• स्लॉथ भालू की सामान्य जीवन प्रत्याशा 16–20 वर्ष होती है, चमेली ने 35 वर्ष जीवित रहकर नया कीर्तिमान स्थापित किया।
• उसके निधन से केंद्र में एक दीर्घकालिक निवासी की विदाई, लेकिन संरक्षण और देखभाल की प्रेरणा जारी।
• चमेली का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए करुणा, समर्पण और सुरक्षा का संदेश।
आगरा। वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक मार्मिक अध्याय का अंत उस समय हो गया जब आगरा स्थित भालू संरक्षण केंद्र में रह रही 35 वर्षीय वृद्ध स्लॉथ भालू चमेली ने अंतिम सांस ली। वन विभाग के सहयोग से वाइल्डलाइफ एसओएस द्वारा संचालित इस केंद्र में पिछले दो दशकों से अधिक समय से रह रही चमेली का निधन वृद्धावस्था संबंधी जटिलताओं के कारण हुआ। उसका जीवन संघर्ष, पीड़ा, पुनर्वास और अंततः गरिमापूर्ण जीवन का ऐसा उदाहरण रहा, जो वन्यजीव संरक्षण के महत्व को गहराई से रेखांकित करता है।

चमेली का अतीत अत्यंत दर्दनाक रहा था। वर्ष 2003 में उसे उत्तर प्रदेश से रेस्क्यू किया गया था, जहां वह लंबे समय तक ‘डांसिंग भालू’ के अवैध और क्रूर व्यापार का हिस्सा रही थी। उस समय उसकी आयु लगभग 12 वर्ष थी। इस अमानवीय प्रथा के तहत भालुओं को सड़कों पर नचाने के लिए उनके साथ गंभीर शारीरिक और मानसिक अत्याचार किए जाते थे। चमेली भी इस क्रूरता का शिकार हुई थी। उसके नुकीले दांत जबरन निकाल दिए गए थे, जिससे न केवल उसका शरीर कमजोर हो गया था बल्कि वह लगातार दर्द और असहजता में भी रहती थी।

रेस्क्यू के बाद जब उसे आगरा भालू संरक्षण केंद्र लाया गया, तब उसकी हालत बेहद दयनीय थी। भय और आघात के कारण उसका व्यवहार आक्रामक हो गया था। शुरुआत में वह अपने नए वातावरण से घबराई रहती थी और किसी भी तरह के संपर्क से बचने की कोशिश करती थी। हालांकि, वाइल्डलाइफ एसओएस की समर्पित टीम ने निरंतर देखभाल, संतुलित आहार, सुरक्षित बाड़े और व्यवस्थित दिनचर्या के माध्यम से धीरे-धीरे उसमें विश्वास और सहजता विकसित की।

समय के साथ चमेली में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला। वह धीरे-धीरे अपने परिवेश के अनुकूल होती गई और उसका व्यवहार भी शांत एवं स्थिर होने लगा। उसका यह बदलाव इस बात का प्रमाण था कि यदि वन्यजीवों को सही वातावरण, सुरक्षा और देखभाल मिले तो वे अपने दर्दनाक अतीत से उबरकर सामान्य जीवन जी सकते हैं।
जंगल में स्लॉथ भालुओं की औसत आयु सामान्यतः 16 से 20 वर्ष होती है, लेकिन चमेली ने 35 वर्ष का लंबा जीवन जिया। यह उसके लिए उपलब्ध कराई गई उत्कृष्ट पशु चिकित्सा सेवाओं, संतुलित पोषण और तनावमुक्त वातावरण का परिणाम था। उसके जीवन के अंतिम वर्षों में उसे विशेष देखभाल दी जा रही थी। उसके आहार में ताजे फल और विशेष रूप से तैयार दलिया शामिल था, साथ ही मल्टीविटामिन और लीवर सप्लीमेंट भी दिए जाते थे। उम्र संबंधी बीमारियों के उपचार के लिए वह नियमित रूप से पशु चिकित्सकों की निगरानी में रहती थी।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने चमेली के जीवन को संघर्ष और उम्मीद की मिसाल बताते हुए कहा कि उसने अत्यंत कठिन परिस्थितियों से निकलकर एक सुरक्षित और स्थिर जीवन जिया। उनका कहना था कि चमेली की कहानी वन्यजीवों के प्रति होने वाली क्रूरता को समाप्त करने के प्रयासों को और मजबूत करती है।
संस्था की सह-संस्थापक और सचिव गीता शेषमणि ने भी चमेली के परिवर्तन को उल्लेखनीय बताया। उन्होंने कहा कि एक भयभीत और आक्रामक भालू से एक शांत और सहज जीव में उसका बदलना दीर्घकालिक पुनर्वास की सफलता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि चमेली को हमेशा स्नेह और सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
वहीं, पशु-चिकित्सा सेवाओं के उप-निदेशक डॉ. एस. इलयाराजा ने बताया कि चमेली के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाता था और उसके जीवन के अंतिम समय तक उसे सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की गईं।
चमेली ने अपने जीवन के 20 से अधिक वर्ष आगरा भालू संरक्षण केंद्र में बिताए, जहां उसकी देखभाल करने वाली टीम ने हर चरण में उसका साथ दिया। उसका निधन न केवल इस केंद्र के एक पुराने सदस्य की विदाई है, बल्कि यह उस संघर्ष की याद भी दिलाता है, जो वन्यजीवों को शोषण से मुक्त कराने और उन्हें सम्मानजनक जीवन देने के लिए निरंतर जारी है। चमेली की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश है कि करुणा, संरक्षण और समर्पण से किसी भी जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।

