आगरा। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरण कार्यकर्ता केसी. जैन ने ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र (टीटीजेड) में बेहद कम वनावरण को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से कृषि वानिकी को बढ़ावा देने और किसानों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करने की मांग की है। उनका कहना है कि ताजमहल की सुरक्षा और क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए करोड़ों नए पेड़ों की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था किसानों को पौधरोपण के लिए प्रेरित करने के बजाय कई बार हतोत्साहित करती दिखाई देती है।
केसी. जैन ने कहा कि दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल ताजमहल जिस ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र में स्थित है, वहां का कुल वनावरण मात्र 3.38 प्रतिशत है। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब राष्ट्रीय वन नीति देश के कम से कम 33 प्रतिशत क्षेत्र को हरित आवरण के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित करती है। वहीं भारत का कुल वनावरण लगभग 21.76 प्रतिशत है। ऐसे में ताजमहल की सुरक्षा के लिए बनाए गए इस विशेष क्षेत्र में हरियाली का स्तर राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम है।
उन्होंने बताया कि इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर)-2023 के आंकड़ों के अनुसार ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र के विभिन्न जिलों में वनावरण की स्थिति बेहद कमजोर है। आगरा जिले में वनावरण 6.82 प्रतिशत, भरतपुर में 4.23 प्रतिशत, फिरोजाबाद में 2.58 प्रतिशत, मथुरा में 1.60 प्रतिशत, हाथरस में 1.20 प्रतिशत तथा एटा में मात्र 0.84 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पूरे क्षेत्र में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण की आवश्यकता है। विशेष रूप से एटा, हाथरस और मथुरा जैसे जिलों में हरित आवरण बेहद कम है, जो पर्यावरणीय दृष्टि से चिंता का विषय है।
केसी. जैन का कहना है कि यदि ताज क्षेत्र में हरियाली बढ़ानी है तो इसके लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। सरकारी वन भूमि सीमित है, जबकि लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि उपलब्ध है। ऐसे में किसानों की भागीदारी के बिना हरित आवरण बढ़ाने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि किसान अपने खेतों की मेड़ों, सीमाओं, तालाबों के किनारों और अनुपयोगी भूमि पर पेड़ लगाना शुरू कर दें तो अगले 10 से 15 वर्षों में करोड़ों नए वृक्ष तैयार किए जा सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि कृषि वानिकी का मूल सिद्धांत यही है कि किसान पेड़ को एक फसल की तरह लगाए, उसकी देखभाल करे और परिपक्व होने पर उसका उपयोग या विपणन भी कर सके। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई किसानों के मन में यह आशंका बनी रहती है कि भविष्य में अपने खेत में लगाए गए पेड़ों को काटने या उनके परिवहन के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार की अनुमति प्रक्रियाओं और कानूनी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति किसानों को वृक्षारोपण से दूर कर सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी किसान को यह विश्वास नहीं होगा कि वह भविष्य में अपने लगाए हुए पेड़ों का उचित उपयोग कर सकेगा, तो वह पेड़ लगाने के प्रति उत्साहित नहीं होगा। इसलिए ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो किसानों को भरोसा दें और कृषि वानिकी को प्रोत्साहित करें। उन्होंने कहा कि देश की राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति-2014 भी कृषि वानिकी को वृक्ष आवरण बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम मानती है। नीति आयोग, आर्थिक सलाहकार परिषद और विभिन्न विशेषज्ञ समितियां भी समय-समय पर यह सुझाव देती रही हैं कि कटान और परिवहन पर अत्यधिक नियंत्रण कृषि वानिकी के विकास में बाधा बन सकते हैं।
