आगरा। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को नई दिशा देने के लिए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2026 लागू करने की तैयारी तेज हो गई है। जिलाधिकारी मनीष बंसल की अध्यक्षता में आयोजित कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप में स्पष्ट किया गया कि अब शहर ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़े कचरा उत्पादकों को नियमों के दायरे में लाया जाएगा। 20 हजार वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल, प्रतिदिन 40 हजार लीटर या उससे अधिक जल खपत अथवा 100 किलोग्राम से अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली संस्थाओं को बल्क वेस्ट जनरेटर के रूप में सूचीबद्ध किया जाएगा। नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई भी की जाएगी।

आगरा नगर निगम स्थित स्मार्ट सिटी सभागार में जिलाधिकारी मनीष बंसल की अध्यक्षता में कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप ऑन सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2026″ का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य नई नियमावली के प्रभावी क्रियान्वयन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत बनाने तथा सभी विभागों और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारियां तय करना था। कार्यशाला में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली-2026 के अनुपालन, अधिकृत एवं अनधिकृत डंपिंग स्थलों की निगरानी, रोकथाम, निस्तारण और क्षमता संवर्धन से जुड़े बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यशाला में पर्यावरण अभियंता पंकज भूषण ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से नए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों, सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न प्रावधानों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जनपद स्तर पर स्पेशल सेल का गठन किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि आगरा में लगभग 20 लाख मीट्रिक टन लेगेसी वेस्ट का निस्तारण किया जा चुका है तथा जहां भी पुराने डंपिंग स्थल शेष हैं, उन्हें चिन्हित कर जल्द हटाया जाएगा। इसकी साप्ताहिक और मासिक प्रगति रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।

जिलाधिकारी मनीष बंसल ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि नई नियमावली के तहत पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों के बल्क वेस्ट जनरेटरों को भी नियमों के दायरे में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि अब केवल नगर निकाय ही नहीं बल्कि ग्राम पंचायतें भी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए समान रूप से जिम्मेदार होंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन संस्थानों का क्षेत्रफल 20 हजार वर्गमीटर या उससे अधिक है, जिनकी प्रतिदिन जल खपत 40 हजार लीटर या उससे अधिक है अथवा जहां प्रतिदिन 100 किलोग्राम या उससे अधिक ठोस कचरा उत्पन्न होता है, उन्हें बल्क वेस्ट जनरेटर की श्रेणी में रखा जाएगा।
उन्होंने कहा कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन केवल नगर निगम या स्थानीय निकायों का दायित्व नहीं है बल्कि यह सभी विभागों, सेवा प्रदाताओं और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। इसलिए प्रत्येक स्तर पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2026 का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के खिलाफ नियमानुसार प्रवर्तन कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी ने सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि अगले 15 दिनों के भीतर आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, उद्योग विभाग, पर्यटन विभाग, होटल, मंडी समिति, पंचायत राज विभाग तथा अन्य संबंधित विभाग अपने-अपने क्षेत्र के सभी बल्क वेस्ट जनरेटरों की सूची तैयार कर रिपोर्ट उपलब्ध कराएं। साथ ही संबंधित संस्थानों के साथ बैठक कर नई नियमावली की जानकारी दी जाए और उसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी सुनिश्चित किया जाए।
कार्यशाला में बताया गया कि नई व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया गया है। इस पोर्टल पर अपशिष्ट संग्रहण, प्रसंस्करण, कम्पोस्ट उत्पादन, आरडीएफ उत्पादन, लेगेसी वेस्ट की बायो-माइनिंग, बायो-रिमेडिएशन तथा मासिक प्रगति सहित सभी विवरण दर्ज करना अनिवार्य होगा। सभी स्थानीय निकायों और संबंधित संस्थाओं को वित्तीय वर्ष 2025-26 का फॉर्म-4 जुलाई माह के अंत तक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उपलब्ध कराना होगा, जिसके आधार पर समेकित रिपोर्ट केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भेजी जाएगी।
बैठक में यह भी बताया गया कि नागरिक सहभागिता के बिना ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को सफल नहीं बनाया जा सकता। इसकी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार स्रोत स्तर पर गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण है। इसलिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि सभी नागरिकों को घर, संस्थान और प्रतिष्ठान स्तर पर कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित करना होगा, तभी नियमों का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा।
कार्यशाला में बताया गया कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2026 के तहत पहली बार ग्रामीण स्थानीय निकायों को भी नियमों के दायरे में शामिल किया गया है। अब ग्राम पंचायतें, नगर पंचायतें और नगर पालिकाएं भी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए समान रूप से उत्तरदायी होंगी। बल्क वेस्ट जनरेटरों के लिए विकसित ऑनलाइन पोर्टल पर सभी संबंधित संस्थानों का पंजीकरण अनिवार्य होगा तथा प्रत्येक वित्तीय वर्ष का वार्षिक रिटर्न ऑनलाइन प्रस्तुत करना होगा। संस्थानों को अपने परिसर में उत्पन्न कचरे का स्रोत पर पृथक्करण, जैविक कचरे का स्थानीय स्तर पर कम्पोस्टिंग, बायो-मीथनेशन अथवा अन्य स्वीकृत तकनीकों से निस्तारण करना होगा। शेष अपशिष्ट अधिकृत एजेंसी अथवा स्थानीय निकाय को उपलब्ध कराना होगा। पोर्टल पर उपलब्ध कराए गए विवरण के आधार पर नगर निगम अथवा अधिकृत एजेंसी द्वारा बल्क वेस्ट जनरेटर सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा, जो भविष्य में उद्योगों, होटलों तथा अन्य संस्थानों के पंजीकरण और नवीनीकरण के लिए अनिवार्य दस्तावेज होगा।
