- सुप्रीम कोर्ट में सड़क दुर्घटना पीड़ितों के कैशलेस इलाज पर अहम सुनवाई
- बीमा कंपनियों की देनदारी असीमित, लेकिन इलाज की सीमा ₹1,50,000 और 7 दिन तक
- उत्तर प्रदेश का विवादास्पद मोटर व्हीकल कानून भी न्यायालय में चर्चा में
आगरा। सुप्रीम कोर्ट ने आज सड़क दुर्घटना पीड़ितों के कैशलेस इलाज से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई की। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.बी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस विषय पर गंभीर चिंता जताई। वर्तमान में किसी भी सड़क दुर्घटना पीड़ित को अधिकतम ₹1,50,000 और सात दिन तक ही कैशलेस इलाज मिलता है। अब इस सीमा को बढ़ाने की उम्मीद बढ़ गई है क्योंकि गंभीर दुर्घटनाओं में यह राशि और अवधि पर्याप्त नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 6 अप्रैल को सौंपी गई समिति की रिपोर्ट पर ध्यान दिया, जिसमें कहा गया कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय यह सुनिश्चित करे कि क्या ₹1,50,000 या सात दिन की सीमा में दुर्घटना पीड़ितों को सही और पर्याप्त इलाज मिल पा रहा है या नहीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के. सी. जैन ने अदालत के सामने यह सवाल उठाया कि जब मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 162(1) के तहत बीमा कंपनियों की देनदारी असीमित है, तो इलाज पर ₹1,50,000 या सात दिन की सीमा क्यों लगाई जाती है। उन्होंने कहा कि जब किसी दुर्घटनाग्रस्त वाहन का थर्ड पार्टी बीमा होता है और बीमा कंपनी की जिम्मेदारी की कोई वित्तीय सीमा नहीं होती, तो पीड़ित को समय पर और पूरा इलाज क्यों न मिले। जैन ने यह भी बताया कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) का अवार्ड मिलने पर बीमा कंपनी ही पूरे खर्च को वहन करती है। ऐसे में कैशलेस इलाज की वर्तमान सीमा पीड़ितों के हितों के विपरीत है।
कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और न्याय मित्र गौरव अग्रवाल तथा सड़क मंत्रालय और समिति को निर्देश दिया कि वे इस पर विचार कर अगली सुनवाई में अपनी राय प्रस्तुत करें। समिति ने भी माना कि सामान्य दुर्घटनाओं में 98 प्रतिशत मामलों का इलाज ₹60,000 के भीतर हो जाता है। लेकिन एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली गंभीर दुर्घटनाओं में यह राशि और अवधि पर्याप्त नहीं होती। समिति ने सुझाव दिया कि कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाई जाए ताकि गंभीर रूप से घायल पीड़ितों को समय पर और बेहतर इलाज मिल सके।
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2019 से 2021 के बीच मोटर व्हीकल नियम उल्लंघन के मामलों को बंद करने के लिए बनाए गए विवादास्पद कानून का मामला भी सामने आया। यूपी सरकार के वकील ने बताया कि इस संबंध में जल्द ही आदेश जारी किया जाएगा और मंत्रिपरिषद ने इसे मंजूरी दे दी है। हालांकि गैर-शमनीय (non-compoundable) अपराधों या बार-बार नियम उल्लंघन के मामलों में मुक़दमे दोबारा शुरू होंगे और न्यायालय में उन्हें पुनः सुना जाएगा।
अधिवक्ता जैन ने इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना इस तरह का कानून बनाना अवैध है। उन्होंने चेतावनी दी कि उत्तर प्रदेश सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के मामले में देश में पहले स्थान पर है। ऐसे में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के डर को कम करना खतरनाक साबित हो सकता है।
इसके अलावा, जैन द्वारा दाखिल अन्य तीन याचिकाएं भी 12 मई 2026 को सूचीबद्ध की जाएंगी। उसी दिन कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ाने पर भी महत्वपूर्ण फैसला आने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत ने कैशलेस इलाज की सीमा बढ़ा दी, तो गंभीर दुर्घटनाओं में पीड़ितों को समय पर और बेहतर इलाज मिल सकेगा, जिससे जीवन रक्षा की संभावना बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सड़क दुर्घटना पीड़ितों के हितों की सुरक्षा के लिए न्यायालय गंभीर है। बीमा कंपनियों की देनदारी असीमित होने के बावजूद वर्तमान इलाज सीमा ने लंबे समय से असंतोष पैदा किया है। अदालत का यह कदम आने वाले समय में पीड़ितों के लिए राहत और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
