ब्रज खंडेलवाल,आगरा
आगरा। देशभर की नदियों में अवैध रेत खनन का संकट लगातार बढ़ रहा है। आगरा से लेकर कर्नाटक तक हाईकोर्ट की ताज़ा टिप्पणियों ने साफ कर दिया है कि राज्य प्रशासन रेत माफिया के सामने पूरी तरह असहाय हो चुका है। यमुना, चंबल, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों में कानून थक चुका है, प्रशासन ने कार्रवाई की गुंजाइश छोड़ दी है और राजनीतिक इच्छाशक्ति नदारद है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि राज्य के गृह मंत्री भी अवैध खनन रैकेट पर कार्रवाई करने में असहाय महसूस करते हैं, तो राज्य तंत्र से कोई चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती। गृह मंत्री जी. परमेश्वर के विधानसभा में दिए गए बयान के अनुसार अवैध रेत खनन इतना बड़ा रैकेट बन चुका है कि इसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं और अपराध सत्ता के पाले में भी सुरक्षित है।
रेट खनन केवल “माइनर मिनरल” का मामला नहीं है। यह पर्यावरणीय संकट, आर्थिक अपराध और कई जगहों पर जानलेवा धंधा बन चुका है। भारत में हर साल 700 मिलियन टन से अधिक रेत की खपत होती है, जिसका बड़ा हिस्सा नदियों से अवैध रूप से निकाला जाता है। परिणामस्वरूप नदियों की प्राकृतिक धारा टूट रही है, किनारे ढह रहे हैं, भूजल नीचे खिसक रहा है और जल गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
आगरा में यमुना की स्थिति भयावह है। नदी ताजमहल के नीचे से बहते हुए अब साल के अधिकांश समय सूखी सीवेज नहर बन चुकी है। रेत खनन के कारण पानी की मात्रा कम हो गई है, प्रवाह टूट चुका है और प्रदूषण बढ़ रहा है। संगमरमर पर हरे धब्बे उभर रहे हैं, गोल्डीचिरोनोमस नामक कीड़े पनप रहे हैं और नींव की लकड़ियां सड़ रही हैं।
चंबल की स्थिति और भी गंभीर है। मुरैना और धौलपुर से रोजाना सैकड़ों ट्रक रेत अवैध रूप से निकाले जा रहे हैं। घड़ियाल, दुर्लभ कछुओं और संकटग्रस्त पक्षियों के प्रजनन क्षेत्र बर्बाद हो रहे हैं। रेत हटने से अंडे दब जाते हैं, घोंसले उजड़ जाते हैं और प्रजनन क्षेत्र खत्म हो रहे हैं।
विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के अनुसार कानूनों और दिशानिर्देशों की कमी नहीं है, एनजीटी और उच्च न्यायालय के आदेश हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव राज्य को असहाय बना देता है। रेत माफिया केवल खनन तक सीमित नहीं है; यह चुनाव फंड करता है, अफसरों को खरीदता है और सभी राजनीतिक दलों में अपने लोग बैठाता है। इसलिए यह कोई एक दल की समस्या नहीं, बल्कि क्रॉस-पार्टी अपराध है।
अगर यही चलता रहा, तो नदियों की बहाली मुश्किल हो जाएगी और यह समाज के लिए दीर्घकालिक संकट बन जाएगा। नदियां सिर्फ पानी नहीं देतीं, वे सभ्यता, जीवन और कृषि को संजोए रखती हैं। जो समाज अपनी नदियों को नहीं बचा सकता, वह अपने भविष्य की नींव खुद खोद रहा है। रेत माफिया की बढ़ती ताकत और सरकारी विफलता इस संकट को और गहरा बना रही है।
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