आगरा। जिले में चल रही शिक्षक समायोजन एवं स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन (यूटा) आगरा ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में प्रधानाध्यापकों को सरप्लस घोषित कर हटाने की तैयारी की जा रही है, जिससे विशेषकर नगर क्षेत्र के विद्यालयों का संचालन प्रभावित हो सकता है। संगठन का दावा है कि कई स्कूल केवल एक-एक हेड शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और यदि उन्हें भी हटाया गया तो विद्यालयों में ताले लगने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षक समायोजन और स्थानांतरण प्रक्रिया अब नए विवाद का कारण बनती दिखाई दे रही है। यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन (यूटा), आगरा ने इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि विभाग द्वारा तैयार की गई सूची में बड़ी संख्या में प्रधानाध्यापकों को सरप्लस दिखाया गया है, जबकि वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। संगठन का आरोप है कि यदि इन हेड शिक्षकों को विद्यालयों से हटाया गया तो कई स्कूलों का नियमित संचालन ठप हो सकता है।
यूटा आगरा के जिलाध्यक्ष केके शर्मा और जिला महामंत्री राजीव वर्मा ने कहा कि वर्षों से प्रधानाध्यापक विद्यालयों की व्यवस्था संभालते आ रहे हैं। उन्होंने छात्र नामांकन बढ़ाने, प्रशासनिक कार्यों को व्यवस्थित रखने और विद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में उन्हें सरप्लस मानकर हटाने का निर्णय शिक्षा व्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

संगठन के अनुसार सबसे गंभीर स्थिति नगर क्षेत्र की है। आगरा नगर क्षेत्र में करीब 135 विद्यालय संचालित हैं और इनमें से अधिकांश स्कूलों में केवल एक-एक प्रधानाध्यापक ही कार्यरत हैं। इन विद्यालयों में सहायक शिक्षकों की संख्या या तो बेहद कम है या कई जगह उपलब्ध ही नहीं है। यूटा का कहना है कि यदि ऐसे विद्यालयों से भी हेड शिक्षकों को हटा दिया गया तो स्कूलों का संचालन करना मुश्किल हो जाएगा।
शिक्षक संगठन का दावा है कि प्रधानाध्यापक केवल पढ़ाने का कार्य ही नहीं करते, बल्कि विद्यालय संचालन से जुड़े तमाम प्रशासनिक दायित्व भी निभाते हैं। इनमें छात्र उपस्थिति, नामांकन, मिड-डे मील व्यवस्था, विभागीय पोर्टल पर डाटा अपलोड, अभिभावकों से समन्वय, निरीक्षण संबंधी कार्य और शैक्षिक गतिविधियों की निगरानी शामिल है। ऐसे में यदि विद्यालय में कोई अन्य शिक्षक मौजूद नहीं है और प्रधानाध्यापक को भी हटा दिया जाता है, तो स्कूल का संचालन व्यवहारिक रूप से संभव नहीं रह जाएगा।
यूटा ने यह भी आरोप लगाया कि सामान्यतः समायोजन या सरप्लस की स्थिति में कनिष्ठ शिक्षकों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती रही है, लेकिन वर्तमान प्रक्रिया में वरिष्ठ और जिम्मेदारी संभाल रहे प्रधानाध्यापकों को हटाने की तैयारी की जा रही है। संगठन का कहना है कि यह न केवल प्रशासनिक दृष्टि से अनुचित है बल्कि इससे बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होगी।
संगठन के पदाधिकारियों ने सवाल उठाया कि जब पहले से ही विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है, तब ऐसी स्थिति में प्रधानाध्यापकों को हटाने का औचित्य क्या है। उनका कहना है कि विभागीय आंकड़ों और जमीनी स्थिति में बड़ा अंतर है। कागजों में विद्यालयों को सरप्लस दिखाया जा सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई विद्यालय एकल शिक्षक व्यवस्था पर निर्भर हैं।
यूटा ने जिला प्रशासन और बेसिक शिक्षा विभाग से मांग की है कि सरप्लस घोषित करने की प्रक्रिया पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए। संगठन ने नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों का स्थलीय सत्यापन कराने की मांग भी उठाई है ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। उनका कहना है कि बिना जमीनी जांच के लिए गए निर्णय शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि बिना समीक्षा के हेड शिक्षकों को हटाने की प्रक्रिया जारी रही तो शिक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है। कई विद्यालयों में पठन-पाठन बाधित हो सकता है और कुछ जगहों पर स्कूल बंद होने जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। यूटा ने इसके लिए पूरी जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय पर डाली है।
शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक संख्या और विद्यालय संचालन के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि किसी विद्यालय में केवल एक ही शिक्षक कार्यरत है, तो उसे हटाने से निश्चित रूप से संचालन प्रभावित हो सकता है। वहीं विभाग का तर्क यह हो सकता है कि उपलब्ध शिक्षकों का संतुलित वितरण किया जाए ताकि जहां आवश्यकता अधिक है वहां शिक्षकों की तैनाती की जा सके। ऐसे में अंतिम निर्णय वास्तविक स्थिति के आंकलन और प्रशासनिक समीक्षा के बाद ही प्रभावी माना जाएगा।
