सार
आगरा के यमुना आरती स्थल पर मदर्स डे के अवसर पर रिवर कनेक्ट कैंपेन द्वारा भव्य धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान यमुना मैय्या की पूजा-अर्चना, दुग्धाभिषेक और भव्य आरती के साथ-साथ नदी संरक्षण और स्वच्छता का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में यमुना प्रदूषण की गंभीर स्थिति पर भी चिंता जताई गई और इसे जन आंदोलन बनाने की अपील की गई।

आगरा। मदर्स डे के अवसर पर रविवार शाम यमुना आरती स्थल पर रिवर कनेक्ट कैंपेन द्वारा एक विशेष सेवा, पूजा और जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। शांत यमुना तट, शीतल हवा और आध्यात्मिक वातावरण ने पूरे आयोजन को अत्यंत भावपूर्ण और दिव्य बना दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत मां यमुना के दुग्धाभिषेक और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से यमुना मैय्या की पूजा-अर्चना की और नदी संरक्षण का संकल्प लिया। दीपों की रोशनी और घंटियों की गूंज के बीच भव्य यमुना आरती संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक बृज खंडेलवाल ने कहा कि यमुना केवल एक नदी नहीं बल्कि हमारी संस्कृति और जीवन का आधार है। उन्होंने कहा कि यमुना को मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन आज यह नदी गंभीर प्रदूषण का सामना कर रही है। उन्होंने नागरिकों से इसे बचाने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की।
आधिकारिक रिपोर्टों और पर्यावरणीय आंकड़ों के अनुसार, आगरा में यमुना नदी में रोजाना लगभग 100 से 131 मिलियन लीटर (MLD) तक बिना उपचारित सीवेज सीधे छोड़ा जाता है, जिससे नदी का पानी अत्यधिक प्रदूषित हो रहा है । कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि शहर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण गंदा पानी सीधे यमुना में जा रहा है ।
सरकारी स्तर पर यमुना की सफाई के लिए 177.6 MLD क्षमता के नए STP प्रोजेक्ट्स और करीब 582 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के प्रोजेक्ट स्वीकृत किए गए हैं । इसके अलावा नगर निगम और जल निगम द्वारा ड्रेनों को टैप करने और इंटरसेप्शन डायवर्जन जैसी योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है।हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक शहर से निकलने वाले सभी नालों का पूर्ण उपचार सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक यमुना की स्थिति में बड़ा सुधार मुश्किल है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और नदी स्वच्छता पर जोर दिया। भजन, सामूहिक गायन और आरती के माध्यम से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। पंडित हरिदत्त शर्मा के भजनों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
डॉ मुकुल पांडे, डॉ देवाशीष भट्टाचार्य, डॉ हरेंद्र गुप्ता, डॉ मुनीश्वर गुप्ता, गोस्वामी नंदन श्रोतरीय, डॉ ज्योति खंडेलवाल, चतुर्भुज तिवारी, सतीश गुप्ता, दीपक राजपूत, पद्मिनी अय्यर, मीरा खंडेलवाल, मुकेश चौधरी, होतेंद्र सिंह और अमित लवानिया सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया और यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने का सामूहिक संकल्प लिया गया। यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण जागरूकता का एक मजबूत संदेश बनकर सामने आया।
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यमुना डीसिल्टिंग केस में बड़ा अपडेट: IIT रुड़की करेगा वैज्ञानिक अध्ययन
आगरा की यमुना नदी में डीसिल्टिंग (गाद हटाने) को लेकर चल रहे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश देते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की को वैज्ञानिक अध्ययन करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार के उस एफिडेविट को अस्वीकार कर दिया जिसमें डीसिल्टिंग की आवश्यकता नहीं बताई गई थी। यह मामला वर्ष 2019 की याचिका से जुड़ा है, जिस पर लगातार सुनवाई जारी है।
आगरा। यमुना नदी में डीसिल्टिंग और सफाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे महत्वपूर्ण मामले में नया मोड़ सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की की विशेषज्ञ टीम को यमुना नदी में जमा गाद, कीचड़ और तलछट (सिल्ट) का वैज्ञानिक अध्ययन करने को कहा है।
यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन द्वारा वर्ष 2019 में दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें यमुना की सफाई और नदी तल में जमा गाद को हटाने की मांग की गई थी। हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्जवल भुयां की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दाखिल उस एफिडेविट को अस्वीकार कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि यमुना में डीसिल्टिंग की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यमुना की सफाई और गाद हटाने जैसे विषयों पर स्पष्ट और वैज्ञानिक आधार पर रिपोर्ट जरूरी है। इसके चलते अब IIT रुड़की की टीम यमुना की स्थिति का विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
