नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के बाद सामने आई एक घटना ने दुनिया में नई बहस छेड़ दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने चीन की ओर से दिए गए कुछ अस्थायी मोबाइल फोन, बैज, पहचान पत्र, पिन और अन्य सामग्री को एयर फ़ोर्स वन में ले जाने के बजाय वहीं अलग कर दिया। पहली नजर में यह केवल एक सुरक्षा कदम लग सकता है, लेकिन यदि इस घटना को गहराई से देखा जाए तो यह केवल गिफ्ट या सामान का मामला नहीं, बल्कि दो महाशक्तियों के बीच तकनीक, सूचना, साइबर सुरक्षा और भरोसे की लड़ाई का प्रतीक बनकर सामने आता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर जो तस्वीर दिखाई देती है, वास्तविक रूप उससे कहीं अधिक गहरा होता है। दुनिया ने चीन यात्रा के दौरान ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति के हाथ मिलाते हुए दृश्य देखे, मुस्कुराहटें देखीं, लेकिन पर्दे के पीछे एक दूसरी कहानी चल रही थी। ऐसी कहानी जिसमें भरोसे की जगह संदेह, कूटनीति की जगह सुरक्षा चिंताएं और सहयोग की जगह निगरानी का डर मौजूद था।
यह पहली बार नहीं है कि अमेरिका ने चीन को लेकर इस प्रकार की सतर्कता दिखाई हो। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के भीतर वर्षों से यह सोच मौजूद रही है कि चीन जैसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी देशों की यात्रा के दौरान उपयोग किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, नेटवर्क या यहां तक कि सामान्य वस्तुएं भी सुरक्षा जोखिम बन सकती हैं। इसी कारण अमेरिकी अधिकारी अक्सर क्लीन डिवाइस या बर्नर फोन का उपयोग करते हैं, जिनमें व्यक्तिगत डेटा नहीं होता और यात्रा समाप्त होने पर उन्हें नष्ट या अलग कर दिया जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि केवल फोन ही क्यों नहीं, बैज और अन्य सामान तक क्यों हटाया गया?
इसका जवाब केवल तकनीक में नहीं बल्कि राजनीति में छिपा है। आधुनिक दौर की जासूसी अब केवल फिल्मों की तरह दीवारों में छिपे कैमरों तक सीमित नहीं है। आज डेटा, लोकेशन, माइक्रोचिप, वायरलेस सिग्नल और डिजिटल पहचान भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा माने जाते हैं। अमेरिकी सुरक्षा तंत्र लंबे समय से यह मानता रहा है कि संवेदनशील यात्राओं के दौरान किसी भी बाहरी स्रोत से मिले उपकरण या डिजिटल सामग्री से सावधानी बरतनी चाहिए।
लेकिन यह विवाद केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे इंटरनेट की दो अलग-अलग विचारधाराएं भी हैं।
अमेरिका इंटरनेट को बड़े स्तर पर खुली व्यवस्था के रूप में देखता है। वहां निजी कंपनियां तकनीकी ढांचे की प्रमुख चालक हैं। Google, YouTube, Facebook, Instagram और अन्य वैश्विक प्लेटफॉर्म बड़ी भूमिका निभाते हैं। अमेरिका का मॉडल बाजार आधारित और अपेक्षाकृत खुला माना जाता है, जहां सूचना का प्रवाह अधिक स्वतंत्र है।
इसके विपरीत चीन ने इंटरनेट का अपना अलग मॉडल विकसित किया। इसे दुनिया में अक्सर “ग्रेट फ़ायरवॉल” के नाम से जाना जाता है। चीन में कई विदेशी प्लेटफॉर्म सीमित हैं या उपलब्ध नहीं हैं। Google, YouTube और Facebook जैसी सेवाओं की जगह चीन ने अपने घरेलू प्लेटफॉर्म विकसित किए। वहां Baidu सर्च इंजन, WeChat संचार और भुगतान का बड़ा माध्यम तथा Weibo सामाजिक मंच की भूमिका निभाता है।
यदि दोनों देशों के मॉडल को तुलना के रूप में देखा जाए तो अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है:
अमेरिका का इंटरनेट मॉडल:
• खुला वैश्विक नेटवर्क
• निजी कंपनियों का प्रभाव
• वैश्विक प्लेटफॉर्म आधारित व्यवस्था
• डेटा प्रवाह अपेक्षाकृत मुक्त
चीन का इंटरनेट मॉडल:
• नियंत्रित और फ़िल्टर किया गया नेटवर्क
• स्थानीय प्लेटफॉर्म आधारित ढांचा
• सरकार की बड़ी भूमिका
• सामग्री और डेटा पर अधिक नियंत्रण
यहां एक बड़ा प्रश्न उठता है यदि अमेरिका चीन पर अविश्वास करता है, तो क्या चीन भी अमेरिका पर विश्वास करता है?
दोनों देशों के बीच वर्षों से व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, चिप निर्माण विवाद, एअाई की प्रतिस्पर्धा, ताइवान का मुद्दा और साइबर सुरक्षा के आरोप चलते रहे हैं। अमेरिका ने कई चीनी कंपनियों पर निगरानी संबंधी आरोप लगाए, वहीं चीन ने भी अमेरिकी डिजिटल प्रभाव को लेकर अपने ढांचे को मजबूत किया।
यही वजह है कि ट्रंप टीम द्वारा चीन से मिले सामान को अलग करने की घटना को केवल गिफ्ट फेंकना कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। यह प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मुस्कुराहटें भले दिखाई दें, लेकिन भरोसे की दूरी अब भी बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात ये है कि 21वीं सदी में युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जा रहे। अब लड़ाई डेटा की है, सूचना की है, तकनीक की है और सबसे बढ़कर भरोसे की है। दुनिया भले इंटरनेट से जुड़ गई हो, लेकिन इंटरनेट ने देशों के बीच नई अदृश्य सीमाएं भी खड़ी कर दी हैं। अमेरिका और चीन की यह कहानी शायद उसी डिजिटल दीवार का सबसे बड़ा उदाहरण है।
