– छात्रों की पढ़ाई हो रही प्रभावित, छात्र संख्या के हिसाब से नहीं हुई पर्याप्त छपाई
आगरा। शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शुरुआत से पहले ही आगरा में एनसीईआरटी की किताबों की भारी किल्लत ने शिक्षा व्यवस्था की तैयारियों की पोल खोल दी है। विभागीय स्तर पर यह दावा किया गया था कि सत्र शुरू होने से पहले सभी छात्रों को सस्ती दरों पर एनसीईआरटी की किताबें उपलब्ध करा दी जाएंगी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। खासतौर पर कक्षा 9 और 11 के विद्यार्थियों को किताबों के लिए भटकना पड़ रहा है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

जिले में माध्यमिक शिक्षा परिषद के कुल 931 स्कूल संचालित हैं। इनमें 40 राजकीय विद्यालय, 109 सहायता प्राप्त इंटर कॉलेज और 782 वित्तविहीन स्कूल शामिल हैं। इन संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या काफी बड़ी है। आंकड़ों के अनुसार कक्षा 9 में 59,783 और कक्षा 11 में 53,843 छात्र पंजीकृत हैं। यानी केवल इन दो कक्षाओं में ही 1,13,626 विद्यार्थी किताबों पर निर्भर हैं। वहीं हाईस्कूल (कक्षा 10) में 60,377 और इंटरमीडिएट (कक्षा 12) में लगभग 61,551 छात्र पंजीकृत हैं। इस तरह कक्षा 9 से 12 तक कुल 2,35,554 छात्र हैं, जबकि कक्षा 6 से 8 तक करीब 50 हजार विद्यार्थी अलग से हैं। इतने बड़े छात्र वर्ग के मुकाबले किताबों की आपूर्ति बेहद कम साबित हो रही है।
प्रकाशन से जुड़े लोगों का कहना है कि किताबों की छपाई तय लक्ष्य के अनुसार की गई है, लेकिन यह लक्ष्य ही वास्तविक मांग से काफी कम था। मेसर्स पायनियर प्रिंटर्स से जुड़े रुचिर बंसल के अनुसार अब तक करीब ढाई लाख किताबें छापी जा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश के लगभग 22 लाख छात्रों के लिए तीन पब्लिशर्स को जिम्मेदारी दी गई है। किताबों के मुख्य आवरण पेज सरकार की ओर से उपलब्ध कराए जाते हैं और प्रकाशक रॉयल्टी जमा कर छपाई करते हैं। उनका कहना है कि हाल ही में आगरा भेजी गई किताबों की एक खेप बाजार में पहुंचते ही खत्म हो गई, जिससे साफ है कि मांग के मुकाबले आपूर्ति बेहद कम है।
शिक्षक संगठनों ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बाजार में एनसीईआरटी की किताबें उपलब्ध न होने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और अभिभावक भी परेशान हैं। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के मंडलीय मंत्री अजय शर्मा ने बताया कि उन्होंने संयुक्त शिक्षा निदेशक से किताबों का मेला लगाने की मांग की थी, ताकि एक स्थान पर छात्रों को किताबें आसानी से मिल सकें। हालांकि आश्वासन के बावजूद अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
शिक्षकों ने यह भी मुद्दा उठाया कि पहले कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों को मुफ्त में किताबें उपलब्ध कराई जाती थीं, लेकिन पिछले दो वर्षों से यह व्यवस्था बंद कर दी गई है। इसके स्थान पर प्रेरणा पोर्टल पर पंजीकरण की बात कही गई, लेकिन इसमें भी कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं। शिक्षकों का कहना है कि यदि स्कूल प्रेरणा पोर्टल पर पंजीकरण करते हैं तो उन्हें मिड-डे मील योजना से भी जुड़ना पड़ता है, जबकि इसके लिए आवश्यक संसाधन और बजट स्पष्ट नहीं है।
ऑल स्कूल वेलफेयर एसोसिएशन (असवा) के पदाधिकारियों का कहना है कि किताबों की कमी के कारण स्कूलों में वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ रही है। कई जगह छात्र आपस में किताबें साझा कर पढ़ाई कर रहे हैं या फिर पुराने संस्करणों से काम चलाया जा रहा है। इससे पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है और नए सिलेबस को समझने में दिक्कतें आ रही हैं।
डीआईओएस चंद्रशेखर का कहना है कि हिंदी माध्यम की किताबें बाजार में उपलब्ध हैं और मुख्य रूप से अंग्रेजी माध्यम की किताबों की कमी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार उन्हें अभी तक किसी बड़े स्तर की शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन यदि कहीं समस्या है तो उसकी जांच कराकर जल्द समाधान कराया जाएगा। साथ ही जिला विद्यालय निरीक्षक से भी इस विषय में रिपोर्ट ली जाएगी।
हालांकि जमीनी स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि सत्र की शुरुआत में ही किताबों की कमी ने छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। यदि जल्द ही आपूर्ति व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई और परिणामों पर पड़ सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि शिक्षा विभाग, प्रकाशक और प्रशासन मिलकर त्वरित कदम उठाएं, ताकि सभी छात्रों को समय पर किताबें उपलब्ध कराई जा सकें और उनका शैक्षणिक सत्र बिना बाधा के सुचारु रूप से चल सके।