पहले इस मामले में सिंचाई विभाग ने केंद्रीय जल और विद्युत अनुसंधान स्टेशन (CWPRS), पुणे और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) से राय ली थी, जिसमें डीसिल्टिंग को आवश्यक नहीं माना गया था। इसी आधार पर राज्य सरकार ने एफिडेविट दाखिल किया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।
अधिवक्ता केसी जैन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि यमुना की तलहटी में जमा गाद, कीचड़ और गंदगी की सफाई के लिए जिम्मेदार विभागों को स्पष्ट करते हुए नया विस्तृत एफिडेविट दाखिल किया जाए।
इसके साथ ही कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया है कि यमुना की सफाई किसी भी स्थिति में रोकी नहीं जा सकती और इसके लिए विशेषज्ञ एजेंसियों की सहायता अनिवार्य है।
वहीं आगरा में पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि IIT रुड़की की रिपोर्ट के बाद यमुना की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और सफाई कार्य में तेजी आएगी।
इस मामले से जुड़ी आगे की सुनवाई और रिपोर्ट पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह निर्णय यमुना संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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रिपोर्ट में बढ़ा वन क्षेत्र, लेकिन जमीन पर घटते पेड़ और बढ़ता अवैध कटान
आगरा जिले में वन क्षेत्र को लेकर जारी आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। जहां मंत्रालय के मानकों के अनुसार 33 प्रतिशत भूमि पर वन होना चाहिए, वहीं फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (2023) की रिपोर्ट में केवल 6.82 प्रतिशत वन क्षेत्र दर्ज किया गया है। हालांकि परिभाषा में बदलाव के कारण आंकड़ों में आंशिक वृद्धि दिखी है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है और अवैध पेड़ कटान की समस्या लगातार जारी है।
आगरा। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार किसी भी जिले में कम से कम 33 प्रतिशत भूमि पर वन होना आवश्यक है, लेकिन आगरा इस मानक से काफी पीछे है। वर्ष 2023 की फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) रिपोर्ट के अनुसार जिले में कुल भूमि 4027 वर्ग किलोमीटर में से केवल 274.73 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही वनाच्छादित है, जो लगभग 6.82 प्रतिशत है।
रिपोर्ट में वर्ष 2021 की तुलना में वन क्षेत्र में 12.90 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि जरूर दर्ज की गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि वास्तविक वृक्षारोपण के कारण नहीं बल्कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा पेड़ों की परिभाषा में किए गए बदलाव के कारण है। नई परिभाषा में एक मीटर ऊंचे और 2.5 सेंटीमीटर व्यास से अधिक पौधों और बांस को भी पेड़ की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिससे आंकड़ों में वृद्धि दिखाई दे रही है।
इसी बीच केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) ने सुप्रीम कोर्ट में अगस्त 2024 में दाखिल रिपोर्ट-17 में खुलासा किया था कि ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना 7020 पेड़ काटे गए हैं। इनमें से अकेले आगरा में 3941 पेड़ों का अवैध कटान हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार इन मामलों पर टीटीजेड अथॉरिटी द्वारा जुर्माना तय करने की प्रक्रिया चल रही है। हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जुर्माने से अधिक जरूरी वृक्ष संरक्षण और पुनः वृक्षारोपण की ठोस नीति है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा परिभाषा बदलने और बांस को पेड़ मानने से हरियाली का आंकड़ा कागजों में तो बढ़ा दिख रहा है, लेकिन जमीन पर वास्तविक स्थिति अलग है। उनका मानना है कि जब तक फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा स्वतंत्र रूप से पेड़ों की गिनती नहीं की जाती, तब तक सही स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती।
स्थानीय स्तर पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है कि शहर और आसपास के क्षेत्रों में अवैध पेड़ कटान की घटनाएं लगातार जारी हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन पर गंभीर असर पड़ रहा है। उनका कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में आगरा में हरियाली का संकट और गहरा सकता है।
इस पूरी स्थिति ने एक बार फिर आगरा के पर्यावरण संतुलन, वन संरक्षण और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
