आगरा। आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर उन्नाव के पास बुधवार सुबह हुए एक और भीषण सड़क हादसे ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था और एक्सप्रेसवे प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में 7 लोगों की मौत हुई है जबकि करीब 20 लोग घायल हुए हैं। शुरुआती जानकारी में चालक को झपकी आना, अत्यधिक थकान और तेज रफ्तार को कारण माना जा रहा है। यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से इस एक्सप्रेसवे पर लगातार हो रहे हादसों ने अब इसे राष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया है।

उन्नाव के पास सुबह पांच बजे हुआ दर्दनाक हादसा
बुधवार सुबह लगभग 5 बजे आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर उन्नाव जनपद के निकट एक डबल डेकर एसी बस हादसे का शिकार हो गई। जानकारी के अनुसार बस दिल्ली से बिहार जा रही थी। अचानक बस अनियंत्रित होकर पलट गई, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई।
इस दुर्घटना में 7 लोगों की मौत हो गई जबकि लगभग 20 लोग घायल हो गए। मृतकों में एक सब-इंस्पेक्टर और एक बंदी भी शामिल बताए गए हैं। प्रारंभिक कारणों में चालक को झपकी आना, थकान और अत्यधिक गति सामने आ रही है।
लगातार हो रहे हादसे बने राष्ट्रीय चिंता का विषय
यह दुर्घटना कोई पहली घटना नहीं है। विगत कुछ वर्षों में आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर लगातार दुर्घटनाएं होती रही हैं। सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया है कि अधिकतर हादसे रात 12 बजे से सुबह 8 बजे के बीच हो रहे हैं।
इन घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण “Sleeping on Wheels” यानी वाहन चलाते समय चालक को झपकी आना या अत्यधिक थकान बताया जा रहा है।
यूपीडा ने खुद स्वीकार किए थे गंभीर तथ्य
10 नवंबर 2025 को लखनऊ स्थित यूपी एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) मुख्यालय में मुख्य कार्यपालक अधिकारी की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी।
इस बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे की सड़क सुरक्षा को लेकर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया था।
बैठक में यूपीडा ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को स्वीकार किया था।
बताया गया था कि रात्रि 12 बजे से सुबह 8 बजे के बीच लगभग 70 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।
सर्दियों के दौरान रात्रिकालीन समय में गति सीमा 120 किलोमीटर प्रति घंटा से घटाकर 75 किलोमीटर प्रति घंटा करने पर सहमति बनी थी।
इसके अलावा ड्रोन आधारित दुर्घटना रिकॉर्डिंग, नया रोड सेफ्टी ऑडिट, डेटा एनालिस्ट की नियुक्ति, क्रैश बैरियर, ड्राइवर वेलनेस जोन, वे-साइड सुविधाएं, एआई आधारित ई-निगरानी और चालक थकान रोकने के लिए विश्राम क्षेत्र विकसित करने जैसे प्रस्तावों पर भी सहमति बनी थी। हादसे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जिन सुरक्षा उपायों पर सहमति बनी थी, उनका वास्तविक क्रियान्वयन आखिर कितना हुआ।
लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि सुरक्षा योजनाएं तैयार थीं तो फिर लगातार हादसों का सिलसिला क्यों जारी है।
54.7 प्रतिशत दुर्घटनाओं की वजह चालक की थकान
प्रस्तुतीकरण में प्रस्तुत अधिकृत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर कुल 7,024 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं।
इनमें 54.7 प्रतिशत दुर्घटनाओं का मुख्य कारण चालक की झपकी या अत्यधिक थकान बताया गया।
यदि यह तथ्य पहले से प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के संज्ञान में था तो कई गंभीर सवाल सामने आते हैं।
आखिर रात के समय 120 किलोमीटर प्रति घंटा जैसी तेज गति सीमा क्यों जारी रखी गई?
क्या “गति” को “जीवन” से अधिक महत्व दिया गया?
क्या चालक की जैविक सीमाओं को नजरअंदाज किया गया?
क्या एक्सप्रेसवे केवल गति प्रदर्शन का मंच बन गया है?
जब यमुना एक्सप्रेसवे पर रात्रि में गति सीमा कम की जा सकती है तो आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर ऐसा क्यों नहीं किया गया?
Sleeping on Wheels बनती जा रही सबसे बड़ी चुनौती
देश में सड़क सुरक्षा पर चर्चा अक्सर ओवरस्पीडिंग तक सीमित रहती है जबकि वास्तविकता यह है कि रात्रिकालीन लंबी दूरी के बस और ट्रक चालक लगातार वाहन चलाने के कारण अत्यधिक थकान, मानसिक दबाव और नींद की समस्या से जूझते हैं।
इसी कारण प्रस्तुतीकरण में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे।
प्रत्येक 40 से 50 किलोमीटर पर विश्राम क्षेत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया था।
रात्रि में चालकों के लिए मुफ्त डॉरमिटरी की व्यवस्था की बात कही गई थी।
₹5 में चाय और ₹20 में भोजन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा गया था।
ड्राइवर वेलनेस जोन विकसित करने और सड़क किनारे अवैध पार्किंग रोकने के लिए सुविधाएं बढ़ाने की बात कही गई थी।
लेकिन वर्तमान स्थिति में अधिकांश चालकों के पास पर्याप्त और सुरक्षित विश्राम सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
केवल स्पीड कैमरे नहीं, पूरी ई-निगरानी जरूरी
सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2025 के आदेश में स्पष्ट कहा था कि प्रत्येक चालक के लिए लेन अनुशासन अनिवार्य है।
इसके बावजूद वर्तमान ई-निगरानी व्यवस्था लगभग केवल ओवरस्पीडिंग तक सीमित है।
जबकि नियम 167A के अंतर्गत लेन उल्लंघन, मोबाइल फोन का उपयोग, सीट बेल्ट, हेलमेट, ओवरलोडिंग, ट्रिपल राइडिंग, घिसे हुए टायर और फिटनेस प्रमाणपत्र जैसे मामलों की निगरानी भी आवश्यक है।
यदि एआई आधारित निगरानी व्यवस्था पूरी तरह लागू होती तो अनेक दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था।
रोड सेफ्टी ऑडिट को लेकर भी बड़ा सवाल
प्रस्तुतीकरण में कहा गया था कि वर्ष 2019 के बाद कोई स्वतंत्र रोड सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ है, जबकि इस अवधि में वाहनों की संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है।
अब मांग उठ रही है कि आईआईटी दिल्ली, सीआरआरआई या किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्था से तत्काल नया रोड सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी. जैन ने कहा कि, गति रुक सकती है, जीवन नहीं। यदि आंकड़े स्वयं बता रहे हैं कि चालक की झपकी सबसे बड़ा कारण है तो केवल तेज गति को विकास कहना घातक भूल होगी। आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे को अब स्पीड कॉरिडोर नहीं बल्कि सेफ्टी कॉरिडोर बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। हर नई दुर्घटना यह प्रश्न पूछ रही है कि जिन सुरक्षा उपायों पर सहमति बनी थी, वे धरातल पर कब उतरेंगे।
केसी जैन ,वरिष्ठ अधिवक्ता
