लक्ष्मी नारायण उदासीन आश्रम में तृतीय दिवस पर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का संगम
कथा व्यास कृष्ण दीक्षित ने कर्दम-देवहूति विवाह, कपिलोपाख्यान और सती चरित्र की व्याख्या की
श्रद्धालुओं ने भागवत कथा सुनकर भाव विभोर होकर भक्ति रस का अनुभव किया
फतेहाबाद: लक्ष्मी नारायण उदासीन आश्रम बाबा की तिबरिया में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर श्रद्धालु भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी में डूब गए। कथा व्यास कृष्ण दीक्षित ने कर्दम ऋषि और माता देवहूति के गृहस्थ जीवन, भगवान कपिल द्वारा दिए गए सांख्य योग के उपदेश, सती चरित्र और ध्रुव चरित्र का विस्तृत वर्णन किया। कथा के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भाव विभोर होकर भक्ति रस में लीन रहे।
लक्ष्मी नारायण उदासीन आश्रम, बाबा की तिबरिया, फतेहाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर कथा व्यास कृष्ण दीक्षित ने कर्दम-देवहूति विवाह, कपिलोपाख्यान, सती चरित्र और ध्रुव चरित्र का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उपस्थित श्रद्धालु गिर्राज दीक्षित, नीरज पाराशर, सुनील उपाध्याय सहित अन्य भाव विभोर होकर कथा का रसपान कर रहे थे। कथा का मुख्य संदेश यह रहा कि मन का नियंत्रण ही बंधन और मोक्ष का कारण है, और अटल संकल्प एवं भक्ति से परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। श्रद्धालु पूरी तरह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी में डूबे रहे।
कथा के दौरान कृष्ण दीक्षित ने बताया कि कर्दम ऋषि और माता देवहूति का जीवन त्याग, सेवा और आध्यात्मिक अनुशासन का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि भगवान कपिल द्वारा माता देवहूति को दिए गए ‘सांख्य योग’ के उपदेश में यह सिखाया गया है कि मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मोक्ष का मुख्य कारण है। यदि मन संसार के मोह और आसक्ति में लगा है तो वह बंधन है, और यदि वही मन भगवान के चरणों में स्थिर हो जाए तो परम पद की प्राप्ति संभव है।
सती चरित्र के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कृष्ण दीक्षित ने कहा कि दक्ष प्रजापति के अहंकार ने विनाश की नींव रखी। सती ने अपने पति भगवान शिव के अपमान को सहन न करते हुए योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर दिया। उन्होंने यह उदाहरण देते हुए बताया कि सती का चरित्र न केवल स्त्रीत्व का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करता है, बल्कि धर्म, भक्ति और मर्यादा का भी संदेश देता है।
ध्रुव चरित्र के बारे में कथा व्यास ने बताया कि मात्र पांच वर्ष की अल्पायु में विमाता के कटु वचनों से आहत होकर ध्रुव का वन गमन और नारद जी की दीक्षा ने उसे भगवान विष्णु को प्रसन्न करने योग्य बनाया। कृष्ण दीक्षित ने कहा कि यदि लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प ध्रुव जैसा अटल हो, तो विधाता भी अपनी योजना बदलने पर मजबूर हो जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अटल संकल्प, भक्ति और कर्म से ही मनुष्य अपने जीवन में परम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
कथा के दौरान उपस्थित श्रद्धालु गिर्राज दीक्षित, नीरज पाराशर, सुनील उपाध्याय सहित कई अन्य लोग भाव विभोर होकर सुनते रहे। कथा के संदेश ने सभी को आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से गहराई तक छू लिया।

