आगरा। नकली, री-लेबलिंग की गई और बिना अनुमति बेची जा रही दवाओं के खिलाफ खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। 10 जुलाई को शहर के प्रमुख दवा बाजारों में एक साथ छापेमारी कर 13 फर्मों की जांच की गई। कई प्रतिष्ठानों को सील किया गया, 35 दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजे गए और तीन नए मुकदमे दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है। जांच में फर्जी बिल, सरकारी अस्पतालों की दवाओं की खुले बाजार में बिक्री, नकली दवाओं का कारोबार और री-लेबलिंग जैसे गंभीर मामले सामने आए हैं। विभाग का कहना है कि मरीजों की जान से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

आगरा में नकली और अवैध दवाओं के कारोबार पर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने एक बार फिर बड़ा प्रहार किया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर चलाए जा रहे अभियान के तहत विभाग लगातार ऐसे नेटवर्क को खत्म करने में जुटा है, जो लोगों तक असुरक्षित और नकली दवाएं पहुंचा रहे हैं। इसी क्रम में 10 जुलाई को आयुक्त के नेतृत्व में 15 औषधि निरीक्षकों की संयुक्त टीम ने शहर के कई प्रमुख दवा बाजारों में एक साथ जांच अभियान चलाया।

टीम ने कम्बूटोला, मुबारक महल, जूता बाजार और नवाबिया मार्केट सहित कई क्षेत्रों में 13 फर्मों की जांच की। इस दौरान मोहन ट्रेडर्स और मनी मेडिकल के परिसर सील कर दिए गए, जबकि नीलकंठ और मनु फार्मा सहित कुछ अन्य प्रतिष्ठानों के रिकॉर्ड और स्टॉक पर रोक लगाई गई। जांच के दौरान 35 संदिग्ध दवाओं के नमूने लेकर उन्हें परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भेजा गया।
विभाग के अनुसार इस अभियान में सामने आए तथ्यों के आधार पर नकली दवाओं के कारोबार से जुड़े लोगों के खिलाफ तीन नए मुकदमे दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आरोप है कि कई कारोबारी मिलकर नकली दवाओं की खरीद-बिक्री, फर्जी बिल तैयार करने और बिना अनुमति दवाओं का भंडारण कर रहे थे।
जांच के दौरान विभोर मेडिकल एजेंसी से जुड़े मामले में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पता चला कि चर्चित दवाओं की खरीद के लिए जिन बिलों का इस्तेमाल किया गया, वे फर्जी थे। जिन फर्मों के नाम पर खरीद दिखाई गई थी, उन्होंने ऐसे किसी लेनदेन से साफ इनकार कर दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कागजों पर तैयार किए गए बिलों का इस्तेमाल अवैध कारोबार को छिपाने के लिए किया जा रहा था।
इसी जांच में वरदान मेडिकल एजेंसी से ऐसी दवाएं भी मिलीं, जिन पर स्पष्ट रूप से लिखा था कि वे केवल सरकारी आपूर्ति के लिए हैं और बाजार में बिक्री के लिए नहीं हैं। बाद में इन दवाओं की प्रयोगशाला जांच और निर्माता कंपनी की पुष्टि में कुछ दवाएं नकली तथा कुछ गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरीं। पूछताछ में यह भी सामने आया कि ये दवाएं बिना पक्के बिल के कम कीमत पर खरीदी गई थीं।
जांच के आधार पर विभाग ने माना कि कई फर्में एक-दूसरे से जुड़कर संगठित तरीके से नकली और सरकारी आपूर्ति की दवाओं का कारोबार कर रही थीं। ऐसे मामलों में संबंधित कारोबारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
एक अन्य मामले में अस्पतालों के लिए भेजी जाने वाली जीवनरक्षक दवाओं की री-लेबलिंग का खुलासा हुआ। मई में हुई जांच के दौरान युग फार्मा में इंसुलिन इंजेक्शन बिना निर्धारित तापमान व्यवस्था के रखे मिले। इन पर लगे मूल विवरण हटाकर नए लेबल लगाए गए थे। पूछताछ में यह दवाएं दूसरी फर्म से बिना बिल खरीदे जाने की बात सामने आई।
इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया तो शारदा फार्मा और आरएमडी फार्मा भी जांच के घेरे में आ गईं। सीसीटीवी फुटेज की जांच में दिखाई दिया कि छापे की जानकारी मिलते ही कुछ लोग पीछे के रास्ते से संदिग्ध दवाओं के डिब्बे लेकर निकल गए। बाद में एसटीएफ ने उनसे पूछताछ की तो यह सामने आया कि सरकारी अस्पतालों की दवाएं सस्ते दाम पर खरीदकर उन पर लगे पहचान चिह्न हटाए जाते थे। इसके बाद नए लेबल और नई कीमत लगाकर उन्हें खुले बाजार में बेचा जाता था।
विभाग का कहना है कि यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है। इसलिए इस मामले में भी संबंधित कारोबारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
जुलाई की शुरुआत में हुई एक अन्य जांच में वी.ए. मेडिकोज सहित कई प्रतिष्ठानों पर भी अनियमितताएं मिलीं। यहां कई नामी कंपनियों की दवाओं के खरीद संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ दवाओं के पुराने लेबल हटाकर नए लेबल लगाए गए थे। सुरक्षा जांच में कुछ दवाएं पहली नजर में ही नकली प्रतीत हुईं।
पूछताछ में सामने आया कि इन दवाओं की आपूर्ति ऐसी फर्म से दिखाई गई थी, जिसका लाइसेंस पहले ही निरस्त किया जा चुका था। इसके अलावा बंद हो चुकी फर्मों के पुराने बिलों का इस्तेमाल कर कागजी लेनदेन दिखाया जा रहा था। जांच में कई फर्जी बिल और दस्तावेज भी मिले, जिनके आधार पर विभाग ने इसे संगठित नेटवर्क का हिस्सा माना है।
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के अनुसार मई से अब तक आगरा में 3.63 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की नकली, अवैध और सरकारी आपूर्ति की दवाएं जब्त की जा चुकी हैं। अभियान के दौरान इंसुलिन, वैक्सीन, फिजिशियन सैंपल और कई जीवनरक्षक दवाओं की बड़ी खेप पकड़ी गई है। जांच के दौरान उत्तर प्रदेश के बाहर तक फैले नेटवर्क के भी संकेत मिले हैं।
अब तक जांच में अनियमितता पाए जाने पर 58 थोक दवा लाइसेंस निरस्त या निलंबित किए जा चुके हैं। पहले दर्ज किए गए छह मुकदमों के अलावा तीन और नए मुकदमे दर्ज कराने की कार्रवाई की जा रही है।
आयुक्त ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि नकली दवाओं, री-लेबलिंग, फिजिशियन सैंपल की अवैध बिक्री और इनके दूसरे जिलों में भेजे जाने पर लगातार निगरानी रखी जाए। साथ ही यदि दवा कारोबारियों से किसी प्रकार की अवैध वसूली की शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
विभाग का कहना है कि यह अभियान आगे भी जारी रहेगा और मरीजों की सुरक्षा से समझौता करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