उन्होंने एक पेड़ के बदले दस पेड़ लगाने जैसी शर्तों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि यह विचार सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसे पूरा करना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए यदि किसी किसान ने वर्षों पहले अपने खेत में 100 पेड़ लगाए हैं और अब उन्हें काटना चाहता है, तो उसे 1000 नए पौधे लगाने की शर्त पूरी करनी पड़ सकती है। अधिकांश किसानों के पास इतनी अतिरिक्त भूमि उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में यह व्यवस्था किसानों को भविष्य में पेड़ लगाने से हतोत्साहित कर सकती है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर के.सी. जैन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे गए पत्र में अनुरोध किया है कि राज्य सरकार कृषि वानिकी से जुड़े मामलों पर पुनर्विचार के लिए आवश्यक पहल करे। उन्होंने सुझाव दिया कि निजी भूमि पर लगाए गए वृक्षों के संबंध में ऐसी नीति बनाई जाए जो किसानों को प्रोत्साहित करे और वृक्षारोपण को जन आंदोलन का स्वरूप दे सके।
उन्होंने कहा कि ताजमहल की रक्षा केवल प्रतिबंध लगाने से नहीं होगी। इसके लिए ताज क्षेत्र में व्यापक स्तर पर हरियाली बढ़ानी होगी। जब किसान वृक्षारोपण को अपने आर्थिक हित, पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जोड़कर देखेंगे, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। उनका मानना है कि आज ताज क्षेत्र को किसी नए प्रतिबंध की नहीं, बल्कि करोड़ों नए वृक्षों की आवश्यकता है। ताजमहल और पर्यावरण की सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता किसानों के खेतों से होकर गुजरता है। यदि किसान बड़ी संख्या में पेड़ लगाएंगे तो ताज क्षेत्र हराभरा होगा, पर्यावरण बेहतर होगा और ताजमहल की सुरक्षा भी और मजबूत होगी।
ताज क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाने और औद्योगिक विकास को गति देने पर मंथन, मंडलायुक्त को भेंट किया दुर्लभ अंकोल का पौधा
किसानों को पौधरोपण के लिए प्रोत्साहित करने और उद्योगों की बिजली संबंधी समस्याओं के समाधान की उठी मांग
आगरा। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र (टीटीजेड) में पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों को लेकर एक सार्थक पहल देखने को मिली। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरण मित्र के. सी. जैन तथा उद्योगपति पूरन डावर ने मंडलायुक्त नागेन्द्र प्रताप से भेंट कर ताज क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाने और उद्योगों के समक्ष आ रही समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए मंडलायुक्त को दुर्लभ एवं पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण अंकोल (Ankol) का पौधा भी भेंट किया गया।
बैठक में के. सी. जैन ने ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र में हरित आवरण की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि क्षेत्र में पौधरोपण को अपेक्षित गति नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा कि निजी भूमि स्वामी और किसान अपनी जमीन पर पौधे लगाने से बच रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भविष्य में पेड़ों के कटान से जुड़ी जटिल प्रक्रियाएं और विभिन्न प्रकार की शर्तें हैं। उन्होंने बताया कि लोगों में यह धारणा बन रही है कि यदि आज वे अपनी भूमि पर पौधे लगाकर उन्हें बड़ा करते हैं तो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर उन पेड़ों को काटने के लिए उन्हें लंबी और जटिल अनुमति प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
के. सी. जैन ने कहा कि एक पेड़ काटने के बदले कई नए पौधे लगाने जैसी शर्तें भी किसानों और भूमि स्वामियों को हतोत्साहित कर रही हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऐसी शर्तों का पालन करना आसान नहीं होता। परिणामस्वरूप कई लोग पौधरोपण से दूरी बना लेते हैं। उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में ताज क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाना है तो लोगों को डराने या प्रतिबंधित करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करने की नीति अपनानी होगी।
उन्होंने कहा कि ताज क्षेत्र में सरकारी भूमि सीमित है और केवल सरकारी प्रयासों के सहारे हरित आवरण में बड़ा सुधार नहीं किया जा सकता। इसके लिए किसानों और निजी भूमि स्वामियों की भागीदारी बेहद आवश्यक है। यदि खेतों की मेड़ों, तालाबों के किनारों, सड़क किनारे उपलब्ध भूमि और अन्य अनुपयोगी स्थानों पर बड़े स्तर पर पौधरोपण किया जाए तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन को भी लाभ मिलेगा।
के. सी. जैन ने कहा कि किसानों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि उनकी भूमि पर लगाए गए पौधे भविष्य में उनके लिए समस्या नहीं बल्कि लाभ का माध्यम बनेंगे। जब तक किसान पौधरोपण को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से लाभकारी नहीं समझेंगे, तब तक ताज क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए जिनसे पौधरोपण को बढ़ावा मिले और किसानों को इसके लिए प्रोत्साहन भी प्राप्त हो।
