आगरा। विकास भवन सभागार में आयोजित जिला टॉस्क फोर्स (डीटीएफ) की बैठक में शिक्षा व्यवस्था को लेकर सख्त रुख देखने को मिला। स्कूल चलो अभियान के तहत नामांकन लक्ष्य पूरा न होने पर नाराजगी जताई गई और शून्य नामांकन वाले विद्यालयों में तत्काल सुधार के निर्देश दिए गए। साथ ही दिव्यांग बच्चों, छात्राओं की पढ़ाई, मध्यान्ह भोजन योजना और जर्जर विद्यालयों के कार्यों को लेकर भी कई अहम निर्देश जारी किए गए।

शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और योजनाओं की जमीनी स्थिति की समीक्षा के लिए बुधवार को विकास भवन सभागार में जिला टॉस्क फोर्स (डीटीएफ) की बैठक आयोजित की गई। बैठक में मिशन प्रेरणा फेस-2, निपुण भारत मिशन और मध्यान्ह भोजन योजना के प्रभावी संचालन पर विस्तार से चर्चा हुई।
स्कूल चलो अभियान पर जताई नाराजगी
बैठक में स्कूल चलो अभियान के अंतर्गत विद्यालयों में प्रवेश लक्ष्य पूरा न होने पर नाराजगी व्यक्त की गई। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि अभियान का लगातार अनुश्रवण करते हुए अगले महीने तक निर्धारित लक्ष्य हर हाल में पूरा कराया जाए।
समीक्षा के दौरान जानकारी दी गई कि 19 मई तक जिले में 251 ऐसे विद्यालय थे, जहां एक भी बच्चे का नामांकन नहीं हुआ था। हालांकि लगातार प्रयासों के बाद यह संख्या घटकर अब 59 विद्यालयों तक पहुंच गई है। इसके बावजूद इसे संतोषजनक नहीं माना गया और निर्देश दिए गए कि अगले दो दिनों में इन विद्यालयों में भी नामांकन सुनिश्चित कराया जाए।
छात्राओं के ड्रॉप आउट पर विशेष फोकस
बैठक में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) में छात्राओं और स्टाफ की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। इसके अलावा आठवीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ने वाली छात्राओं की पहचान कर उन्हें राजकीय इंटर कॉलेजों में प्रवेश दिलाने की जिम्मेदारी तय की गई।
केजीबीवी विद्यालयों में चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर भी सख्ती दिखाई गई। निर्देश दिए गए कि एक सप्ताह के भीतर सभी लंबित कार्य पूरे कर विद्यालयों को हस्तगत कराने की प्रक्रिया पूरी की जाए।
दिव्यांग बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की तैयारी
बैठक में दिव्यांग बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों से कहा गया कि शासनादेश के अनुसार कार्य करते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी दिव्यांग बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि वे स्पेशल एजुकेटर के साथ समन्वय बनाकर बच्चों की पहचान करें और सभी ब्लॉकों में कार्ययोजना तैयार करते हुए जुलाई से पहले नामांकन प्रक्रिया पूरी करें।
किताबें नहीं पहुंचीं तो होगी कार्रवाई
बैठक में सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि बच्चों तक किताबें और कार्य पुस्तकें शत-प्रतिशत पहुंचाई जाएं। कहा गया कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
मध्यान्ह भोजन योजना के निरीक्षण को लेकर भी निर्देश जारी किए गए। अधिकारियों से कहा गया कि निरीक्षण के दौरान विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की निगरानी करें और निरीक्षण से जुड़ी तस्वीरें संबंधित समूहों पर साझा करना सुनिश्चित करें।
आरटीई पर भी सख्ती
बैठक में उन प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों की समीक्षा भी की गई, जिनके भवन निर्माण कार्य 70, 80 और 90 प्रतिशत तक पूरे हो चुके हैं। निर्देश दिए गए कि ऐसे सभी कार्य एक सप्ताह के भीतर पूरे कराए जाएं। इसके अलावा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत बच्चों को प्रवेश नहीं देने वाले निजी विद्यालयों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ऐसे विद्यालयों की मान्यता प्रत्याहरण की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए।
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गजब व्यवस्था: एक महीने में शून्य दाखिले, पांच दिन में 196 स्कूल भर गए! सवालों में स्कूल चलो अभियान
आगरा। जिले की बेसिक शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जिस काम को पूरा करने में पूरे महीने का स्कूल चलो अभियान सफल नहीं हो सका, वह प्रशासन की सख्ती के बाद महज पांच दिनों में होता दिखाई देने लगा। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पूरा महीना अभियान जमीन पर चल रहा था या सिर्फ कागजों में?
नए शिक्षा सत्र की शुरुआत से लेकर पूरे एक महीने तक जिले के 302 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय ऐसे रहे, जहां एक भी नए बच्चे का दाखिला नहीं हुआ। अभियान चलता रहा, नारे लगते रहे, बैठकें होती रहीं, लेकिन बच्चों के कदम स्कूलों तक नहीं पहुंचे। जब समीक्षा बैठक में बेसिक शिक्षा अधिकारी जितेंद्र कुमार गोंड ने स्थिति पर नाराजगी जताई। निर्देश दिए गए, लेकिन हालात जस के तस बने रहे।
जब मामला जिलाधिकारी मनीष बंसल के संज्ञान में पहुंचा तो प्रशासनिक मशीनरी अचानक सक्रिय हो गई। मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह को समिति गठित कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके बाद बेसिक शिक्षा विभाग और बीईओ स्तर पर तेजी दिखने लगी। तीन सदस्यीय समिति बनाई गई और गांव-गांव अभियान चलाने के आदेश जारी हुए।
फिर जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने खुद कई सवाल खड़े कर दिए। महज पांच दिनों में 302 में से 196 स्कूलों में दाखिले दर्ज हो गए। पहले जहां 106 विद्यालयों में प्रवेश शून्य था, अब विभाग का दावा है कि इनमें से भी स्थिति सुधरी है और अब सिर्फ 59 विद्यालय ऐसे बचे हैं, जहां अभी भी नए बच्चों का प्रवेश नहीं हुआ है। विभाग का कहना है कि जल्द ही वहां भी लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो काम पूरे महीने के अभियान से नहीं हो पाया, वह पांच दिन में कैसे संभव हो गया? क्या पहले अभियान केवल फाइलों और रिपोर्टों में चल रहा था या फिर बाद में आंकड़ों को सुधारने की कवायद शुरू हुई?
विडंबना यह भी है कि जिले में लगभग 900 विद्यालयों में बाल वाटिका उत्सव का आयोजन कराया गया। प्रत्येक विद्यालय को तीन-तीन हजार रुपये उपलब्ध कराए गए। इस हिसाब से करीब 27 लाख रुपये खर्च हुए। उद्देश्य बच्चों और अभिभावकों को स्कूलों से जोड़ना था। इसके अलावा “स्कूल चलो अभियान” भी बड़े स्तर पर चलाया गया। लेकिन सवाल यह है कि जब लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी एक महीने तक सैकड़ों विद्यालयों में एक भी बच्चा स्कूल नहीं पहुंचा, तो इन आयोजनों और अभियानों की वास्तविक उपयोगिता क्या रही?
अब शिक्षा विभाग अपनी उपलब्धियां गिना रहा है, लेकिन यह पूरा मामला जिले की निगरानी व्यवस्था और जमीनी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि प्रशासनिक सख्ती के बिना व्यवस्था चल ही नहीं सकती, तो पूरे महीने जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी आखिर क्या कर रहे थे?