जिलाधिकारी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जनपद के सभी संभावित बल्क वेस्ट जनरेटरों की पहचान कर उनकी व्यापक सूची तैयार की जाए। इसके लिए शिक्षा विभाग, उद्योग विभाग, पर्यटन विभाग, स्वास्थ्य विभाग, जिला स्तरीय कार्यालयों, होटल, मैरिज होम, मॉल, मल्टीप्लेक्स, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, बहुमंजिला इमारतों और अन्य संस्थानों से जानकारी प्राप्त की जाए। सूची तैयार होने के बाद सभी चिन्हित संस्थानों को निर्धारित समयसीमा के भीतर पोर्टल पर पंजीकरण कराने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाएं।
उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के नियम-6 तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप लागू की जा रही है। यदि कोई संस्थान निर्धारित अवधि में नियमों का पालन नहीं करता है तो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा-5 के अंतर्गत नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे संस्थानों के जल एवं विद्युत कनेक्शन विच्छेद करने जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है।
जिलाधिकारी ने सभी ग्राम पंचायतों, नगर पंचायतों और नगर पालिकाओं को अगले 15 दिनों के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों में प्रमुख डंपिंग स्थलों तथा अनधिकृत कूड़ा निस्तारण स्थलों की पहचान कर उनका पूरा विवरण उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। साथ ही सभी बल्क वेस्ट जनरेटरों की सूची समय-समय पर अद्यतन करने के लिए भी कहा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता पर पूरा किया जाए क्योंकि इसकी प्रगति रिपोर्ट उच्च स्तर पर भेजी जानी है।
उन्होंने कहा कि आगरा जनपद ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के दृष्टिकोण से संवेदनशील श्रेणी में आता है और इस विषय से जुड़े कई मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं। इसलिए सभी विभाग, स्थानीय निकाय, ग्राम पंचायतें तथा संबंधित संस्थाएं आपसी समन्वय के साथ समयबद्ध तरीके से कार्य करते हुए नियमों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करें। उन्होंने अधिकारियों को जनजागरूकता अभियान, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से नागरिकों को लगातार जागरूक करने के निर्देश भी दिए, ताकि स्वच्छ, स्वस्थ और पर्यावरण अनुकूल आगरा का लक्ष्य निर्धारित समय में हासिल किया जा सके।
कार्यशाला में नए नियमों के प्रमुख प्रावधानों की भी विस्तार से जानकारी दी गई। बताया गया कि अब ठोस कचरे का स्रोत पर चार स्तरों पर पृथक्करण अनिवार्य होगा। इसमें गीला कचरा, सूखा कचरा, स्वच्छता संबंधी कचरा और विशेष देखभाल वाले कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा। गीले कचरे में रसोई का अपशिष्ट, फल-सब्जियों के अवशेष, फूल तथा जैविक सामग्री शामिल होगी, जिसका निस्तारण कम्पोस्टिंग या बायो-मीथनेशन से किया जाएगा। सूखे कचरे में प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच, लकड़ी और रबर जैसी सामग्री शामिल होगी, जिसे पुनर्चक्रण के लिए भेजा जाएगा। स्वच्छता संबंधी कचरे में इस्तेमाल किए गए डायपर, सैनिटरी पैड, टैम्पोन और कंडोम जैसी सामग्री आएगी, जबकि विशेष देखभाल वाले कचरे में पेंट के डिब्बे, बल्ब, पारा थर्मामीटर और दवाइयों जैसी वस्तुएं शामिल होंगी, जिनका संग्रहण अधिकृत एजेंसियां करेंगी।
कार्यशाला में यह भी बताया गया कि बड़े पैमाने पर कचरा उत्पन्न करने वाले संस्थानों की स्पष्ट परिभाषा तय की गई है। इनमें केंद्र और राज्य सरकार के विभाग, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक उपक्रम, शैक्षणिक संस्थान, होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, औद्योगिक इकाइयां तथा आवासीय समितियां शामिल हैं। इन सभी संस्थानों को अपने यहां उत्पन्न कचरे का वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण सुनिश्चित करना होगा। इससे शहरी स्थानीय निकायों पर भार कम होगा और विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
नियमों में विस्तारित बल्क वेस्ट जनरेटर उत्तरदायित्व (EBWGR) का भी प्रावधान किया गया है, जिसके तहत बड़े कचरा उत्पादकों को अपने द्वारा उत्पन्न कचरे के लिए पूरी तरह जवाबदेह बनाया गया है। उन्हें यथासंभव अपने परिसर में ही गीले कचरे का निस्तारण करना होगा या निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। अधिकारियों ने बताया कि बड़े संस्थान कुल ठोस कचरे का लगभग 30 प्रतिशत उत्पन्न करते हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।
बैठक में अपशिष्ट प्रसंस्करण के लिए भूमि आवंटन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की ऑनलाइन ट्रैकिंग, अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों के पंजीकरण, वार्षिक ऑडिट तथा केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सभी रिपोर्टिंग की व्यवस्था की भी जानकारी दी गई। इसके साथ ही उद्योगों में अपशिष्ट से प्राप्त ईंधन (RDF) के उपयोग, लैंडफिल पर प्रतिबंध, पुराने डंपिंग स्थलों की बायो-माइनिंग और बायो-रिमेडिएशन, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति तथा प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के प्रावधानों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया।
कार्यशाला में नगरायुक्त संतोष कुमार वैश्य, पर्यावरण अभियंता पंकज भूषण, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी अमित मिश्रा सहित विभिन्न सेवा प्रदाता संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक में सभी संबंधित विभागों से नई नियमावली का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करते हुए समयबद्ध कार्रवाई करने और स्वच्छ एवं पर्यावरण अनुकूल आगरा के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया गया।