बैठक के दौरान उद्योगपति पूरन डावर ने ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र में औद्योगिक विकास से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने बताया कि लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले टीटीजेड में उद्योगों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है। कई उद्यमियों को नए विद्युत कनेक्शन प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा जो उद्योग पहले से संचालित हैं, उन्हें भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए विद्युत भार (लोड) बढ़वाने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
पूरन डावर ने कहा कि बिजली से संबंधित इन समस्याओं का सीधा असर औद्योगिक निवेश पर पड़ रहा है। कई उद्यमी नए उद्योग लगाने की योजना होने के बावजूद आवश्यक सुविधाएं न मिलने के कारण निवेश से पीछे हट जाते हैं। कुछ निवेशक तो अन्य क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन प्रभावित हो रहा है और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि उद्योगों का विकास किसी भी क्षेत्र की आर्थिक मजबूती के लिए आवश्यक होता है। उद्योग बढ़ेंगे तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में काम मिल सकेगा। इसलिए विद्युत कनेक्शन और लोड वृद्धि से जुड़ी समस्याओं का शीघ्र समाधान किया जाना चाहिए, ताकि औद्योगिक विकास को नई गति मिल सके।
मंडलायुक्त नागेन्द्र प्रताप ने दोनों पक्षों द्वारा रखे गए सुझावों को गंभीरता से सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास से जुड़े इन महत्वपूर्ण विषयों पर संबंधित विभागों के साथ विचार-विमर्श कर आवश्यक कदम उठाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के विकास के लिए पर्यावरण और उद्योग दोनों का संतुलित विकास आवश्यक है।
बैठक में यह सुझाव भी सामने आया कि विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ताज क्षेत्र में विशेष पौधरोपण अभियान चलाया जाए। इसके माध्यम से किसानों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और आम नागरिकों को अधिक से अधिक पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों को साथ लेकर चलना ही क्षेत्र के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।
बैठक के अंत में के. सी. जैन और पूरन डावर ने मंडलायुक्त नागेन्द्र प्रताप को दुर्लभ अंकोल का पौधा भेंट किया। यह पौधा पर्यावरण संरक्षण, हरित विकास और प्रकृति के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक बना। उपस्थित लोगों ने ताज क्षेत्र को अधिक हराभरा और विकासशील बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
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ताजमहल को बचाना है तो प्रदूषण के असली कारणों पर करना होगा प्रहार
ताज की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक आधार पर बने नीति
आगरा। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर अधिवक्ता एवं पर्यावरण मित्र के. सी. जैन ने ताजमहल की सुरक्षा और आगरा में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि वैज्ञानिक अध्ययन यह बताते हैं कि आगरा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सड़क की धूल और वाहनों से निकलने वाला धुआं है, तो प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति भी इन्हीं स्रोतों पर केंद्रित होनी चाहिए। उनका कहना है कि ताजमहल को बचाने और आगरा की हवा को साफ बनाने के लिए वास्तविक कारणों की पहचान कर उसी के अनुरूप प्रभावी कदम उठाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

के.सी. जैन ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधरोपण या जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है। हमें यह देखना होगा कि प्रदूषण रोकने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं या नहीं। यदि नीतियां और कार्रवाई वास्तविक कारणों के बजाय अन्य क्षेत्रों पर केंद्रित रहेंगी तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकेंगे।
उन्होंने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लिए तैयार की गई भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर की स्रोत-विभाजन (सोर्स एपोर्शनमेंट) रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि रिपोर्ट में आगरा के प्रदूषण के प्रमुख कारणों की स्पष्ट पहचान की गई है। रिपोर्ट के अनुसार पीएम 2.5 प्रदूषण में सड़क की धूल का योगदान लगभग 63 प्रतिशत है, जबकि उद्योगों और वाहनों का योगदान लगभग 11-11 प्रतिशत बताया गया है।
