आगरा। सेठ पदम चंद जैन प्रबंधन संस्थान में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर जागरूकता एवं स्मृति कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों को वर्ष 1947 के विभाजन की ऐतिहासिक परिस्थितियों, उससे जुड़ी मानवीय त्रासदी, विस्थापन, संघर्ष और परिवारों के बिछड़ने की पीड़ा से परिचित कराया गया। विद्यार्थियों को विभाजन की पृष्ठभूमि और उसकी विभीषिका पर आधारित डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई। वक्ताओं ने कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल अतीत के दुख को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेकर बेहतर भविष्य के निर्माण का संकल्प लेने का दिन है। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों और उपस्थित सदस्यों ने एकता, सामाजिक सद्भाव, आपसी सम्मान और राष्ट्र की अखंडता बनाए रखने का संकल्प लिया।

सेठ पदम चंद जैन प्रबंधन संस्थान में आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को वर्ष 1947 में हुए देश के विभाजन से जुड़ी ऐतिहासिक परिस्थितियों और उसके परिणामस्वरूप सामने आई मानवीय त्रासदी को समझाना रहा। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को बताया गया कि विभाजन ने केवल देश की भौगोलिक सीमाओं को नहीं बदला, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर, संपत्ति, परिचित परिवेश और सामाजिक संबंधों को छोड़कर अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में विस्थापन, पीड़ा, संघर्ष और परिवारों के बिछड़ने की अनेक घटनाएं सामने आईं, जिनकी स्मृतियां आज भी कई परिवारों की पीढ़ियों में जीवित हैं।

कार्यक्रम में विभाजन की पृष्ठभूमि और उसकी विभीषिका पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री विद्यार्थियों को दिखाई गई। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से विद्यार्थियों ने उस दौर के विस्थापन और आम लोगों की पीड़ा को समझने का प्रयास किया। इसमें अपने घर-परिवार से बिछड़ने वाले लोगों की परिस्थितियों, संघर्ष और अनिश्चितता को सामने रखा गया। डॉक्यूमेंट्री ने विद्यार्थियों को इतिहास के उस दौर से भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ यह समझने का अवसर दिया कि राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं का सबसे गहरा प्रभाव आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों सोनाक्षी, तिया एवं अर्चित गुप्ता ने भी अपने विचार और वक्तव्य प्रस्तुत किए। उन्होंने विभाजन के दौरान आम लोगों द्वारा झेली गई कठिनाइयों तथा वर्तमान पीढ़ी के लिए इससे मिलने वाली सीख पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों ने कहा कि इतिहास को केवल एक घटना के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मानवीय पक्ष को समझना भी जरूरी है। विभाजन की पीड़ा से यह सीख मिलती है कि समाज में संवाद, आपसी विश्वास और भाईचारे को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है।
कार्यक्रम का समन्वय डॉ. श्वेता गुप्ता ने किया। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल अतीत के दुख को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि इतिहास से सीख लेकर बेहतर भविष्य के निर्माण का संकल्प लेने का दिन है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 का विभाजन आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय विस्थापनों में से एक था। लाखों परिवारों को अपना घर, संपत्ति और परिचित परिवेश छोड़कर अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन की पीड़ा केवल उस समय तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसकी स्मृतियां कई पीढ़ियों तक लोगों के जीवन का हिस्सा बनी रहीं।
डॉ. श्वेता गुप्ता ने अपनी भावनाएं कुछ पंक्तियों के माध्यम से भी साझा कीं—“घर छूटा, गाँव छूटा, छूटी अपनी पहचान, सीमा की एक रेखा ने, बदल दिया इंसान। यादें फिर भी साथ रहीं, रिश्ते दिल में जीवित रहे, वक्त बहुत कुछ ले गया, पर हौसले जीवित रहे।” इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने विभाजन की पीड़ा और उस दौर के लोगों के संघर्ष को सामने रखा। उन्होंने कहा कि इतिहास की त्रासदियों को याद करने का उद्देश्य केवल दुख को दोहराना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाना होना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों को सामाजिक जीवन में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का संदेश देते हुए कहा, “सूचना को साझा करने से पहले सत्यापित करें, असहमति को नफरत में बदलने से पहले संवाद करें, और किसी व्यक्ति की पहचान देखने से पहले उसमें इंसान को देखें।” उन्होंने कहा कि आज के दौर में सूचना का प्रसार बहुत तेजी से होता है। ऐसे में अफवाहों और गलत सूचनाओं से बचना तथा किसी भी मतभेद को नफरत में बदलने के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाने की कोशिश करना जरूरी है।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मानव जीवन के महत्व को समझने का अवसर है। वक्ताओं ने कहा कि मानव जीवन सबसे महत्वपूर्ण है और नफरत तथा अविश्वास की कीमत बहुत भारी हो सकती है। विविधता के बीच संवाद और आपसी सम्मान ही समाज की वास्तविक शक्ति है। इसलिए यह दिवस केवल दुख को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अतीत से सीख लेकर बेहतर भविष्य बनाने का संकल्प लेने का अवसर भी है।
