आगरा (ब्यूरो)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त सैन्य कार्रवाई करते हुए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू किया। इस कार्रवाई में ईरान के कई सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटरों और सैन्य ढांचे को मिसाइलों और हवाई हमलों से निशाना बनाया गया। हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई के मारे जाने की खबर सामने आई, जिसके बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव तेजी से बढ़ गया। वॉशिंगटन में इसे मजबूत नेतृत्व का कदम बताया गया और दावा किया गया कि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगेगा, जबकि तेहरान में गुस्सा और विरोध भड़क उठा और संघर्ष दूसरे सप्ताह में पहुंच गया।
हालांकि अमेरिका के भीतर इस कार्रवाई को लेकर वैसा देशभक्ति का उबाल नहीं दिखा जैसा पहले के युद्धों में देखा गया था। CNN/SSRS के सर्वे में 59 प्रतिशत अमेरिकियों ने हमले को गलत बताया जबकि 41 प्रतिशत ने समर्थन किया। NPR/PBS/Marist पोल के अनुसार 56 प्रतिशत लोग सैन्य कार्रवाई के खिलाफ और 44 प्रतिशत इसके समर्थन में हैं। Reuters/Ipsos के सर्वे में केवल 27 प्रतिशत लोगों ने हमलों का समर्थन किया। हमलों के बाद ट्रंप की लोकप्रियता भी घटकर 40 से 45 प्रतिशत के बीच आ गई है।
अमेरिका में इस मुद्दे पर गहरा राजनीतिक विभाजन दिखाई दे रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84 प्रतिशत लोग कार्रवाई के समर्थन में हैं, जबकि डेमोक्रेट्स में 86 प्रतिशत लोग इसके विरोध में हैं। इंडिपेंडेंट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ है और कई सर्वे में 55 से 59 प्रतिशत लोग युद्ध को आगे बढ़ाने के विरोध में बताए गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बिना राष्ट्रीय एकता के शुरू हुई जंग अक्सर राजनीतिक दलदल बन जाती है।
पिछले युद्धों से तुलना करें तो स्थिति अलग है। 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को करीब 92 प्रतिशत समर्थन मिला था और इराक युद्ध से पहले लगभग 72 प्रतिशत लोग समर्थन में थे, जबकि ईरान के मामले में मुश्किल से आधा देश साथ दिखाई दे रहा है। बड़ी चिंता यह भी है कि इस कार्रवाई के पीछे अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति क्या है। कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकी नागरिकों को स्पष्ट योजना नजर नहीं आ रही। सवाल उठ रहा है कि यह सीमित हमला है, शासन परिवर्तन की कोशिश है या एक लंबी जंग की शुरुआत।
संवैधानिक पहलू भी बहस का विषय बना हुआ है क्योंकि इस सैन्य कार्रवाई को अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी नहीं मिली थी। सर्वे बताते हैं कि 59 प्रतिशत अमेरिकियों का मानना है कि किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का आरोप है कि व्हाइट हाउस ने यह फैसला अकेले लिया।
इस बीच नागरिक हताहतों की खबरों ने विवाद और बढ़ा दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों के स्कूल के हमले की चपेट में आने की बात सामने आई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी बढ़ी है। युद्ध के बीच नागरिकों की मौत को लेकर अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं।
ट्रम्प के समर्थक खेमे में भी कुछ असहमति दिखाई दे रही है। टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे सैन्य हस्तक्षेप से सावधान रहने की चेतावनी दी है और इसे एक और लंबी जंग बनने का खतरा बताया है। वहीं Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक हताहतों पर अधिक स्पष्ट और ईमानदार जवाब देने की मांग की है।
अमेरिकी राजनीति में भी टकराव तेज हो गया है। रिपब्लिकन नेता इसे जरूरी कदम बताते हुए कहते हैं कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था, जबकि डेमोक्रेट्स इसे “चुनी हुई जंग” और खतरनाक बढ़ोतरी बताते हैं। वॉशिंगटन से बाहर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर बहस तेज है। समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने यह कदम जरूरी बना दिया, जबकि विरोधियों का आरोप है कि अमेरिका फिर से इराक जैसी गलती दोहरा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हर युद्ध की कीमत भारी होती है। एक ओर अमेरिकी सैनिक जोखिम में पड़ते हैं, दूसरी ओर ईरानी नागरिकों को तबाही झेलनी पड़ती है और पूरा क्षेत्र अस्थिर हो जाता है। इतिहास बताता है कि बमबारी अक्सर नफरत खत्म नहीं करती बल्कि नई टकराव की जमीन तैयार कर देती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ट्रंप के लिए बड़ा दांव साबित हो सकता है। यदि ईरान की सैन्य शक्ति जल्दी कमजोर होती है तो इसे बड़ी जीत बताया जाएगा, लेकिन यदि युद्ध लंबा खिंचा तो इसकी राजनीतिक कीमत भारी पड़ सकती है। इराक और अफगानिस्तान की जंगें पहले ही अमेरिका की राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ चुकी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या यह ट्रंप की सबसे बड़ी जीत साबित होगी या फिर वही क्षण जिसे इतिहास उनका ‘वाटरलू’ कहेगा।

