अब सड़क पर लापरवाही पड़ेगी भारी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हर सफर होगा ज्यादा सुरक्षित
सड़क हादसों पर अब टेक्नोलॉजी का पहरा, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दिए ऐतिहासिक निर्देश
बसों में ट्रैकिंग, वाहनों में स्पीड कंट्रोल और AI निगरानी, सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सार
देश में हर साल सड़क हादसों में हो रही लाखों मौतों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा को लेकर ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने सार्वजनिक वाहनों में ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन अनिवार्य करने, परिवहन वाहनों में स्पीड गवर्नर लगाने, राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन में देरी पर जवाब तलब करने और लेन अनुशासन लागू करने के लिए AI आधारित निगरानी व्यवस्था लागू करने जैसे कई बड़े निर्देश जारी किए हैं।

आगरा। भारत में सड़क दुर्घटनाएं लगातार भयावह रूप ले रही हैं। हर वर्ष करीब 1.80 लाख लोग सड़क हादसों में जान गंवा रहे हैं। यानी देश में हर तीन मिनट में एक मौत सड़क दुर्घटना के कारण हो रही है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए 13 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने सड़क सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। एक घंटे से अधिक चली सुनवाई में अधिवक्ता और सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने स्वयं उपस्थित होकर बहस की, जबकि न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने भी पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान सार्वजनिक सेवा वाहनों में वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस यानी VLTD और पैनिक बटन की अनिवार्यता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 के नियम 125H के तहत यह व्यवस्था पहले से अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि 99 प्रतिशत से अधिक सार्वजनिक वाहन बिना ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन के सड़कों पर चल रहे हैं। कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि नए और पुराने दोनों प्रकार के सार्वजनिक वाहनों में समयबद्ध तरीके से VLTD और पैनिक बटन लगाए जाएं।
कोर्ट ने कहा कि फिटनेस प्रमाण पत्र और परमिट तभी जारी किए जाएं, जब VAHAN पोर्टल पर ट्रैकिंग डिवाइस की स्थापना और उसकी कार्यशीलता का सत्यापन हो जाए। न्यायालय ने 31 दिसंबर 2018 तक पंजीकृत पुराने वाहनों में भी रेट्रोफिटिंग के जरिए ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन लगाने के आदेश दिए हैं। साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वाहन निर्माता कंपनियों को निर्माण स्तर पर ही VLTD लगाने के लिए बाध्यकारी आदेश जारी किए जाएं।
सुनवाई में स्पीड गवर्नर यानी स्पीड लिमिटिंग डिवाइस का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। नियमों के अनुसार 1 अक्टूबर 2015 के बाद बने सभी परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस लगाना अनिवार्य है। अधिकांश वाहनों के लिए अधिकतम गति 80 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है, जबकि डंपर, टैंकर, स्कूल बस और खतरनाक सामान ढोने वाले वाहनों के लिए 60 किलोमीटर प्रति घंटा की सीमा निर्धारित है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 2.18 करोड़ परिवहन वाहनों में से केवल 10.70 लाख वाहनों में ही स्पीड लिमिटिंग डिवाइस लगी है। यानी 95 प्रतिशत से अधिक वाहन बिना स्पीड कंट्रोल के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों को फिटनेस प्रमाण पत्र देने से इनकार किया जा सकता है और उनका पंजीकरण निलंबित किया जा सकता है।
न्यायालय ने ANPR कैमरों और FASTag डेटा के जरिए तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक तकनीक के जरिए सड़क सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना जरूरी है।
सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन में छह वर्षों की देरी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 215B के तहत गठित होने वाला यह बोर्ड अभी तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाया है। बोर्ड में न अध्यक्ष नियुक्त हुआ है और न सदस्य। यहां तक कि बोर्ड का कार्यालय और वेबसाइट भी पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है। कोर्ट ने इसे गंभीर चूक मानते हुए केंद्र सरकार को अंतिम अवसर के रूप में तीन महीने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजहों में से एक लेन अनुशासन की कमी को भी माना। कोर्ट ने कहा कि देश में अधिकांश वाहन चालक लेन नियमों का पालन नहीं करते, जिसके कारण आमने-सामने की टक्कर और ओवरटेकिंग के दौरान बड़े हादसे होते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में लेन अनुशासन को लेकर पर्याप्त प्रशिक्षण और जागरूकता का अभाव है।
अधिवक्ता के.सी. जैन ने कोर्ट के सामने सुझाव रखा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 136A और नियम 167A के तहत AI आधारित कैमरों का उपयोग किया जाए। ऐसे कैमरे स्वतः लेन उल्लंघन की पहचान कर वाहन नंबर दर्ज कर सकते हैं और तुरंत चालान जारी कर सकते हैं। FASTag और VAHAN डेटाबेस से इनके एकीकरण से पूरी तरह स्वचालित निगरानी प्रणाली विकसित की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल दंड से समस्या का समाधान नहीं होगा। सड़क सुरक्षा को लेकर बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना भी उतना ही जरूरी है। खासतौर पर ट्रक, बस और भारी वाहन चालकों को लेन अनुशासन और ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करना समय की मांग है। सड़क पर छोटी-सी सावधानी हजारों लोगों की जान बचा सकती है।