उन्होंने कहा कि पीएम 10 प्रदूषण के मामले में स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार सड़क और मिट्टी की धूल का योगदान लगभग 79.80 प्रतिशत है। इसके मुकाबले उद्योगों का योगदान केवल 4.53 प्रतिशत और वाहनों का योगदान 4.94 प्रतिशत है। वहीं नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी 84.5 प्रतिशत तक बताई गई है, जबकि उद्योगों का योगदान केवल 4.7 प्रतिशत है।

के.सी. जैन का कहना है कि इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि आगरा की वायु गुणवत्ता को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कारक सड़क की धूल और यातायात हैं। ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण की योजनाओं का बड़ा हिस्सा इन्हीं स्रोतों को नियंत्रित करने पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो ताजमहल की सुरक्षा और स्वच्छ वातावरण का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।
उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग-19 का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि यह देश के सबसे व्यस्त राजमार्गों में से एक है और प्रतिदिन हजारों भारी वाहन आगरा क्षेत्र से गुजरते हैं। इनमें से अधिकांश वाहन केवल एक राज्य से दूसरे राज्य की यात्रा कर रहे होते हैं और उनका आगरा शहर से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इसके बावजूद इन वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़क पर बढ़ता दबाव और धूल स्थानीय प्रदूषण को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
के.सी. जैन ने कहा कि आगरा उत्तरी बाईपास का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया था कि बाहरी और भारी वाहनों को शहर के भीतर प्रवेश करने की आवश्यकता न पड़े। यदि भारी वाहनों को प्रभावी ढंग से बाईपास मार्ग पर स्थानांतरित किया जाए तो शहर में यातायात का दबाव कम होगा, जाम की समस्या घटेगी और प्रदूषण के स्तर में भी उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे ताजमहल सहित अन्य ऐतिहासिक धरोहरों को भी लाभ मिलेगा।
उन्होंने कहा कि सड़क की धूल को नियंत्रित करने के लिए विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता है। यदि पीएम 10 प्रदूषण का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा सड़क और मिट्टी की धूल से आ रहा है तो इस दिशा में बड़े स्तर पर कार्य होना चाहिए। इसके लिए यांत्रिक सड़क सफाई, वैक्यूम स्वीपिंग मशीनों का नियमित उपयोग, सड़कों के किनारों का पक्कीकरण, हरित पट्टियों का विकास और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए।
उनका कहना है कि शहर के उन क्षेत्रों की भी पहचान की जानी चाहिए जहां सबसे अधिक जाम लगता है। ऐसे क्षेत्रों में यातायात प्रबंधन को बेहतर बनाकर वाहनों की अनावश्यक आवाजाही और प्रदूषण को कम किया जा सकता है। इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर के.सी. जैन ने उत्तर प्रदेश सरकार से आग्रह किया है कि आईआईटी कानपुर की रिपोर्टों का गहन अध्ययन कराया जाए और उनके आधार पर प्रदूषण नियंत्रण की नई रणनीति तैयार की जाए। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नीतियां ही लंबे समय तक प्रभावी साबित होती हैं। ताजमहल की सुरक्षा और क्षेत्र के विकास को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि पूरक मानते हुए योजनाएं बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ताजमहल केवल आगरा या उत्तर प्रदेश की धरोहर नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की पहचान है। इसकी सुरक्षा हम सभी की जिम्मेदारी है। यदि प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर प्रभावी कार्रवाई की जाए तो न केवल ताजमहल की सुरक्षा मजबूत होगी बल्कि आगरा के लोगों को भी स्वच्छ और बेहतर वातावरण मिल सकेगा।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम अपने संसाधनों और प्रयासों का उपयोग सही दिशा में कर रहे हैं या नहीं। यदि सड़क की धूल और यातायात प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत हैं तो नीतियों, संसाधनों और कार्रवाई का केंद्र भी वही होना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही ताजमहल की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य को प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सकता है।

