आगरा। देश में लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों को रोकने के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग ने सड़क सुरक्षा, ट्रैफिक इंजीनियरिंग और ट्रॉमा केयर पर विशेषज्ञों की कार्यशाला आयोजित की। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने सड़क दुर्घटनाओं के कारण, बचाव के उपाय, सरकार की मुफ्त उपचार योजना, रोड रेज से बचाव और यातायात नियमों के पालन पर विस्तृत चर्चा करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि बेहतर सड़क व्यवस्था, जागरूकता, सख्त प्रवर्तन और समय पर चिकित्सा सहायता से हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।

सड़क दुर्घटनाएं देश में मौत का एक बड़ा कारण बनती जा रही हैं। इसी गंभीर विषय पर एसएन मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग ने गुरुवार को ‘भारतीय सड़कों पर मृत्यु दर का खतरनाक रुझान’ (Alarming Trend of Fatalities on Indian Roads) विषय पर कार्यशाला एवं प्रस्तुतीकरण का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य ट्रैफिक इंजीनियरिंग और ट्रॉमा केयर के बेहतर समन्वय के माध्यम से सड़क हादसों में होने वाली मौतों को कम करने के उपायों पर मंथन करना था।
कार्यक्रम में मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रो. प्रशांत गुप्ता, एडीसीपी ट्रैफिक अलका तथा वरिष्ठ बाल रोग सर्जन एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ मौजूद रहे। कार्यशाला में चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, संकाय सदस्यों, जूनियर रेजिडेंट्स और एमबीबीएस छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।
एडीसीपी ट्रैफिक अलका ने बताया कि दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली हर सात मौतों में से एक मौत भारत में होती है। उन्होंने कहा कि अचानक यू-टर्न, सड़क निर्माण की खामियां, यातायात नियमों की अनदेखी और लापरवाही हादसों के प्रमुख कारण हैं।
उन्होंने सड़क सुरक्षा के लिए 4E मॉडल को सबसे प्रभावी बताते हुए कहा कि इंजीनियरिंग के तहत सुरक्षित सड़क निर्माण और उचित साइनेज, एजुकेशन के माध्यम से लोगों में जागरूकता, एन्फोर्समेंट के जरिए यातायात नियमों का सख्ती से पालन और इमरजेंसी केयर के अंतर्गत दुर्घटना के बाद गोल्डन ऑवर में त्वरित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि सरकार की पीएम राहत योजना के तहत सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को 2.5 लाख रुपये तक का निशुल्क उपचार उपलब्ध कराया जाता है।
मुख्य वक्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने सड़क दुर्घटनाओं के वैज्ञानिक विश्लेषण, ट्रॉमा मैनेजमेंट और ट्रैफिक इंजीनियरिंग पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि सड़क हादसों को केवल चिकित्सा व्यवस्था या पुलिस कार्रवाई से नहीं रोका जा सकता, बल्कि इंजीनियरिंग, प्रशासन, चिकित्सा विज्ञान और सामाजिक जागरूकता के समन्वित प्रयासों से ही प्रभावी बदलाव संभव है।
उन्होंने अपनी पुस्तक सूनामी ऑन रोड्स का उल्लेख करते हुए बताया कि इसमें सड़क दुर्घटनाओं के कारणों, रोकथाम के उपायों तथा ट्रैफिक इंजीनियरिंग और ट्रॉमा केयर के समन्वय पर विस्तार से चर्चा की गई है। उनका कहना था कि यदि दुर्घटना स्थल से अस्पताल तक की पूरी व्यवस्था वैज्ञानिक ढंग से विकसित हो जाए तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
प्रधानाचार्य प्रो. प्रशांत गुप्ता ने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। उन्होंने सभी से यातायात नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करने की अपील की। साथ ही अस्पताल और सार्वजनिक स्थानों पर व्यवस्थित पार्किंग व्यवस्था के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि गलत तरीके से खड़े वाहन कई बार एम्बुलेंस की आवाजाही में बाधा बन जाते हैं, जिससे गंभीर मरीजों तक समय पर चिकित्सा सहायता नहीं पहुंच पाती।
सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश गुप्ता ने वाहन चालकों से धैर्य बनाए रखने और रोड रेज से बचने की अपील करते हुए कहा कि क्षणिक गुस्सा बड़ी दुर्घटनाओं और गंभीर विवादों का कारण बन सकता है। सुरक्षित ड्राइविंग के लिए संयम और अनुशासन सबसे जरूरी है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. करन रावत ने किया। इस अवसर पर उपप्रधानाचार्य डॉ. टी.पी. सिंह, डॉ. अरुण राठौर, डॉ. जे.पी.एस. शाक्य, डॉ. अनुभव गोयल, डॉ. मयंक अग्रवाल, डॉ. गौरव धाकरे, डॉ. तरुणेश शर्मा, डॉ. अतिहर्ष मोहन, डॉ. योगिता, डॉ. अलका यादव, डॉ. सी.पी. गौतम, डॉ. गीतू सिंह, डॉ. प्रीति भारद्वाज सहित अनेक संकाय सदस्य, जूनियर रेजिडेंट्स एवं एमबीबीएस छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि बेहतर सड़क निर्माण, प्रभावी ट्रैफिक प्रबंधन, यातायात नियमों का पालन, सामाजिक जागरूकता और समय पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सहायता के संयुक्त प्रयासों से सड़क हादसों में होने वाली मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। यही इस कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश रहा।
