आगरा। आगरा के अछनेरा ब्लॉक के ग्राम साधन निवासी गजेंद्र पाल सिंह की बेटी लविश्का के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) जीवन बदलने वाली पहल साबित हुआ। जन्म के बाद दिल में छेद की जानकारी मिलने के बावजूद आर्थिक परेशानी के कारण परिवार उपचार नहीं करा पा रहा था। आरबीएसके टीम की स्क्रीनिंग के बाद बच्ची को जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के हृदय रोग विभाग में संदर्भित किया गया, जहां आवश्यक जांचें और 30 जुलाई 2026 को दिल की सर्जरी पूरी तरह निशुल्क हुई। जिले में वर्ष 2025-26 में 152 और वर्ष 2026-27 में अब तक 76 बच्चों को गंभीर व जन्मजात रोगों का उपचार मिल चुका है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के उन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है, जिनके सामने गंभीर बीमारी के इलाज का खर्च सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। अछनेरा विकास खंड के ग्राम साधन निवासी गजेंद्र पाल सिंह के परिवार के लिए भी यह योजना उस समय सहारा बनी, जब उनकी बेटी लविश्का के दिल में छेद होने की जानकारी सामने आई। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह निजी स्तर पर महंगा उपचार करा सके। बीमारी की गंभीरता के साथ-साथ सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारी का अभाव भी उपचार के रास्ते में बाधा बना हुआ था।
लविश्का का जन्म 24 नवंबर 2024 को हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद परिवार को पता चला कि बच्ची के हृदय में छेद है। बीमारी सामने आने के बाद परिवार के सामने बेटी के इलाज की चिंता खड़ी हो गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उपचार कराना आसान नहीं था। इसी दौरान क्षेत्रीय आशा कार्यकर्ता और नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र के माध्यम से परिवार को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में जानकारी मिली। योजना की जानकारी मिलने के बाद बच्ची के उपचार की उम्मीद जगी और उसे स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रिया से जोड़ा गया।
अछनेरा विकास खंड की आरबीएसके टीम-बी ने लविश्का का स्वास्थ्य परीक्षण किया। टीम में डॉ. लता मिश्रा, डॉ. दीप्ति बरूण, संतोष कुमार, ऑप्टोमेट्रिस्ट और अनीता कौशिक, एएनएम शामिल थीं। परीक्षण के दौरान बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन किया गया और उसके परिजनों को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी दी गई। परिवार को बताया गया कि कार्यक्रम के माध्यम से पात्र बच्चों को निर्धारित स्वास्थ्य स्थितियों में जांच, संदर्भन और उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
बच्ची के मामले को आगे उपचार के लिए जनपद स्तर पर भेजा गया। डीईआईसी मैनेजर रमाकान्त शर्मा के सहयोग से लविश्का को जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के हृदय रोग विभाग में संदर्भित किया गया। वहां बच्ची की आवश्यक चिकित्सकीय जांचें कराई गईं। इन जांचों के लिए परिवार को किसी प्रकार का खर्च नहीं उठाना पड़ा। विशेषज्ञ चिकित्सकों ने जांच के बाद बच्ची के उपचार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई और अंततः 30 जुलाई 2026 को उसकी सफलतापूर्वक सर्जरी की गई।
लविश्का की सर्जरी भी निशुल्क की गई। उसके उपचार में आने वाला पूरा खर्च सरकार की ओर से वहन किया गया। इससे परिवार पर इलाज का कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ा। जिस बीमारी के उपचार की लागत आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए बड़ी चिंता बन सकती थी, उसका इलाज सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से संभव हुआ। सर्जरी के बाद परिवार ने राहत की सांस ली और बच्ची के बेहतर भविष्य की उम्मीद मजबूत हुई।
लविश्का के पिता गजेंद्र पाल सिंह और परिवार के अन्य सदस्यों ने आरबीएसके टीम तथा स्वास्थ्य विभाग का आभार जताया। परिवार के अनुसार, समय पर बीमारी की पहचान होने और निशुल्क उपचार मिलने से उनकी बेटी को नया जीवन मिला। परिवार के लिए यह अनुभव इस बात का उदाहरण बना कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचने पर गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को समय रहते उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत संचालित महत्वपूर्ण योजना है। इसका उद्देश्य जन्म से लेकर 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शुरुआती पहचान करना और पात्र बच्चों को निशुल्क उपचार उपलब्ध कराना है। कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों में चार प्रमुख श्रेणियों के तहत आने वाली स्वास्थ्य स्थितियों की जांच की जाती है। इनमें जन्मजात दोष, कमियां, बीमारियां तथा शारीरिक विकास में देरी और विकलांगता से संबंधित स्थितियां शामिल हैं। इन श्रेणियों के अंतर्गत कुल 47 स्वास्थ्य स्थितियों और बीमारियों की स्क्रीनिंग का प्रावधान