आगरा। सदर तहसील स्थित उप-निबंधक कार्यालयों में दिव्यांगजनों, महिलाओं और बुजुर्गों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव का मामला अब गंभीर रूप से प्रशासन के संज्ञान में आ गया है। उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने इस प्रकरण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी आगरा से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस कार्रवाई से न केवल जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है, बल्कि इन कार्यालयों में आवश्यक सुधारों की दिशा भी तय होगी, जिससे आम नागरिकों को बेहतर और सम्मानजनक सेवाएं मिल सकें।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन द्वारा मानवाधिकार आयोग के समक्ष प्रस्तुत शिकायत (संख्या 5010/2024/1/2026, दिनांक 18.03.2026) के माध्यम से उजागर हुआ। शिकायत में बताया गया कि सदर तहसील के प्रथम, द्वितीय एवं पंचम उप-निबंधक कार्यालयों में लिफ्ट, रैंप, व्हीलचेयर और पर्याप्त बैठने की व्यवस्था जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। इसके चलते दिव्यांगजन और बुजुर्गों को ऊपरी मंजिल तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं या किसी व्यक्ति के सहारे जाना पड़ता है, जो न केवल असुविधाजनक है बल्कि उनके अधिकारों और गरिमा के भी विपरीत है।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि कार्यालयों में अत्यधिक भीड़ के कारण लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है और कई बार खड़े रहना पड़ता है। महिलाओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है, जिससे उन्हें अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन स्थितियों को केवल प्रशासनिक असुविधा नहीं बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 40 एवं 41 के अनुसार सभी सार्वजनिक भवनों में सुगम्यता सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके तहत रैंप, लिफ्ट, व्हीलचेयर और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इन प्रावधानों का पालन न होना चिंता का विषय बना हुआ है। साथ ही, स्टाम्प एवं निबंधन विभाग राज्य सरकार के लिए राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है, जहां नागरिकों से शुल्क भी लिया जाता है, ऐसे में सुविधाओं का अभाव व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।
मानवाधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति राजीव लोचन मेहरोत्रा ने इस मामले में जिलाधिकारी आगरा को निर्देश दिए हैं कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाए और शिकायतकर्ता को भी जांच प्रक्रिया में शामिल किया जाए। आयोग ने स्पष्ट किया है कि विस्तृत रिपोर्ट 06 अप्रैल 2026 तक प्रस्तुत की जाए, ताकि मामले की अगली सुनवाई 07 अप्रैल 2026 को की जा सके।
इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह माना जा रहा है कि अब प्रशासन इन कार्यालयों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर सकेगा और आवश्यक सुधारों के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। यदि लिफ्ट, रैंप, व्हीलचेयर, बेहतर वेटिंग एरिया और स्वच्छ शौचालय जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की जाती हैं, तो इससे दिव्यांगजनों, महिलाओं और बुजुर्गों को बड़ी राहत मिलेगी और वे बिना किसी बाधा के अपने कार्य संपन्न कर सकेंगे।
अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि यह केवल सुविधाओं की कमी का मामला नहीं है, बल्कि महिलाओं और दिव्यांगजनों को सम्मानजनक व्यवहार और समान अधिकार उपलब्ध कराने का विषय है। उनका कहना है कि कानून में प्रावधान स्पष्ट हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। मानवाधिकार आयोग की यह कार्रवाई न केवल आगरा के लिए, बल्कि अन्य जिलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं में सुधार और संवेदनशीलता को बढ़ावा मिलेगा।

