आगरा: डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के स्वामी विवेकानंद परिसर, खंदारी स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (IET) में आयोजित 21 दिवसीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) ओरिएंटेशन कार्यक्रम ‘एआई फॉर ऑल’ के अंतर्गत लगातार ज्ञानवर्धक, शोधपरक एवं प्रेरणादायी सत्रों की श्रृंखला जारी है।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर आशु रानी के दूरदर्शी नेतृत्व, अकादमिक प्रतिबद्धता एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली सोच तथा संस्थान के निदेशक प्रोफेसर मनुप्रताप सिंह के कुशल निर्देशन में यह कार्यक्रम शिक्षकों, कर्मचारियों एवं शोधार्थियों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ते हुए शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।
यह 21 दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम न केवल प्रतिभागियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विभिन्न आयामों से परिचित करा रहा है, बल्कि उन्हें व्यावहारिक उपयोग, अनुसंधान संभावनाओं और भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के प्रति भी जागरूक बना रहा है। कार्यक्रम के अंतर्गत विशेषज्ञों द्वारा दिए जा रहे व्याख्यान प्रतिभागियों के ज्ञानवर्धन के साथ-साथ उनके दृष्टिकोण को भी व्यापक बना रहे हैं।
कार्यक्रम के दसवें दिवस पर ‘जेनरेटिव एआई के दौर में शिक्षकों की भूमिका’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में विषय विशेषज्ञ डॉ. शिल्पी लवानिया ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में हो रहे परिवर्तन और उसमें शिक्षकों की बदलती भूमिका को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि आज का शिक्षक केवल पारंपरिक अर्थों में ज्ञान देने वाला नहीं रह गया है, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, मेंटर, नवाचार को प्रेरित करने वाला तथा विद्यार्थियों में रचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक सोच विकसित करने वाला प्रमुख स्तंभ बन चुका है।
उन्होंने विस्तार से बताया कि जेनरेटिव एआई के इस दौर में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जहां विद्यार्थियों के पास जानकारी के असीमित स्रोत उपलब्ध हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका जानकारी देने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसे विद्यार्थियों को सही दिशा देना, उनके विचारों को परिष्कृत करना और उन्हें वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान हेतु तैयार करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विद्यार्थियों में क्रिटिकल थिंकिंग, समस्या समाधान क्षमता और नवाचार की भावना विकसित करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
डॉ. शिल्पी लवानिया ने एआई के नैतिक उपयोग पर विशेष बल देते हुए कहा कि तकनीक का सही और जिम्मेदार उपयोग ही उसे समाज के लिए उपयोगी बना सकता है। उन्होंने प्लेगरिज्म से बचाव, अकादमिक ईमानदारी बनाए रखने तथा मौलिकता को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
उन्होंने शिक्षकों को सलाह दी कि वे स्वयं को लगातार अपडेट रखें और आजीवन शिक्षार्थी बने रहें, ताकि वे बदलते तकनीकी परिवेश के अनुरूप विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर सकें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चाहे तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, शिक्षा के केंद्र में मानवीय संवेदनाएं, सहानुभूति, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी हमेशा बनी रहनी चाहिए।
कार्यक्रम के ग्यारहवें दिवस पर ‘डेटा विज्ञान के मूलभूत आधार’ विषय पर विषय विशेषज्ञ डॉ. राजकुमार यादव ने अत्यंत विस्तृत, विश्लेषणात्मक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने सूचना विज्ञान से डेटा विज्ञान तक के विकास क्रम को क्रमबद्ध तरीके से समझाते हुए बताया कि किस प्रकार इंटरनेट के विस्तार और प्रारंभिक सर्च इंजनों के विकास ने डेटा के संग्रहण और विश्लेषण की दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन किए, जिसने आगे चलकर डेटा विज्ञान की नींव को मजबूत किया।

