मथुरा। वन्यजीव अपराधों पर प्रभावी रोक और अवैध तस्करी नेटवर्क को खत्म करने के उद्देश्य से वाइल्डलाइफ एसओएस ने न्यायपालिका, वन विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन के सहयोग से मथुरा के हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में वन्यजीव अपराध एवं उससे अर्जित आय की जब्ती पर तीसरी कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में न्यायपालिका, प्रवर्तन एजेंसियों और संरक्षण विशेषज्ञों ने वन्यजीव अपराध की जांच, अभियोजन और समन्वित कार्रवाई को मजबूत बनाने पर मंथन किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह ने कहा कि जागरूकता, पुनर्वास और मार्गदर्शन कई बार सजा से अधिक प्रभावी साबित होते हैं।

वाइल्डलाइफ एसओएस की ओर से हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में वन्यजीव अपराध और वन्यजीव अपराध से प्राप्त आय की जब्ती विषय पर तीसरी कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम न्यायपालिका, उत्तर प्रदेश वन विभाग, पुलिस विभाग और जिला प्रशासन के सहयोग से हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य वन्यजीव अपराधों से निपटने में जुटी एजेंसियों के अधिकारियों की जांच क्षमता, कानूनी समझ और आपसी समन्वय को मजबूत करना था, ताकि वन्यजीव तस्करी नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके और अभियोजन प्रक्रिया को अधिक सशक्त बनाया जा सके।

कार्यशाला का औपचारिक उद्घाटन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह ने किया। इस दौरान आगरा और मथुरा मंडलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, आगरा जोन और मथुरा जोन के जिला वन अधिकारी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम में वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों, अभियोजकों, वन अधिकारियों और प्रवर्तन एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यशाला में वन्यजीव कानून प्रवर्तन और अभियोजन से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की गई। विभिन्न सत्रों में जांच तकनीकों, वन्यजीव अपराधों के आर्थिक और वित्तीय पहलुओं, अदालती प्रक्रियाओं तथा अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर विचार साझा किए गए। प्रतिभागियों को यह बताया गया कि संगठित वन्यजीव अपराध केवल जैव विविधता के लिए ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।

वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने देशभर में संस्था द्वारा चलाए गए विभिन्न अभियानों और रेस्क्यू ऑपरेशनों से जुड़े प्रमुख केस स्टडी प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि वन्यजीव अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई तभी संभव है, जब न्यायपालिका, प्रवर्तन एजेंसियां और संरक्षण विशेषज्ञ एक साझा रणनीति के तहत काम करें। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं जांच, अभियोजन और अपराध की रोकथाम से जुड़े अधिकारियों को आवश्यक कानूनी और तकनीकी समझ प्रदान करती हैं, जिससे भारत की जैव विविधता को बेहतर सुरक्षा मिलती है।

कार्यशाला में प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक दीपक चौहान, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील कुमार शुक्ला, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और राष्ट्रीय जांच एजेंसी के विशेष अभियोजक करमबीर सिंह नलवा, ज्योति सागर एंड एसोसिएट के पार्टनर कुमार किसलय, सीबीआई मुख्यालय नई दिल्ली के विशेष अभियोजक विनय कुमार ओझा और कानूनी पत्रकार तरुण नांगिया ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने वन्यजीव अपराध से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने और अपराध से अर्जित संपत्तियों की जब्ती की प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह ने अपने संबोधन में वाइल्डलाइफ एसओएस की तीन दशकों की सेवा और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उसके योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि केवल दंड देना ही समाधान नहीं है, बल्कि पुनर्वास, जागरूकता और सही मार्गदर्शन अधिक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला सकते हैं। उन्होंने उन समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने के प्रयासों को भी महत्वपूर्ण बताया, जो पहले जानवरों के शोषण से जुड़े कार्यों में संलग्न रहे हैं।
उन्होंने अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह सभी जीवित प्राणियों की रक्षा और उनके प्रति संवेदनशीलता बनाए रखे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र का वास्तविक न्याय उस सुरक्षा की भावना में दिखाई देता है, जिसे समाज के सबसे कमजोर और गरीब नागरिक महसूस करते हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र में देखी गई एक नेत्रहीन हथनी की पीड़ा का जिक्र करते हुए कहा कि पशुओं के प्रति करुणा और सहानुभूति समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के विचारों का उल्लेख करते हुए सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर संवेदनशील और समावेशी समाज बनाने का आह्वान किया। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के कथन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अधिकार तभी प्रभावी होते हैं, जब लोगों को उनके प्रति जागरूक किया जाए।
वाइल्डलाइफ एसओएस की सह-संस्थापक और सचिव गीता शेषमणि ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण तभी सफल हो सकता है, जब विभिन्न संस्थाएं मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण से जुड़ी ऐसी पहलें वन्यजीव कानूनों, जांच प्रक्रियाओं और अभियोजन रणनीतियों की समझ को मजबूत बनाती हैं, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा अधिक प्रभावी हो पाती है।
कार्यक्रम के समापन सत्र में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सत्य नारायण वशिष्ठ ने संबोधन दिया। वहीं वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स बैजू राज एम.वी. ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यशाला में बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारियों, वन विभाग, पुलिस विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लेकर वन्यजीव अपराध के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की प्रतिबद्धता दोहराई।
