित्सकों की भूमिका को समझना चाहिए। इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी रोगियों की अपेक्षाओं और उनकी मानसिक स्थिति को समझना चाहिए।
कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन संतोष कुलश्रेष्ठ ने किया। उन्होंने कार्यक्रम को क्रमबद्ध एवं सहज रूप से संचालित करते हुए सभी वक्ताओं को विषय के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखने का अवसर दिया। परिचर्चा के दौरान चिकित्सक-रोगी संबंध से जुड़े व्यवहारिक पक्षों पर भी विचार सामने आए।
कार्यक्रम के अंत में सचिव राकेश चन्द्र शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि चिकित्सक-रोगी संबंध केवल उपचार तक सीमित नहीं है बल्कि यह विश्वास और मानवीय संवेदना का संबंध है। उन्होंने कहा कि दिव्य सेवा ट्रस्ट ऐसे विषयों पर सार्थक संवाद के माध्यम से समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने तथा जनहित के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित है।
इस अवसर पर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने संस्था की गतिविधियों की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि दिव्य सेवा ट्रस्ट आगरा वर्ष 2017 से स्वास्थ्य, शिक्षा, साहित्य, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में निरंतर जनसेवा के कार्य कर रहा है। ट्रस्ट की संस्थापिका डॉ. अरुणा गुप्ता के मार्गदर्शन एवं प्रयासों से संस्था की ओर से विभिन्न जनहितकारी कार्यक्रमों का आयोजन निरंतर किया जा रहा है। संस्था की ओर से स्वास्थ्य और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर संवाद स्थापित करने तथा लोगों को जागरूक करने के प्रयास किए जाते रहे हैं।
कार्यक्रम के दौरान सोनिका अग्रवाल के निर्देशन में उनकी शिष्याओं ने कथक नृत्य की प्रस्तुति दी। सांस्कृतिक प्रस्तुति ने कार्यक्रम में अलग रंग भर दिया। उपस्थित अतिथियों और दर्शकों ने कथक प्रस्तुति को सराहा। कार्यक्रम को सफल बनाने में अध्यक्ष डॉ. अलका सेन, सचिव राकेश चन्द्र शुक्ला, कोषाध्यक्ष डॉ. संजय सेन, संरक्षक संतोष कुलश्रेष्ठ, उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी सौरभ कुलश्रेष्ठ सहित ट्रस्ट के सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
कार्यक्रम में डॉ. अशोक गुप्ता, डॉ. हरिनारायण चतुर्वेदी, डॉ. आर.वी. सिंह, डॉ. शिवंकर, सोनिका अग्रवाल, सुशील कुमार, डॉ. अनिल शाश्वत, चंद्रशेखर शर्मा, जगमोहन गुप्ता, डॉ. हरेंद्र सिंह चौहान, शुचिता हरवीर, डॉ. मीनाक्षी वर्मा और मृदुल सहित अनेक चिकित्सक, समाजसेवी, बुद्धिजीवी एवं विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। परिचर्चा में चिकित्सक-रोगी संबंध को और अधिक भरोसेमंद, संवेदनशील एवं मानवीय बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
