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Supreme Court hearing on 12 May 2026 regarding road safety rules, mandatory speed limiter, GPS tracker and panic button in public transport vehicles in Indiaसुप्रीम कोर्ट में सड़क सुरक्षा पर अहम सुनवाई होगी।
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आगरा: देश में सड़क सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने, सार्वजनिक परिवहन वाहनों में अनिवार्य सुरक्षा उपकरणों के प्रभावी क्रियान्वयन और राष्ट्रीय स्तर पर सड़क सुरक्षा नीति को लागू कराने से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले पर 12 मई को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है।

यह मामला केवल तकनीकी उपकरणों की अनिवार्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों आम यात्रियों की रोजमर्रा की सुरक्षा, जीवन रक्षा और परिवहन व्यवस्था की जवाबदेही से सीधे जुड़ा हुआ है। स्पीड लिमिटर (स्पीड गवर्नर), जीपीएस ट्रैकर, पैनिक बटन और राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन जैसे गंभीर मुद्दों पर यह सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ द्वारा की जाएगी।

यह पूरा मामला सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन द्वारा दाखिल तीन जनहित याचिकाओं से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल को इस मामले में सुनवाई की तारीख निर्धारित करते हुए 12 मई 2026 को विस्तृत सुनवाई तय की थी।

यह प्रकरण देश की उस मौजूदा स्थिति को उजागर करता है, जिसमें करोड़ों यात्री रोजाना बसों, टैक्सियों और अन्य सार्वजनिक वाहनों में यात्रा करते हैं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर कई बार केवल औपचारिकताएं ही दिखाई देती हैं। तेज रफ्तार से दौड़ते वाहन, थके हुए चालक, तकनीकी निगरानी की कमी और आपात स्थिति में त्वरित सहायता की अनुपलब्धता इस पूरी व्यवस्था को लगातार सवालों के घेरे में खड़ा करती है।

सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े इस संकट की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। देश में हर साल लगभग 1.5 लाख लोगों की मौत सड़क हादसों में हो जाती है, यानी औसतन हर घंटे करीब 17 लोगों की जान चली जाती है। इन हादसों का सबसे बड़ा कारण ओवरस्पीडिंग यानी तेज गति से वाहन चलाना सामने आता है। केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 118 के तहत सार्वजनिक परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस लगाना अनिवार्य है, जो वाहन की अधिकतम गति को नियंत्रित करता है और उसे निर्धारित सीमा से अधिक तेज नहीं चलने देता।

इसके बावजूद जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। देश में लगभग 2.18 करोड़ परिवहन वाहन पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 10.70 लाख वाहनों में ही स्पीड लिमिटिंग डिवाइस लगाए गए हैं। इसका अर्थ है कि केवल 4.9 प्रतिशत वाहनों में ही यह सुरक्षा उपकरण मौजूद है, जबकि शेष लगभग 95 प्रतिशत वाहन बिना किसी गति नियंत्रण प्रणाली के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। यह स्थिति न केवल कानून के अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि आम यात्रियों की सुरक्षा को भी सीधे खतरे में डालती है।

निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए थे। सरकार ने यह अनिवार्य किया था कि सभी सार्वजनिक सेवा वाहनों जैसे बस, टैक्सी और ऑटो में जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम और पैनिक बटन लगाया जाए। नियम 125एच के तहत यह प्रावधान किया गया ताकि किसी भी आपात स्थिति में यात्री एक बटन दबाकर तुरंत पुलिस या नियंत्रण कक्ष को सूचना भेज सकें। इसका उद्देश्य विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी बड़ी संख्या में सार्वजनिक वाहन इन सुरक्षा उपकरणों के बिना चल रहे हैं। कई राज्यों में यह व्यवस्था या तो पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है या फिर केवल कागजों तक सीमित रह गई है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट लगातार इस बात पर चिंता व्यक्त कर रहा है कि आखिर इतने महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधानों को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू क्यों नहीं किया जा रहा है।

इसके साथ ही एक और बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन का है। मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 215बी के तहत इस बोर्ड के गठन का स्पष्ट प्रावधान है। इस बोर्ड का उद्देश्य देश में सड़क सुरक्षा नीतियों का समन्वय, निगरानी और सुधार करना है। यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक समन्वयकारी संस्था के रूप में काम करते हुए सड़क दुर्घटनाओं को कम करने की दिशा में नीति निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है।

लेकिन विडंबना यह है कि इतने महत्वपूर्ण प्रावधान के बावजूद यह बोर्ड अब तक पूरी तरह अस्तित्व में नहीं आ सका है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। सरकार की ओर से समय की मांग की गई थी, लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम सामने नहीं आए हैं।

परिवहन मंत्रालय के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2019 से 2023 के बीच कुल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 68 प्रतिशत से 73 प्रतिशत दुर्घटनाएं ओवरस्पीडिंग के कारण हुईं। वर्ष 2023 में 3,28,727 दुर्घटनाएं तेज रफ्तार के कारण दर्ज की गईं, जिनमें 1,17,682 लोगों की मौत हुई और 3,20,416 लोग घायल हुए। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा और भी गंभीर था, जब 1 लाख से अधिक लोगों की जान सड़क हादसों में चली गई।

जब देश में 95 प्रतिशत से अधिक परिवहन वाहन बिना स्पीड लिमिटर के चल रहे हों, तो यह साफ संकेत है कि कानून और उसके क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर मौजूद है। यही अंतर सड़क दुर्घटनाओं की भयावह स्थिति को लगातार बढ़ा रहा है।

अधिवक्ता के.सी. जैन द्वारा दाखिल याचिकाओं में यह मांग प्रमुख रूप से उठाई गई है कि सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटर, जीपीएस ट्रैकर और पैनिक बटन अनिवार्य रूप से लगाए जाएं। बिना इन उपकरणों के किसी भी वाहन को रजिस्ट्रेशन या फिटनेस प्रमाणपत्र न दिया जाए। इसके साथ ही राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का तत्काल गठन किया जाए और केंद्र तथा राज्य सरकारें इसकी नियमित अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करें।

उनका कहना है कि ये उपकरण केवल तकनीकी साधन नहीं हैं, बल्कि करोड़ों आम नागरिकों की जान बचाने की वास्तविक गारंटी हैं। जब कोई सामान्य यात्री बस या टैक्सी में यात्रा करता है, तो उसकी सुरक्षा पूरी तरह व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है।

अब 12 मई की यह सुनवाई इस पूरे मामले में बेहद निर्णायक मानी जा रही है। यह तय करेगा कि देश में सड़क सुरक्षा के नियम केवल कागजों तक सीमित रहेंगे या वास्तव में जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू होंगे और करोड़ों यात्रियों को वास्तविक सुरक्षा मिल सकेगी।

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