है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव के अनुसार, आरबीएसके के तहत पात्र बच्चों के संपूर्ण उपचार और दवाइयों का खर्च सरकार की ओर से उठाया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि आर्थिक स्थिति किसी बच्चे के उपचार में बाधा न बने और जन्म से लेकर 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान शुरुआती स्तर पर हो सके। बीमारी का समय पर पता चलने से उपचार की प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जा सकती है और जटिलताओं को कम करने में मदद मिलती है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से ब्लॉक स्तर पर आरबीएसके की समर्पित टीमें गठित की गई हैं। इन टीमों में आयुष डॉक्टर, एएनएम और फार्मासिस्ट सहित संबंधित स्वास्थ्यकर्मी शामिल होते हैं। ये टीमें समय-समय पर स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों का दौरा करती हैं। वहां बच्चों की स्वास्थ्य स्क्रीनिंग की जाती है। जांच के दौरान यदि किसी बच्चे में कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाली बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या की पहचान होती है तो उसे आगे की जांच और उपचार के लिए संबंधित स्वास्थ्य संस्थान में संदर्भित किया जाता है।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की प्रक्रिया केवल सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण तक सीमित नहीं है। स्क्रीनिंग के दौरान पहचाने गए बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार उच्च स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की जाती है। इससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाओं तक पहुंच बनाने में सहायता मिलती है। लविश्का का मामला भी इसी प्रक्रिया का उदाहरण है, जहां ब्लॉक स्तर पर हुई पहचान के बाद उसे जनपद स्तर के सहयोग से विशेषज्ञ उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया।
आरबीएसके नोडल अधिकारी डॉ. सुरेंद्र मोहन प्रजापति के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग की टीमें नियमित रूप से स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की स्क्रीनिंग करती हैं। स्क्रीनिंग के दौरान कार्यक्रम में शामिल बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों की पहचान होने पर बच्चों को उपचार के लिए संदर्भित किया जाता है। इस व्यवस्था के जरिए ऐसे बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, जिनके परिवार बीमारी की पहचान, उपचार की प्रक्रिया या सरकारी सुविधाओं से पूरी तरह परिचित नहीं होते।
आगरा जनपद में भी इस कार्यक्रम के माध्यम से गंभीर और जन्मजात रोगों से जूझ रहे बच्चों को उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत जन्मजात और गंभीर रोगों से पीड़ित 152 बच्चों को उपचार मिल चुका है। वहीं वर्ष 2026-27 में अब तक 76 बच्चों का उपचार कराया जा चुका है। दोनों वर्षों के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो दो वर्षों में 228 बच्चों को इस कार्यक्रम के माध्यम से उपचार मिल चुका है।
लविश्का की कहानी इस व्यवस्था के उस मानवीय पक्ष को सामने लाती है, जिसमें बीमारी की पहचान से लेकर विशेषज्ञ उपचार तक अलग-अलग स्तरों पर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका जुड़ी होती है। जन्मजात हृदय रोग जैसी गंभीर स्थिति से जूझ रही बच्ची के लिए समय पर जांच और उपचार उपलब्ध होना परिवार के लिए बड़ी राहत बनी। वहीं, सरकारी स्तर पर उपचार का खर्च उठाए जाने से आर्थिक कमजोरी इलाज में बाधा नहीं बनी।
आरबीएसके का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज कराना नहीं, बल्कि बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं की समय रहते पहचान कर उन्हें उचित चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाना भी है। स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में होने वाली स्क्रीनिंग इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। इससे कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं, जिनका समय पर उपचार होने पर बच्चों के सामान्य विकास और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
लविश्का के परिवार के लिए 30 जुलाई 2026 का दिन इसी वजह से खास बन गया। जिस बच्ची की बीमारी ने परिवार को चिंता में डाल दिया था, उसकी सफल सर्जरी के बाद उपचार की बड़ी बाधा दूर हुई। आरबीएसके के माध्यम से मिली यह सुविधा परिवार के लिए आर्थिक राहत के साथ-साथ बेटी के स्वस्थ भविष्य की उम्मीद लेकर आई। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि लविश्का अकेली ऐसी बच्ची नहीं है, बल्कि जिले में पिछले दो वर्षों के दौरान 228 बच्चों को इस कार्यक्रम के तहत उपचार मिल चुका है। इस तरह आरबीएसके बच्चों की गंभीर और जन्मजात स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान से लेकर निशुल्क उपचार तक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम कर रहा है।
