आगरा। आगरा के जंगलों में तेजी से बढ़ रहे विलायती बबूल के विस्तार और स्थानीय वृक्षों के घटते अस्तित्व को लेकर पर्यावरण प्रेमियों ने गंभीर चिंता जताई है। पालीवाल पार्क में आयोजित बैठक में पर्यावरण प्रेमी अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा कि यदि स्थानीय वृक्षों, झाड़ियों और जैव विविधता को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले समय में तितलियां, पक्षी और कई छोटे जीव-जंतु पूरी तरह प्रभावित हो जाएंगे। उन्होंने लोगों से देशी वृक्षों को बचाने और उनके बड़े स्तर पर रोपण की अपील करते हुए कहा कि प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए स्थानीय वनस्पतियों को संरक्षित करना आवश्यक है।
आगरा में बदलती हरियाली और जंगलों की बिगड़ती प्राकृतिक संरचना को लेकर शनिवार को पालीवाल पार्क में प्रातःकालीन भ्रमणकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान पर्यावरण प्रेमी अधिवक्ता के.सी. जैन ने शहर और आसपास के क्षेत्रों में तेजी से बदलते पर्यावरणीय स्वरूप और स्थानीय प्रजातियों के घटते अस्तित्व पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जिस समाज को अपने पेड़ों, पौधों और झाड़ियों की पहचान नहीं होती, वह धीरे-धीरे अपनी जैव विविधता, प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय संतुलन को खो देता है।
बैठक में चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई कि जब तक समाज जैव विविधता के महत्व को नहीं समझेगा, तब तक उसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में कोई प्रभावी प्रयास सफल नहीं हो सकेंगे। के.सी. जैन ने कहा कि वर्तमान समय में लोगों के बीच वृक्षों और पौधों के प्रति जानकारी का अभाव बढ़ता जा रहा है। अधिकांश लोग केवल सजावटी पौधों तक सीमित होते जा रहे हैं, जबकि स्थानीय पारिस्थितिकी को सहारा देने वाले पारंपरिक और देशी वृक्ष तेजी से समाप्त हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव आगरा के जंगलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वर्तमान में आगरा के जंगलों में विलायती बबूल का तेजी से विस्तार हो रहा है। मऊ के जंगल, कीठम क्षेत्र, बाह क्षेत्र और ताज नेचर वॉक जैसे कई इलाकों में इस विदेशी प्रजाति का अत्यधिक फैलाव देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह विदेशी प्रजाति स्थानीय वृक्षों, झाड़ियों और घासों के विकास में बाधा बन रही है, जिसके कारण प्राकृतिक विविधता लगातार प्रभावित हो रही है।
के.सी. जैन ने कहा कि आज के जंगलों में पहले जैसी प्राकृतिक गतिविधियां दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने भावुकता के साथ कहा कि अब न पहले की तरह बड़ी संख्या में तितलियां दिखाई देती हैं, न चिड़ियों के घोंसले आसानी से नजर आते हैं और न ही मधुमक्खियों की पहले जैसी चहल-पहल दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते बल्कि वे पक्षियों, कीटों, तितलियों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्म जीवों की एक पूरी दुनिया होते हैं। यदि किसी जंगल में एक ही विदेशी प्रजाति का अत्यधिक विस्तार हो जाए तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होने लगता है।
उन्होंने बताया कि आगरा जैसे क्षेत्र के लिए स्थानीय कांटेदार वृक्ष अत्यंत उपयोगी साबित हो सकते हैं क्योंकि उन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है और वे भीषण गर्मी में भी आसानी से जीवित रह सकते हैं। उन्होंने तमाल, केंथ, रेमजा, शमी, बेलपत्र, हिंगोट और बेर जैसे वृक्षों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये वृक्ष न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक होते हैं बल्कि पक्षियों और छोटे जीवों के लिए सुरक्षित आश्रय भी प्रदान करते हैं।
बिना कांटों वाले स्थानीय वृक्षों में उन्होंने अर्जुन, कदम्ब, सहजन, शहतूत, इमली, जामुन, वरना, अमलतास, अंकोल और सिरस को उपयोगी बताया। उन्होंने कहा कि इन वृक्षों की विशेषता यह है कि ये कम पानी में भी विकसित हो जाते हैं और छाया, ऑक्सीजन तथा जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं।
फाइकस प्रजाति के वृक्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने गूलर, पीपल, बरगद और पाखड़ को प्रकृति का जीवनदाता बताया। उन्होंने कहा कि इन वृक्षों पर बड़ी संख्या में पक्षी, तितलियां और अन्य जीव निर्भर रहते हैं। यदि किसी क्षेत्र में इनकी संख्या अधिक होती है तो वहां जैव विविधता स्वतः बढ़ने लगती है।
उन्होंने स्थानीय झाड़ियों के महत्व को भी रेखांकित किया और अडूसा, वज्रदंती, करील और हिंस जैसी प्रजातियों को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जंगल केवल बड़े वृक्षों से नहीं बनते बल्कि छोटे पौधे, झाड़ियां और घास भी पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
बैठक के दौरान उपस्थित लोगों को यह जानकारी भी दी गई कि तितलियां अपने अंडे केवल विशेष प्रकार के पौधों और झाड़ियों पर देती हैं तथा उनके लार्वा उन्हीं पौधों की पत्तियां खाकर जीवित रहते हैं। यदि किसी क्षेत्र में उनकी पसंद के पौधे मौजूद नहीं होंगे तो तितलियां वहां कभी नहीं आएंगी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोग बटरफ्लाई पार्क बनाने की बात तो करते हैं लेकिन तितलियों के लिए जरूरी स्थानीय पौधों के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। यदि वास्तव में तितलियों और पक्षियों को वापस लाना है तो स्थानीय वृक्षों और झाड़ियों की विविधता को बढ़ाना होगा।
बैठक के अंत में सभी प्रातःकालीन भ्रमणकारियों ने आगामी वर्षा ऋतु में अधिक से अधिक स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष लगाने का संकल्प लिया और लोगों के बीच जैव विविधता तथा देशी वृक्षों के महत्व को लेकर जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया। बैठक में अनिल अग्रवाल, डॉ. संजीव गोयल सहित कई पर्यावरण प्रेमी और प्रातःकालीन भ्रमणकारी मौजूद रहे।