डॉ. श्वेता गुप्ता ने कहा कि विभाजन की पीड़ा झेलने वाले सभी लोगों को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए उनकी स्मृति से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसा भारत बनाने में योगदान देने का आह्वान किया, जहां आपसी भाईचारा, सद्भाव और एकता बनी रहे। उन्होंने कहा कि देश की विविधता उसकी ताकत है और इस विविधता के बीच एक-दूसरे के प्रति सम्मान तथा संवाद की भावना को मजबूत करना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों और उपस्थित सदस्यों को सामाजिक सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता का महत्व समझाया गया। कार्यक्रम के अंत में सभी विद्यार्थियों एवं उपस्थित सदस्यों ने एकता, सामाजिक सद्भाव, आपसी सम्मान और राष्ट्र की अखंडता बनाए रखने का संकल्प लिया। उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि वे नफरत के बजाय संवाद को चुनेंगे, अफवाह के बजाय सत्य को प्राथमिकता देंगे, भेदभाव के बजाय समानता का रास्ता अपनाएंगे, हिंसा के बजाय शांति को चुनेंगे और देश की विविधता को अपनी शक्ति बनाएंगे। इन संकल्पों के माध्यम से कार्यक्रम को केवल स्मृति दिवस तक सीमित न रखते हुए वर्तमान सामाजिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम में डॉ. श्वेता चौधरी ने विद्यार्थियों को वर्ष 1947 के विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विभाजन केवल देश की भौगोलिक सीमाओं में परिवर्तन की घटना नहीं था, बल्कि इसके पीछे जटिल राजनीतिक परिस्थितियां और निर्णयों की एक लंबी प्रक्रिया थी। उन्होंने विद्यार्थियों को उस समय की परिस्थितियों को समझाते हुए बताया कि विभाजन के निर्णय ने भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए राजनीतिक क्षेत्रों के निर्माण का रास्ता तैयार किया और इसके साथ ही व्यापक स्तर पर प्रशासनिक एवं सामाजिक बदलाव हुए।
डॉ. श्वेता चौधरी ने विशेष रूप से सर सिरिल रेडक्लिफ द्वारा सीमा रेखा निर्धारित किए जाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 1947 में गठित सीमा आयोगों के माध्यम से पंजाब और बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के विभाजन तथा नई सीमा निर्धारित करने का कार्य किया गया। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि बहुत कम समय में मानचित्रों, प्रशासनिक क्षेत्रों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर सीमा निर्धारण का अत्यंत कठिन कार्य किया गया। इस प्रक्रिया का प्रभाव उन क्षेत्रों के लोगों पर भी पड़ा, जहां अचानक नई सीमाएं अस्तित्व में आईं और बड़ी संख्या में लोगों को अपने स्थान बदलने पड़े।
उन्होंने कहा कि विभाजन को समझने के लिए केवल राजनीतिक घटनाक्रम को जानना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ जुड़े सामाजिक और मानवीय पक्ष को समझना भी जरूरी है। विभाजन के दौरान लोगों के विस्थापन, परिवारों के बिछड़ने और लंबे समय तक चली पीड़ा ने समाज और आने वाली पीढ़ियों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विद्यार्थियों को इतिहास के इन पहलुओं से परिचित कराने का उद्देश्य उन्हें संवेदनशील नागरिक बनाना और उन्हें यह समझाना है कि समाज में शांति, सद्भाव और संवाद को बनाए रखना कितना आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने भी पूरे उत्साह के साथ सहभागिता की। डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद उन्होंने विभाजन से जुड़े ऐतिहासिक एवं मानवीय पक्षों को समझा और वक्ताओं के विचार सुने। कार्यक्रम में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि इतिहास की त्रासद घटनाओं को याद करने का उद्देश्य समाज में भय या विभाजन की भावना पैदा करना नहीं, बल्कि उनसे सीख लेकर भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए आपसी विश्वास, भाईचारे और संवाद को मजबूत करना है।
कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक प्रो. बृजेश रावत सहित डॉ. स्वाति माथुर, डॉ. रुचिरा प्रसाद, डॉ. वाई. के. शर्मा एवं सुश्री लकी आर्या की उपस्थिति रही। संस्थान के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के संदेश को समझा। आयोजन के माध्यम से विद्यार्थियों को इतिहास की महत्वपूर्ण घटना के मानवीय पक्ष से परिचित कराने के साथ उन्हें वर्तमान समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराया गया।
समारोह का समापन एकता, सद्भाव, शांति और राष्ट्र की अखंडता के संकल्प के साथ हुआ। विद्यार्थियों ने यह संदेश दिया कि अतीत की पीड़ा को याद करते हुए वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। विभाजन की स्मृतियों से सीख लेकर समाज में भाईचारा मजबूत करने, अफवाहों से बचने, सत्य को प्राथमिकता देने, भेदभाव से दूर रहने और विविधता का सम्मान करने का संकल्प ही कार्यक्रम का प्रमुख संदेश रहा।
