आगरा। दस नई टाउनशिप्स के नाम—सिंधुपुरम, गंगापुरम, यमुनापुरम, नर्मदापुरम—नदियों की पवित्रता को याद दिलाते हैं, लेकिन असली स्थिति भयावह है। यमुना नदी, जो कभी जीवनदायिनी थी, अब थकी और दम तोड़ती धारा लगती है। काला, बदबूदार, झाग और ठहराव से भरा पानी नदी के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। शहरों में रियल एस्टेट के चमकदार ब्रोशर और प्रदूषण का विरोधाभास स्पष्ट है। नदी को किसी टाउनशिप के नाम में नहीं, बल्कि साफ़ पानी और बहाव की जरूरत है।
आगरा और आसपास के शहरों में टाउनशिप्स का निर्माण तेजी से हो रहा है। इनका नाम पवित्र नदियों पर रखा जाना पहली नज़र में श्रद्धांजलि लगता है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। यमुना के किनारे घर खरीदने वाले लोग सपनों में जी रहे हैं, जबकि नदी की सांसें घुट रही हैं। दिल्ली से गुजरने वाला यमुना का छोटा सा हिस्सा दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में गिना जाता है। यहाँ पानी में घुली ऑक्सीजन लगभग नदारद है और जलीय जीवन की कोई संभावना नहीं बची। त्योहारों के समय लोग श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, लेकिन पानी बदबूदार झाग और रसायनों से भरा होता है।
सरकारें इस समस्या का समाधान अक्सर बजट और योजनाओं के आंकड़ों में ढूँढती हैं। कई योजनाओं और हज़ारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद नदी साफ़ नहीं हो रही। दिल्ली की सफाई परियोजनाएं मुख्यतः सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स पर निर्भर हैं, लेकिन इनकी संख्या कम, तकनीक पुरानी और रखरखाव अधूरा है। कई प्लांट आधी क्षमता पर चलते हैं, और अधिकतर सीवेज इन प्लांट्स तक भी नहीं पहुँचता। टूटे-फूटे सीवर और अवैध कनेक्शन सीधे नदी में गंदा पानी छोड़ते हैं।
गुरुग्राम और अन्य शहरों में भी यही समस्या देखी जा रही है। तेज़ी से बढ़ते शहरों में बुनियादी ढांचे का विकास प्रदूषण को रोकने के साथ नहीं हो पाया। औद्योगिक और घरेलू कचरा बिना पर्याप्त उपचार के यमुना में जाता है। क़ानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमजोर है। राज्य अपनी सीमाओं में काम करते हैं जबकि नदी किसी सरहद को नहीं मानती। एक जगह सुधार और दूसरी जगह प्रदूषण जारी होने से पूरी मेहनत व्यर्थ हो जाती है।
इसलिए अब जरूरत है सोच बदलने की। छोटे और विकेंद्रीकृत समाधान अपनाने होंगे, स्थानीय स्तर पर ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी होगी और प्राकृतिक तरीकों जैसे आर्द्रभूमि और हरित बफर ज़ोन को बढ़ावा देना होगा। प्रदूषण फैलाने वालों की जवाबदेही तय करनी होगी, निगरानी पारदर्शी और उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। सबसे अहम, यमुना बेसिन को एक समग्र इकाई की तरह देखने और राज्यों के बीच तालमेल बनाने की ज़रूरत है।
यमुना केवल पर्यावरण का मामला नहीं है। यह हमारी प्राथमिकताओं, शासन और संवेदनशीलता का आईना है। पैसा अकेले समाधान नहीं है। नीयत साफ़ होनी चाहिए और अमल सख़्त होना चाहिए। अब वक्त कम है, मोहलत समाप्त होने से पहले ठोस और ईमानदार प्रयास करना होगा।
यमुना को अब केवल एक चीज़ चाहिए—जीने का हक़।

