आगरा : भारत का शोर उत्सव: जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है—देश में तेजी से एक चीज़ गायब होती जा रही है, वह है खामोशी। जैसे जंगलों से बाघ कम होते जा रहे हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा भी खत्म होता जा रहा है। भारत त्योहारों, परंपराओं और जुलूसों का देश है, लेकिन इन सबके बीच लगातार बढ़ता शोर अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। शादी-समारोहों में डीजे और तेज संगीत आम हो गया है, जहाँ कभी खुशी का माहौल होता था, वहीं अब कई बार अत्यधिक शोर लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है।
स्थिति यह है कि अब धार्मिक कार्यक्रमों, जुलूसों और यहां तक कि शोक सभाओं में भी लाउडस्पीकर का अत्यधिक प्रयोग होने लगा है। त्योहारों के दौरान ढोल-नगाड़े, डीजे और पटाखों का शोर वातावरण को कई बार असहज बना देता है। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार तेज आवाज स्वास्थ्य पर भी असर डालती है, जिससे उच्च रक्तचाप, तनाव, नींद की कमी और सुनने की क्षमता में कमी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नियम भी बनाए गए हैं। वर्ष 2000 के Noise Pollution Rules के अनुसार रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक शोर की सीमा निर्धारित की गई है। अस्पतालों और स्कूलों के आसपास यह सीमा और भी कम रखी गई है। इसके बावजूद महानगरों में ट्रैफिक और कार्यक्रमों के दौरान शोर का स्तर कई बार 80 से 100 डेसिबल तक पहुंच जाता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि शोर का प्रभाव केवल इंसानों पर ही नहीं बल्कि पर्यावरण और वन्यजीवों पर भी पड़ता है। पक्षियों और जानवरों के व्यवहार में बदलाव देखने को मिलता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि उत्सव और परंपराओं को बनाए रखते हुए संयम और संतुलन का भी ध्यान रखा जाए। यदि लोग थोड़ी सावधानी बरतें, लाउडस्पीकर और डीजे का उपयोग सीमित रखें और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का पालन करें, तो उत्सव भी मनाया जा सकता है और समाज में शांति भी बनी रह सकती है।
