आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के 92वें दीक्षांत समारोह से पूर्व आयोजित दो दिवसीय दीक्षोत्सव में भारतीय पारंपरिक खेलों की रंगत देखने को मिली। छलेसर परिसर में आयोजित प्रतियोगिताओं में बालक और बालिका वर्ग के खिलाड़ियों ने खो-खो, कबड्डी, रस्साकशी, गिल्ली-डंडा, रूमाल झपट्टा, सतोलिया, लंगड़ी टांग और स्टॉपू जैसी प्रतियोगिताओं में उत्साहपूर्वक भाग लिया। अंतिम दिन विजेताओं की घोषणा कर प्रतिभाग प्रमाण पत्र वितरित किए गए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पारंपरिक खेलों को भारतीय संस्कृति की पहचान बताते हुए इनके संरक्षण और नई पीढ़ी से जुड़ाव पर विशेष जोर दिया।

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के 92वें दीक्षांत समारोह से पहले आयोजित दीक्षोत्सव के अंतर्गत छलेसर परिसर स्थित शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद विभाग में 17 और 18 जुलाई को दो दिवसीय पारंपरिक खेलकूद प्रतियोगिताओं का सफल आयोजन किया गया। कुलपति प्रो. आशु रानी के निर्देशन में आयोजित इस आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय पारंपरिक खेलों से जोड़ना, खेल भावना को प्रोत्साहित करना और देश की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना था। दो दिनों तक विश्वविद्यालय परिसर खेल भावना, उत्साह और प्रतिस्पर्धा के माहौल से सराबोर रहा, जहां विद्यार्थियों ने पूरे जोश और अनुशासन के साथ अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

प्रतियोगिता के अंतिम दिन सभी खेलों के परिणाम घोषित किए गए और विजेता तथा उपविजेता खिलाड़ियों को सम्मानित किया गया। साथ ही प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी खिलाड़ियों को प्रतिभाग प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। आयोजन के दौरान यह संदेश भी दिया गया कि भारतीय पारंपरिक खेल केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक पहचान, शारीरिक दक्षता और सामाजिक समरसता के मजबूत आधार हैं।

बालिका वर्ग की प्रतियोगिताओं में कई संस्थानों ने शानदार प्रदर्शन किया। खो-खो प्रतियोगिता में बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय ने विजेता बनने का गौरव हासिल किया, जबकि शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर उपविजेता रहा। कबड्डी प्रतियोगिता में शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर ने पहला स्थान प्राप्त किया और माता भगवती देवी, अविलखेड़ा उपविजेता रही। रूमाल झपट्टा प्रतियोगिता का खिताब बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय ने अपने नाम किया, जबकि शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर दूसरे स्थान पर रहा। गिल्ली-डंडा प्रतियोगिता में माता भगवती देवी, अविलखेड़ा विजेता और शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर उपविजेता बना। रस्साकशी तथा सतोलिया दोनों प्रतियोगिताओं में शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए पहला स्थान हासिल किया, जबकि दोनों स्पर्धाओं में बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय उपविजेता रहा। लंगड़ी टांग प्रतियोगिता में माता भगवती देवी, अविलखेड़ा विजेता रही और बैकुण्ठी देवी कन्या महाविद्यालय दूसरे स्थान पर रहा। वहीं स्टॉपू प्रतियोगिता में शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर परिसर ने जीत दर्ज की।

पुरुष वर्ग में भी खिलाड़ियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। खो-खो प्रतियोगिता में भगत सिंह हाउस विजेता और वीर सावरकर हाउस उपविजेता रहा। रस्साकशी प्रतियोगिता में शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर परिसर ने पहला स्थान प्राप्त किया, जबकि आई.एस.एस. पालीवाल परिसर उपविजेता रहा। गिल्ली-डंडा प्रतियोगिता में आई.एस.एस. पालीवाल परिसर ने बाजी मारी और शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर परिसर दूसरे स्थान पर रहा। रूमाल झपट्टा तथा कबड्डी प्रतियोगिता दोनों में शारीरिक शिक्षा विभाग, छलेसर परिसर विजेता बना, जबकि आई.एस.एस. पालीवाल परिसर उपविजेता रहा। सतोलिया प्रतियोगिता में वीर सावरकर हाउस ने पहला स्थान हासिल किया और भगत सिंह हाउस उपविजेता रहा। स्टॉपू प्रतियोगिता का खिताब छलेसर परिसर ने अपने नाम किया।

समापन अवसर पर विभागाध्यक्ष एवं खेल निदेशक डॉ. अखिलेश चंद्र सक्सैना ने सभी विजेता और उपविजेता खिलाड़ियों को बधाई देते हुए कहा कि भारतीय पारंपरिक खेल केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण आधार हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, टीम भावना, पारस्परिक सहयोग और राष्ट्रप्रेम जैसे गुणों का विकास करते हैं। आधुनिक जीवनशैली में जहां युवाओं का झुकाव डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रहा है, वहीं पारंपरिक खेल उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रखने के साथ भारतीय संस्कृति से भी जोड़ते हैं।

उन्होंने प्रतियोगिता के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले सभी शिक्षकों, कर्मचारियों और निर्णायकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को और अधिक व्यापक स्तर पर आयोजित करेगा, ताकि अधिक से अधिक विद्यार्थी भारतीय पारंपरिक खेलों से जुड़ सकें और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।
पूरे आयोजन के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में उत्साहपूर्ण वातावरण देखने को मिला। खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन और दर्शकों के उत्साह ने यह साबित किया कि आधुनिक खेलों की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद भारतीय पारंपरिक खेल आज भी युवाओं के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए हैं। यही कारण है कि विश्वविद्यालय ने दीक्षोत्सव जैसे महत्वपूर्ण आयोजन में पारंपरिक खेलों को विशेष स्थान देकर विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया।
कार्यक्रम के दौरान प्रो. अनुपम सक्सैना, डॉ. विजय चौधरी, डॉ. उरदेव सिंह तोमर, डॉ. नरेंद्र पाल सिंह, डॉ. श्याम सुंदर, डॉ. सुनीता, डॉ. सिंधुज चौहान, डॉ. महेश सिंह और डॉ. सतेन्द्र सिंह उपस्थित रहे। प्रतियोगिता का संचालन सहायक आचार्य रवि शंकर वर्मा ने किया। आयोजन के सफल समापन के साथ विश्वविद्यालय ने यह संदेश दिया कि यदि पारंपरिक खेलों को निरंतर प्रोत्साहन मिलता रहा, तो वे आने वाली पीढ़ियों में भी उतने ही लोकप्रिय रहेंगे जितने कभी भारतीय समाज की पहचान हुआ करते थे।

