आगरा। विश्व प्रसिद्ध ताजमहल क्षेत्र ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (टीटीजेएड) के अंतर्गत आने वाले सूर सरोवर पक्षी विहार (कीठम झील) और उसके आसपास के वन क्षेत्र में तेजी से फैल रही विदेशी आक्रामक प्रजाति प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा (विलायती बबूल) को हटाने की मांग अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। यह मामला केवल एक वनस्पति विवाद नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, जल संरक्षण और पक्षी आवास संरक्षण से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गया है।
याचिकाकर्ता डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में कहा है उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वयं अपने ही आधिकारिक दस्तावेजों में इस प्रजाति को जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा माना है, इसके बावजूद इसे हटाने और स्थानीय प्रजातियों के पुनर्स्थापन के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। उनका कहना है कि यह सरकारी निष्क्रियता न केवल पर्यावरणीय असंतुलन को बढ़ा रही है, बल्कि संविधान के तहत नागरिकों को मिले स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण के अधिकार का भी उल्लंघन है।

पक्षियों और पूरे इकोसिस्टम पर गंभीर असर
सूर सरोवर पक्षी विहार, जो प्रवासी और स्थानीय पक्षियों का एक प्रमुख आवास है, वहां विलायती बबूल का अनियंत्रित विस्तार पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ रहा है। याचिका में बताया गया है कि यह पौधा अपनी गहरी जड़ों के माध्यम से भूजल का अत्यधिक दोहन करता है, जिससे क्षेत्र में जल स्तर लगातार गिर रहा है। साथ ही इसकी ‘एलीलोपैथिक’ प्रकृति अन्य पौधों के बीजों के अंकुरण को रोक देती है, जिससे स्थानीय वनस्पतियाँ समाप्त होती जा रही हैं।
इसके परिणामस्वरूप पक्षियों के लिए प्राकृतिक भोजन, घोंसला बनाने की जगह और सुरक्षित आवास लगातार कम होता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में सूर सरोवर क्षेत्र की जैव विविधता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है और यह पक्षी विहार अपनी मूल पहचान खो सकता है।
सरकारी नीतियों पर उठे सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार यह तर्क देती रही है कि ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) में किसी भी प्रकार की पेड़ों की कटाई के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति आवश्यक है, लेकिन इसी अनुमति के लिए सरकार ने कभी पहल ही नहीं की। याचिकाकर्ता ने इसे एक बहाना बताते हुए कहा कि वर्ष 2023 में मथुरा के ब्रज क्षेत्र में इसी प्रजाति को हटाने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति ली थी और वहां कार्य भी किया गया था, लेकिन आगरा में समान परिस्थितियों के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया।

इस असमानता को याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सरकार के अपने “साइट मैनेजमेंट प्लान (2020–2030)” और “वर्किंग प्लान (2024–2034)” में स्पष्ट रूप से विलायती बबूल को हटाकर देशी प्रजातियों के रोपण की सिफारिश की गई है, फिर भी इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया गया।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि हर नागरिक को स्वच्छ, स्वस्थ और संतुलित पर्यावरण का अधिकार है। इसके साथ ही ‘प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल’ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यदि किसी गतिविधि से पर्यावरण को गंभीर नुकसान का खतरा हो, तो कार्रवाई में देरी उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि राज्य सरकार पर्यावरण और वनों की “ट्रस्टी” है और उसकी जिम्मेदारी है कि वह प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करे। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि आक्रामक विदेशी प्रजातियों को हटाना किसी भी प्रकार से वन भूमि का विचलन नहीं बल्कि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (ecological restoration) है, जिसे कानून भी प्रोत्साहित करता है।
पर्यावरणीय भविष्य पर बड़ा सवाल
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए कि विलायती बबूल को चरणबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से हटाकर उसकी जगह देशी और पारिस्थितिक रूप से उपयुक्त प्रजातियों का रोपण किया जाए। साथ ही इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना बनाई जाए और उसकी नियमित प्रगति रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
यह मामला केवल एक वन क्षेत्र या पक्षी विहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा तय कर सकता है। सूर सरोवर जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र में यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर न केवल पक्षियों पर बल्कि पूरे क्षेत्र के जल, वन और जैव विविधता पर पड़ सकता है।
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि आगरा के इस महत्वपूर्ण पक्षी आवास को बचाने के लिए सरकार को कितनी गंभीरता से कदम उठाने होंगे।

