आगरा। रावतपाड़ा स्थित श्री मनःकामेश्वर मठ मंदिर परिसर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव भक्ति, वैदिक परंपरा और ब्रज के उल्लास से सराबोर रहा। श्रीनाथजी मंदिर में 108 कलशों से भगवान का अभिषेक किया गया। दूध, दही, घृत, गंगा-यमुना सहित विभिन्न पवित्र नदियों और तीर्थों के जल तथा औषधीय एवं सुगंधित द्रव्यों से हुए इस अनुष्ठान के दौरान हवेली संगीत की पुष्टिमार्गीय परंपरा में पद और बधाइयां गूंजीं। वर्ष में एक बार होने वाले श्रीनाथजी के लंगोट दर्शन का लाभ पाकर श्रद्धालु भी भावविभोर हो उठे।
जन्माष्टमी महोत्सव के शुभारंभ पर मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संगीत की विशेष प्रस्तुति ने वातावरण को और भक्तिमय बना दिया। हवेली संगीत के सुप्रसिद्ध गायक डॉ. सदानंद भट्ट ने तानपुरा और पखावज की संगत के साथ पुष्टिमार्गीय पदों और बधाई गायन की प्रस्तुति दी। पारंपरिक गायकी में श्रीकृष्ण के प्राकट्य और नंदोत्सव से जुड़े भावों को स्वर मिला। मंदिर में मौजूद श्रद्धालु देर तक इन प्रस्तुतियों में डूबे रहे।
श्रीनाथजी के अभिषेक के लिए अलग-अलग धार्मिक महत्व रखने वाली सामग्री जुटाई गई थी। अनुष्ठान में दूध, दही और घृत के साथ गंगा-यमुना का जल शामिल किया गया। इसके अलावा विभिन्न तीर्थों से लाए गए पवित्र जल, रामसेतु और रामेश्वरम के जल का भी उपयोग किया गया। औषधीय और सुगंधित द्रव्यों के साथ इत्र और चंदन ने पूरे मंदिर परिसर को सुगंध से भर दिया। वैदिक विधि से हुए इस स्नान अनुष्ठान में श्रद्धालुओं ने धार्मिक भाव से सहभागिता की।
श्रीनाथजी के 108 कलश अभिषेक के साथ इस आयोजन का एक विशेष आकर्षण वार्षिक लंगोट दर्शन रहा। यह दर्शन साल में एक बार होता है। इसके लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। भगवान के इस विशेष स्वरूप के दर्शन को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह दिखाई दिया। अभिषेक और दर्शन के दौरान मंदिर परिसर में लगातार धार्मिक वातावरण बना रहा।
श्रीमहंत योगेश पुरी ने कहा कि महादेव से बड़ा कोई वैष्णव नहीं है और श्रीकृष्ण से बड़ा कोई महादेव का भक्त नहीं है। उन्होंने शिव और विष्णु की आराधना को अलग-अलग मानने के बजाय दोनों के बीच भक्ति और प्रेम के संबंध को समझने की बात कही। उनके अनुसार दोनों आराध्य एक-दूसरे की भक्ति के दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं। महादेव के धाम में श्रीनाथजी का 108 कलशों से अभिषेक इसी आध्यात्मिक भाव को सामने लाता है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन का अनुभव प्रत्येक साधक अपने विश्वास और भाव के अनुसार करता है। धार्मिक परंपराओं के साथ जुड़े ऐसे अनुष्ठान श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति और भक्ति का अनुभव कराते हैं। मनःकामेश्वर मठ मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में भी यही भाव दिखाई दिया। भगवान के अभिषेक से लेकर संगीत और बधाई गायन तक पूरा आयोजन कृष्ण जन्म की खुशी से जुड़ा रहा।
हवेली संगीत की प्रस्तुति में नंद भवन में कृष्ण जन्म के बाद छाए आनंद को बधाइयों के माध्यम से व्यक्त किया गया। पुष्टिमार्गीय परंपरा के अनुरूप गाए गए पदों में नंद के घर जन्मे कन्हैया के आगमन की खुशी और ब्रज के उत्सव का भाव उभरा। गायन के दौरान श्रद्धालु भक्ति में लीन रहे। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की संगत ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाया।
कार्यक्रम में श्रीकृष्ण जन्म के प्रसंग से जुड़े पारंपरिक बधाई गायन ने श्रद्धालुओं को ब्रज के उस वातावरण की अनुभूति कराई, जिसमें नंद भवन में लाला के प्राकट्य के बाद उत्सव मनाया गया था। पदों के माध्यम से जन्म की खुशी, नंदोत्सव का उल्लास और कृष्ण के बाल स्वरूप के प्रति वात्सल्य का भाव सामने आया। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों ने इस आध्यात्मिक और सांगीतिक वातावरण का आनंद लिया।
मठ-मंदिर प्रशासक हरिहर पुरी ने बताया कि जन्माष्टमी महोत्सव के अगले चरण में शनिवार को श्रीकृष्ण नंदोत्सव और सांस्कृतिक संध्या आयोजित की जाएगी। कार्यक्रम की शुरुआत शाम सात बजे होगी। इसमें बच्चे सांस्कृतिक और नृत्य प्रस्तुतियां देंगे। प्रस्तुतियों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के साथ राधा-कृष्ण के प्रेम और ब्रज संस्कृति की झलक दिखाई जाएगी। आयोजन को बच्चों और श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में तैयार किया गया है।
उन्होंने बताया कि नंदोत्सव में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशियां पारंपरिक उल्लास के साथ मनाई जाएंगी। इस अवसर पर श्रद्धालुओं और बच्चों के बीच खिलौने तथा प्रसाद भी वितरित किए जाएंगे। इससे आयोजन में बच्चों की भागीदारी भी बढ़ेगी और नंदोत्सव की पारंपरिक खुशी को सामूहिक रूप से मनाने का अवसर मिलेगा।
श्री मनःकामेश्वर मठ मंदिर परिसर में आयोजित जन्माष्टमी कार्यक्रम में धार्मिक अनुष्ठान, पुष्टिमार्गीय संगीत और ब्रज की परंपराओं का समावेश देखने को मिला। एक ओर 108 कलशों से श्रीनाथजी का अभिषेक हुआ तो दूसरी ओर हवेली संगीत में कृष्ण जन्म की बधाइयों ने वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। पवित्र जल, पंचामृत सामग्री, सुगंधित द्रव्य और चंदन से हुए अनुष्ठान ने आयोजन को धार्मिक स्वरूप दिया। वहीं वार्षिक लंगोट दर्शन ने श्रद्धालुओं के लिए इस अवसर को विशेष बना दिया।
मंदिर परिसर में हुए इस आयोजन ने जन्माष्टमी के धार्मिक पक्ष के साथ पुष्टिमार्गीय संगीत और ब्रज परंपरा को भी सामने रखा। कृष्ण के प्राकट्य से जुड़े पदों और बधाइयों ने जहां भक्तों को भावनात्मक रूप से जोड़ा, वहीं आगामी नंदोत्सव में बच्चों की प्रस्तुतियां महोत्सव को सांस्कृतिक रंग देंगी। इस तरह जन्माष्टमी महोत्सव का क्रम धार्मिक अनुष्ठानों से आगे बढ़ते हुए नंदोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक जारी रहेगा।
