➤ हाथी बचाओ दिवस पर पर्यटन में हो रहे शोषण की सच्चाई उजागर
➤ सवारी, फोटो और भीख मंगवाने में हाथियों पर बढ़ता अत्याचार
➤ जिम्मेदार पर्यटन अपनाने और ‘सवारी से इंकार’ की अपील
बुधवार को मनाए जाने वाले हाथी बचाओ दिवस के अवसर पर वाइल्डलाइफ एसओएस (वन्यजीव सहायता संगठन) ने भारत में हाथियों के सामने खड़े गंभीर खतरों को उजागर किया है। संस्था ने बताया कि एक ओर जहां हाथियों के प्राकृतिक आवास लगातार कम हो रहे हैं और मानव-हाथी टकराव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यटन के नाम पर उनका व्यापक शोषण हो रहा है। हाथियों से सवारी कराई जा रही है, फोटोशूट कराए जा रहे हैं और कई जगहों पर उनसे भीख तक मंगवाई जा रही है, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। संस्था ने लोगों से अपील की है कि वे जिम्मेदार पर्यटक बनें और ऐसे शोषणकारी गतिविधियों से दूरी बनाएं।

हाथी बचाओ दिवस हर वर्ष दुनिया भर में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य हाथियों के संरक्षण की आवश्यकता को उजागर करना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हाथियों को उनके प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रखना कितना जरूरी है। भारत में एशियाई हाथियों का पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है, लेकिन इसके बावजूद उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

देश के कई पर्यटन स्थलों, विशेष रूप से राजस्थान और जयपुर जैसे क्षेत्रों में, हाथियों की सवारी को एक आकर्षक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पर्यटक इसे परंपरा और संस्कृति से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसके पीछे की वास्तविकता काफी कठोर होती है। हाथियों को घंटों तक काम कराया जाता है, उन्हें पर्याप्त आराम नहीं मिलता और उन्हें सख्त प्रशिक्षण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इन प्रक्रियाओं में अक्सर डर और दंड का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे हाथियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।

कठोर सतहों पर लंबे समय तक खड़े रहना, अत्यधिक भार ढोना और तेज गर्मी में काम करना हाथियों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करता है। उनके पैरों में घाव हो जाते हैं, जोड़ों में दर्द रहने लगता है और वे लगातार तनाव में रहते हैं। यह स्थिति उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर और मानसिक रूप से अस्थिर बना देती है।

हाल ही में “चंचल” नाम की हथनी की मौत ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। एक फोटो कार्यक्रम के दौरान उसे पूरी तरह रंगा गया और उसकी पीठ पर एक मॉडल को बैठाया गया। इसके बाद उसकी हालत बिगड़ती गई और अंततः उसकी मौत हो गई। इस घटना ने समाज में आक्रोश पैदा किया और पशु कल्याण कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग तेज हो गई।

वाइल्डलाइफ एसओएस ने अपने ‘सवारी से इंकार’ अभियान के माध्यम से लोगों से अपील की है कि वे हाथियों की सवारी जैसे आकर्षणों में हिस्सा न लें। संस्था का कहना है कि हाथियों का शोषण इसी मांग के कारण बढ़ता है। यदि लोग इन गतिविधियों से दूर रहेंगे, तो इस तरह के अत्याचार को कम किया जा सकता है।
संस्था के अनुसार, भारत में आज भी लगभग 300 से अधिक हाथी शोषण का शिकार हैं। कई हाथियों को सड़कों पर भीख मंगवाने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि कुछ को शादी-ब्याह और धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है। यह उनके लिए बेहद कष्टदायक स्थिति होती है।
इस समस्या के समाधान के लिए संस्था द्वारा ‘भीख मंगवाने वाले हाथी अभियान’ चलाया जा रहा है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक इस क्रूर प्रथा को समाप्त करना है। इसके तहत दुर्व्यवहार झेल रहे हाथियों को बचाकर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर रखा जाता है और उनकी दीर्घकालिक देखभाल की जाती है।
इसके अलावा ‘हाथी सेवा’ नामक मोबाइल चिकित्सा सेवा के माध्यम से जरूरतमंद हाथियों को मौके पर ही उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। इस पहल के जरिए अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों हाथियों को चिकित्सा सहायता मिल चुकी है।
संस्था के पदाधिकारियों का कहना है कि हाथी अत्यंत संवेदनशील और समझदार जीव होते हैं। वे केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी भावनाएं और जरूरतें होती हैं। उन्हें सवारी, प्रदर्शन या भीख मंगवाने के लिए इस्तेमाल करना पूरी तरह से गलत और अमानवीय है।
हाथी बचाओ दिवस के अवसर पर लोगों से अपील की गई है कि वे जागरूक बनें, हाथियों के शोषण में भाग न लें और उनके संरक्षण के प्रयासों का समर्थन करें। क्योंकि हाथियों का भविष्य केवल नीतियों और कानूनों पर नहीं, बल्कि समाज की सोच और जिम्मेदार व्यवहार पर भी निर्भर करता है।
