उत्तरी बाईपास चालू होने के बावजूद गैर-गंतव्य भारी वाहन शहर में घुस रहे हैं, जिससे एनएच-19 पर जाम और हादसे बढ़ रहे हैं।
मानवाधिकार आयोग ने एनएचएआई से जवाब मांगा, अधिसूचना न जारी करने पर 17 मई 2026 को अगली सुनवाई तय।
हर दिन 1.5 लाख वाहनों का दबाव, जिनमें 60-70% बाहरी—आगरा की यातायात और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा संकट
आगरा। शहर में गैर-गंतव्य भारी वाहनों की एंट्री पर रोक लगाने का मुद्दा अब गंभीर प्रशासनिक और जनहित का विषय बन चुका है। उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए एनएचएआई से स्पष्टीकरण सहित अनुपालन आख्या पुनः तलब की है। आयोग ने इस प्रकरण की अगली सुनवाई 17 मई 2026 को नियत की है, जिससे स्पष्ट है कि यह मामला अब प्राथमिकता में आ चुका है।
विवाद का केंद्र यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) अब तक ऐसी कोई प्रभावी अधिसूचना जारी नहीं कर सका है, जिससे शहर के भीतर से गुजरने वाले गैर-गंतव्य भारी वाणिज्यिक वाहनों को रोका जा सके। यह विषय केवल ट्रैफिक प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण, सड़क सुरक्षा और नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है।

आगरा के पास इस समस्या का समाधान पहले से मौजूद है। लगभग 14 किलोमीटर लंबा उत्तरी बाईपास, जो करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है, 04 दिसंबर 2025 से चालू है। इसका उद्देश्य साफ था—मथुरा और फिरोजाबाद की ओर से आने वाले भारी वाहनों को शहर में प्रवेश से पहले ही डायवर्ट कर देना। इसके बावजूद वास्तविक स्थिति यह है कि भारी वाहन लगातार शहर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं और राष्ट्रीय राजमार्ग-19 (एनएच-19), जो शहर के बीच से गुजरता है, उस पर यातायात का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस दबाव के कारण न केवल ट्रैफिक जाम की समस्या बढ़ी है, बल्कि सड़क हादसों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। सवाल यह उठता है कि जब वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, तो फिर भी शहर के बीच से भारी वाहनों का संचालन क्यों जारी है?
इस मुद्दे को वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने प्रमुखता से उठाया। उनकी याचिका पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने 06 फरवरी 2026 को आगरा में सुनवाई की थी। सुनवाई के दौरान आयोग ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग (भूमि एवं यातायात का नियंत्रण) अधिनियम, 2002 की धारा 35 के तहत हाईवे प्रशासन को यह अधिकार है कि यदि वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो, तो शहर के भीतर भारी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित या पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सकता है।
उत्तरी बाईपास की उपलब्धता को देखते हुए आयोग ने हाईवे प्रशासन को निर्देश दिया था कि वह आवश्यक अधिसूचना जारी करे, जिससे गैर-गंतव्य भारी वाहनों का शहर में प्रवेश रोका जा सके। साथ ही एनएचएआई के संबंधित अधिकारियों को 16 मार्च 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।
हालांकि, निर्धारित तिथि 17 मार्च 2026 को कोई अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए आयोग ने पुनः निर्देश जारी किए हैं कि संबंधित अधिकारी 06 मई 2026 तक स्पष्टीकरण सहित रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
आगरा, जो विश्व धरोहरों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, वर्तमान समय में भारी वाणिज्यिक वाहनों के दबाव से जूझ रहा है। उत्तरी बाईपास, जो एनएच-19 को यमुना एक्सप्रेसवे से जोड़ता है, शहर को इस दबाव से राहत देने के लिए बनाया गया था। इस मार्ग के आसपास मरियम का मकबरा, अकबर का मकबरा, लोधी टॉम्ब, सलाबत खान का मकबरा और लाल मस्जिद जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं। इसके अलावा कई विद्यालय, अस्पताल और रिहायशी क्षेत्र भी इसके आसपास मौजूद हैं, जिससे इस क्षेत्र में सुरक्षित और नियंत्रित यातायात की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय को पहले गंभीरता से लिया है। 30 दिसंबर 1996 को दिए गए आदेश में बाईपास निर्माण और भारी वाहनों के शहर में प्रवेश को नियंत्रित करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद वर्ष 2012 में भी इस मामले की निगरानी की गई। इन आदेशों का उद्देश्य स्पष्ट था कि शहरों को भारी ट्रैफिक के दबाव से मुक्त किया जाए और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
फिर भी, वर्तमान स्थिति में उत्तरी बाईपास का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे जानकारी का अभाव और खंदौली टोल प्लाजा पर अतिरिक्त शुल्क को प्रमुख कारण माना जा रहा है। उत्तरी बाईपास का मार्ग 38 किलोमीटर लंबा है और पूरी तरह निर्बाध है, जबकि एनएच-19 से होकर जाने पर दूरी भले ही कम (लगभग 34 किलोमीटर) हो, लेकिन बार-बार लगने वाले जाम, ट्रैफिक सिग्नल और भीड़ यात्रा को जोखिमपूर्ण बना देते हैं।
आंकड़ों के अनुसार, आगरा शहर से प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख वाहन गुजरते हैं। इनमें बड़ी संख्या भारी वाहनों की होती है, जो न केवल प्रदूषण बढ़ाते हैं बल्कि सड़क सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बनते हैं।
एनएच-19, जो दिल्ली से कोलकाता तक लगभग 1435 किलोमीटर लंबा मार्ग है, देश के सबसे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्गों में से एक है। प्रतिदिन इस मार्ग से 80 हजार से 1.2 लाख वाहन गुजरते हैं, जिनमें 25 से 40 हजार तक भारी वाहन शामिल होते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से 60 से 70 प्रतिशत वाहन ऐसे होते हैं जिनका आगरा से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
शहर के प्रमुख चौराहे—सब्जी मंडी, सिकंदरा, आईएसबीटी, भगवान टॉकीज, वाटर वर्क्स और रामबाग—इस दबाव को प्रतिदिन झेलते हैं। इन स्थानों पर ट्रैफिक जाम, दुर्घटनाएं और प्रदूषण आम समस्या बन चुके हैं, जिससे स्थानीय निवासियों के जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और बाईपास की उपलब्धता के बावजूद यदि भारी वाहन शहर के भीतर प्रवेश कर रहे हैं, तो यह प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक को दर्शाता है।
के.सी. जैन का कहना है कि जब समाधान उपलब्ध हो और उसके बावजूद नागरिकों को जोखिम का सामना करना पड़े, तो यह केवल ट्रैफिक का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवागमन के अधिकार से जुड़ा विषय बन जाता है। भारी वाहनों से उत्पन्न वायु प्रदूषण भी नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।
अब जबकि आयोग ने 17 मई 2026 को अगली सुनवाई निर्धारित की है, यह अपेक्षा की जा रही है कि संबंधित एजेंसियां आवश्यक अधिसूचना जारी करेंगी और उत्तरी बाईपास का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा। यदि ऐसा होता है, तो आगरा शहर को ट्रैफिक जाम, दुर्घटनाओं और प्रदूषण से काफी हद तक राहत मिल सकती है और नागरिकों को सुरक्षित एवं सुगम यातायात व्यवस्था प्राप्त हो सकेगी।
