आगरा। एम.डी. जैन इंटर कॉलेज में आयोजित 32वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की ब्रजांचल कार्यशाला में आगरा और अलीगढ़ मंडल के जिला, एकेडमिक एवं ब्लॉक समन्वयकों को बाल वैज्ञानिकों की शोध क्षमता विकसित करने, विज्ञान एवं नवाचार को विद्यालय स्तर तक पहुंचाने और अधिक से अधिक विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला में इस वर्ष की थीम, परियोजना चयन, पंजीकरण प्रक्रिया, आयु वर्ग, मूल्यांकन प्रणाली और शोध आधारित प्रोजेक्ट तैयार करने की विस्तृत जानकारी साझा की गई।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद द्वारा आयोजित 32वीं राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस-2026 की ब्रजांचल कार्यशाला का सफल आयोजन एम.डी. जैन इंटर कॉलेज, हरीपर्वत में किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच, नवाचार और शोध संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ शिक्षकों को राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की कार्यप्रणाली, परियोजना निर्माण और प्रतियोगिता से जुड़े सभी पहलुओं की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराना रहा।
कार्यशाला में आगरा एवं अलीगढ़ मंडल के विभिन्न जनपदों से पहुंचे जिला समन्वयकों, एकेडमिक समन्वयकों तथा आगरा जनपद के ब्लॉक समन्वयकों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. संजय गर्ग तथा उपस्थित विशेषज्ञों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के ब्रजांचल समन्वयक डॉ. निखिल जैन ने कहा कि विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा, प्रयोगधर्मिता और नवाचार की भावना विकसित करने में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि यदि विद्यालय स्तर पर बच्चों को सही दिशा और मार्गदर्शन मिले तो वे समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी शोध कार्य कर सकते हैं।
कार्यशाला के दौरान राज्य समन्वयक दीपक शर्मा ने उपस्थित 32 शिक्षक-शिक्षिकाओं को राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की रूपरेखा, उद्देश्य और आयोजन प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह प्रतियोगिता विद्यार्थियों को केवल विज्ञान पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें समस्याओं की पहचान कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाधान खोजने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने सभी शिक्षकों से आह्वान किया कि वे अपने-अपने विद्यालयों से अधिक से अधिक बाल वैज्ञानिकों को इस लघु शोध प्रतियोगिता में शामिल कराएं, ताकि विद्यार्थियों में शोध की प्रवृत्ति विकसित हो और वैज्ञानिक सोच को नई दिशा मिल सके।
कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. हरिमान सिंह, डॉ. अनूप चतुर्वेदी, डॉ. राजेश पाराशर तथा डॉ. विष्णु प्रताप सिंह ने विभिन्न तकनीकी एवं शैक्षणिक विषयों पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। विशेषज्ञों ने शोध परियोजना तैयार करने की प्रक्रिया, विषय चयन, स्थानीय समस्याओं के वैज्ञानिक अध्ययन तथा परियोजना प्रस्तुतिकरण के मानकों पर चर्चा करते हुए शिक्षकों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।
राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के कार्यकारी सचिव डॉ. विष्णु प्रताप सिंह ने बताया कि वर्ष 2026 के लिए प्रोजेक्ट प्रदर्शन की मुख्य थीम स्थिरता के लिए विज्ञान और नवाचार निर्धारित की गई है। इस मुख्य विषय के अंतर्गत पांच उपविषयों पर विद्यार्थी अपनी शोध परियोजनाएं तैयार कर सकेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रतियोगिता में किसी प्रकार का मॉडल तैयार नहीं किया जाएगा। प्रतिभागियों को केवल शोध आधारित परियोजना तैयार करनी होगी, जिसमें समस्या की पहचान, अध्ययन, आंकड़ों का विश्लेषण, निष्कर्ष तथा समाधान जैसे सभी वैज्ञानिक चरण शामिल होंगे।
उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता में विद्यार्थियों को समूह के रूप में कार्य करना होगा। प्रत्येक समूह में अधिकतम दो प्रतिभागी शामिल किए जा सकते हैं, जिनमें एक समूह प्रमुख तथा दूसरा समूह सदस्य होगा। प्रतियोगिता दो आयु वर्गों में आयोजित होगी। पहला वर्ग 10 से 14 वर्ष तथा दूसरा वर्ग 14 से 17 वर्ष आयु के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित किया गया है। इन दोनों वर्गों के पात्र विद्यार्थी निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी परियोजनाओं के साथ प्रतियोगिता में भाग ले सकेंगे।
डॉ. विष्णु प्रताप सिंह ने पंजीकरण प्रक्रिया की जानकारी देते हुए बताया कि प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए सबसे पहले संबंधित विद्यालय का पंजीकरण कराया जाएगा। इसके बाद विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों का ऑनलाइन पंजीकरण किया जाएगा। उन्होंने सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं से अपील की कि वे समयबद्ध तरीके से पंजीकरण प्रक्रिया पूरी कर अधिक से अधिक विद्यार्थियों की सहभागिता सुनिश्चित करें, ताकि प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वैज्ञानिक क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिल सके।
कृषि विशेषज्ञ डॉ. राजेश पाराशर ने अपने संबोधन में भारतीय शिक्षा प्रणाली की वैज्ञानिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के दौर में विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे विद्यार्थियों को स्थानीय समस्याओं की पहचान कर तकनीक और वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करते हुए उपयोगी एवं प्रभावी शोध परियोजनाएं तैयार करने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाएं समाज, पर्यावरण और कृषि सहित विभिन्न क्षेत्रों की चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को परियोजना निर्माण, शोध पद्धति, विषय चयन, दस्तावेज तैयार करने, मूल्यांकन के मानदंड, प्रस्तुतीकरण शैली तथा प्रतियोगिता के विभिन्न चरणों की विस्तृत जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के साथ-साथ टीम भावना, विश्लेषण क्षमता, समस्या समाधान कौशल और नवाचार की संस्कृति को भी मजबूत करने का प्रभावी मंच है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित शिक्षकों ने कार्यशाला को उपयोगी बताते हुए अपने विद्यालयों में अधिक से अधिक विद्यार्थियों को राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस से जोड़ने का संकल्प लिया। आयोजकों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से विद्यालयों में शोध आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में अधिक संख्या में बाल वैज्ञानिक राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकेंगे।
कार्यशाला में राजीव कुमार अग्रवाल, आशीष दुबे, डॉ. प्रिया मिश्रा, प्रशांत कुमार शर्मा, दिलीप शाह, शैलेंद्र कुमार गुप्ता, देवराज सिंह सहित आगरा एवं अलीगढ़ मंडल के जिला, एकेडमिक और ब्लॉक समन्वयक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया।
