साढ़े नौ बजे मथुरा से आगरा आ रही बस हुई हादसे का शिकार
घायलों को एसएन मेडिकल भेजा गया
आगरा। आगरा-मथुरा नेशनल हाईवे पर बुधवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (यूपी रोडवेज) की मथुरा डिपो की बस (UP 85 AT 4281) अचानक अनियंत्रित होकर डिवाइडर पर चढ़ गई और पलट गई। बताया जा रहा है कि सुबह करीब 9:30 बजे मथुरा से आगरा की ओर आ रही बस का पहले स्टीयरिंग फेल हुआ और उसी दौरान आगे के दोनों पहिए निकल गए, जिससे चालक बस पर नियंत्रण नहीं रख सका। कुछ ही सेकंड में बस डिवाइडर से टकराकर पलट गई। हादसे के बाद बस में सवार यात्रियों में चीख-पुकार मच गई।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हादसा इतना अचानक हुआ कि बस में बैठे यात्रियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। कई यात्री सीटों से उछलकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। बस पलटने के बाद अंदर फंसे यात्रियों की चीखें सुनकर हाईवे से गुजर रहे राहगीर और आसपास के लोग मौके पर दौड़ पड़े। लोगों ने बस के शीशे तोड़कर और दरवाजों के जरिए अंदर फंसे यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया। काफी देर तक स्थानीय लोग अपने स्तर पर राहत कार्य में जुटे रहे।
हादसे की सूचना मिलते ही थाना सिकंदरा पुलिस और एंबुलेंस मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने स्थानीय लोगों की मदद से सभी घायलों को बाहर निकलवाया और तत्काल एंबुलेंस से उपचार के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज भेजा। कुछ देर तक हाईवे पर यातायात भी प्रभावित रहा। बाद में पुलिस ने क्रेन बुलाकर क्षतिग्रस्त बस को सड़क से हटवाया, जिसके बाद यातायात सामान्य हो सका।
सेवा प्रबंधक तुलाराम ने बताया कि हादसे में घायल यात्रियों को अस्पताल भेजा गया है। इनमें से एक घायल प्राथमिक उपचार के बाद अपने घर चला गया, जबकि एक अन्य घायल का उपचार अस्पताल में जारी है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच कराई जाएगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी नौबत आखिर आई कैसे?
13 बिंदुओं की जांच का दावा, फिर भी सड़क पर कैसे दौड़ गई खामी वाली बस?
यूपी रोडवेज के नियमों के अनुसार किसी भी बस को वर्कशॉप से रूट पर भेजने से पहले 13 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर तकनीकी जांच अनिवार्य होती है। इनमें ब्रेक, टायर, स्टीयरिंग, क्लच, सस्पेंशन, वाइपर, लाइट, इंडिकेटर और अन्य सुरक्षा संबंधी उपकरणों की जांच शामिल रहती है। दावा किया जाता है कि इन सभी मानकों पर बस पूरी तरह फिट पाए जाने के बाद ही उसे यात्रियों के साथ सड़क पर उतारा जाता है।
लेकिन सिकंदरा में हुआ यह हादसा इन दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। यदि बस का स्टीयरिंग फेल हुआ और चलते समय आगे के दोनों पहिए निकल गए, तो क्या वर्कशॉप में इन महत्वपूर्ण हिस्सों की जांच वास्तव में की गई थी? यदि जांच हुई थी तो इतनी बड़ी तकनीकी खामी पकड़ में क्यों नहीं आई? और यदि जांच नहीं हुई तो फिर यात्रियों की जान जोखिम में डालने की जिम्मेदारी किसकी है?
सूत्रों की मानें तो कई बार बसों को केवल औपचारिकता पूरी कर रूट पर भेज दिया जाता है। चालक और परिचालक ड्यूटी स्लिप लेकर बस लेकर निकल जाते हैं, जबकि तकनीकी परीक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
हर बड़े हादसे के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, जिम्मेदारी तय करने की बातें होती हैं, लेकिन कुछ दिन बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसी लीपापोती चलती रहेगी? क्या हर बार किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाएगा? क्या तब कार्रवाई होगी, जब किसी बस में दर्जनों यात्रियों की जान चली जाएगी?
इस हादसे में राहत की बात केवल इतनी रही कि कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई। यदि बस तेज रफ्तार में होती या पीछे से कोई भारी वाहन आ जाता, तो तस्वीर कहीं अधिक भयावह हो सकती थी। इसे महज संयोग कहा जाए या यात्रियों की किस्मत, लेकिन यह हादसा निश्चित रूप से रोडवेज की तकनीकी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल परिवहन निगम के जिम्मेदार अधिकारियों के सामने है। क्या इस बस की फिटनेस रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? क्या यह बताया जाएगा कि बस को अंतिम बार कब और किसने फिट घोषित किया था? क्या तकनीकी जांच करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? या फिर यह मामला भी अन्य हादसों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
यात्रियों की सुरक्षा केवल नियम पुस्तिका में लिख देने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उन नियमों का ईमानदारी से पालन करने से होती है। यदि 13 बिंदुओं की जांच केवल खानापूर्ति बनकर रह गई है तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। अब जरूरत केवल जांच की नहीं, बल्कि दोषियों पर ऐसी सख्त कार्रवाई की है जो पूरे परिवहन विभाग के लिए नजीर बने और भविष्य में किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को यात्रियों की जान से खिलवाड़ करने की हिम्मत न हो। आखिर सड़क पर सफर करने वाला हर यात्री सुरक्षित घर पहुंचे, इसकी जिम्मेदारी किसकी है। इस सवाल का जवाब अब परिवहन विभाग को देना होगा।

