- आंबेडकर जयंती पर संगोष्ठी में सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण पर मंथन
- डॉ भीमराव आंबेडकर के विचार आज भी पूरी तरह प्रासंगिक: वक्ता
- शिक्षा, समानता और संविधान निर्माण पर वक्ताओं ने रखे विचार
आगरा: आगरा में डॉ भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय की आंबेडकर चेयर द्वारा पालीवाल पार्क परिसर स्थित जुबली हॉल में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। “वर्तमान भारत में सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की प्रासंगिकता” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति ने की।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने आंबेडकर के जीवन, शिक्षा, सामाजिक सुधार, महिलाओं के अधिकार, संविधान निर्माण और समानता के सिद्धांतों पर विस्तार से विचार रखे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आंबेडकर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे और समाज में समानता, शिक्षा और समावेशी विकास के लिए उनके विचारों को अपनाना आवश्यक है।
आगरा में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने डॉ भीमराव आंबेडकर के जीवन संघर्ष और उपलब्धियों को विस्तार से रेखांकित किया। कुलपति ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ आंबेडकर ने उच्च शिक्षा विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों से प्राप्त की और अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों के बावजूद समाज में व्याप्त विषमताओं को समाप्त करने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भी शिक्षा और ज्ञान की परंपरा रही है, लेकिन समय के साथ सामाजिक व्यवस्थाओं में कई बदलाव और विकृतियां आईं, जिनका आंबेडकर ने अपने विचारों और प्रयासों से समाधान प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने न केवल सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि महिलाओं के उत्थान के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके द्वारा निर्मित संविधान आज भी देश के हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है और समाज में समानता स्थापित करने का आधार है।
उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना और हर व्यक्ति विशेषकर महिलाओं को शिक्षित करने पर जोर दिया। उन्होंने रूढ़िवादी सोच के खिलाफ खड़े होकर समाज को नई दिशा देने का काम किया।
कुलपति ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि उन्हें विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ है, और यह अधिकार भी आंबेडकर द्वारा दिए गए संवैधानिक ढांचे के कारण ही संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि हमें केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को भी समझना होगा और समाज में शिक्षा एवं समानता को बढ़ावा देना होगा।
वाराणसी स्थित एमजी केवीपी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने अपने विचार रखते हुए कहा कि डॉ आंबेडकर को कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने विचारों और ज्ञान के माध्यम से हमेशा हमारे बीच मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने समानता और समता का अधिकार देकर समाज को मजबूत बनाया। उन्होंने कहा कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, शिक्षा ही व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
लखनऊ स्थित बीबीएयू के प्रोफेसर ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ आंबेडकर ने अपने जीवन में जिन समस्याओं का सामना किया, उन्हें समाप्त करने के लिए आजीवन संघर्ष किया ताकि आने वाली पीढ़ियों को कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाकर रूढ़िवादी व्यवस्था पर प्रहार किया और जाति व्यवस्था के समूल नाश का समर्थन किया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों की नींव रखी, जिससे उन्हें समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हुआ।
उन्होंने आगे कहा कि आंबेडकर के विचारों में समावेशी विकास और सतत विकास की अवधारणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनका उद्देश्य था कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचे। उनके विचार बुद्ध के दर्शन से प्रेरित थे और शिक्षा को उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा साधन बताया।
कार्यक्रम में समाज विज्ञान संस्थान के प्रतिनिधि ने आयोजन के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी का संचालन संबंधित विभाग के शिक्षक ने किया जबकि अंत में समाज विज्ञान विभाग के निदेशक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि समाज में कई बार धर्म के नाम पर गलत धारणाएं फैलाई जाती हैं, जबकि किसी भी धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं बल्कि एकता है। उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ धार्मिक मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर परखने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी और शिक्षक उपस्थित रहे। पूरे आयोजन में डॉ आंबेडकर के विचारों को समाज में लागू करने और शिक्षा के माध्यम से समानता स्थापित करने पर विशेष जोर दिया गया।

