आगरा। हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि देश की समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा की पहचान भी है। इसकी सहजता, सरलता और मिठास ने इसे देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाया है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, नेपाल, अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के कई देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन और प्रयोग का विस्तार हो रहा है। हिंदी दिवस के अवसर पर श्रीमती भगवती देवी जैन कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिंदी भाषा एवं साहित्य की महत्ता, इसकी समृद्ध परंपरा और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव पर विचार रखे। छात्राओं और शोधार्थियों ने अपने विचार तथा काव्य-पाठ प्रस्तुत कर हिंदी के प्रति सम्मान और जुड़ाव का संदेश दिया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रो. वंदना अग्रवाल रहीं और अध्यक्षता प्रो. मीरा अग्रवाल ने की। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. शिखा श्रीधर ने कहा कि हिंदी दिवस और हिंदी साहित्य का अन्योन्याश्रित संबंध है। हिंदी की लोकप्रियता का प्रमुख कारण इसकी सहजता, सरलता और मिठास है। यही विशेषताएं हिंदी को लोगों से जोड़ती हैं और इसके प्रयोग का दायरा लगातार बढ़ा रही हैं। उन्होंने कहा कि आज भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में हिंदी भाषा के प्रति रुचि निरंतर बढ़ रही है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, नेपाल, अमेरिका और ब्रिटेन सहित विभिन्न देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन तथा प्रयोग का विस्तार हुआ है।
प्रो. शिखा श्रीधर ने हिंदी दिवस के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी तथा उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित की गई। भारत सरकार के निर्णय के बाद 1953 से 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
उन्होंने कहा कि हिंदी का अपना विशिष्ट शब्दानुशासन और विशाल शब्द-भंडार है। हिंदी के साहित्यकारों ने विपुल साहित्य की रचना कर भाषा को निरंतर समृद्ध बनाया है। हिंदी साहित्य ने समाज, संस्कृति, संवेदना और जीवन के विविध पक्षों को शब्द दिए हैं। वहीं हिंदी फिल्मों के गीतों, सिनेमा और जनसंचार माध्यमों ने भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन माध्यमों के कारण हिंदी की पहुंच समाज के विभिन्न वर्गों तक बढ़ी है और वैश्विक स्तर पर भी हिंदी का प्रभाव निरंतर विस्तार पा रहा है।
कार्यक्रम में हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. नेहा विश्वकर्मा और डॉ. अंकिता तिवारी ने भी हिंदी दिवस की सार्थकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। हिंदी विभाग के शोधार्थी कल्पना सिंह, संगीता शर्मा और यतेश गौतम ने हिंदी भाषा एवं साहित्य के महत्व पर अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर काव्य-पाठ भी किया गया, जिसमें हिंदी की भावनात्मक और रचनात्मक शक्ति को प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम में छात्राओं ने भी उत्साह के साथ सहभागिता की। हिंदी विभाग की छात्राओं खुशी, सरस्वती, काजल और अनीता आदि ने अपने विचार और काव्य-पाठ प्रस्तुत किए। छात्राओं की प्रस्तुतियों में हिंदी भाषा के प्रति सम्मान और उसके अधिकाधिक प्रयोग की भावना दिखाई दी। शोधार्थियों और छात्राओं की सहभागिता ने कार्यक्रम को संवादात्मक स्वरूप दिया और हिंदी दिवस के उद्देश्य को सार्थक बनाने में योगदान किया।
समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. नसीम अख्तर, डॉ. सगीता कुमार, डॉ. आभा मिश्रा, डॉ. नीलम कांत सहित अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं कार्यक्रम में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अर्चना निगम ने किया।
कार्यक्रम के दौरान हिंदी भाषा के प्रति सम्मान, उसके अधिकाधिक प्रयोग और प्रचार-प्रसार के महत्व पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने हिंदी को केवल एक विषय या भाषा के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाली जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में देखने पर जोर दिया। हिंदी की सरलता और सहजता के साथ उसका समृद्ध साहित्यिक आधार इसे व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता प्रदान करता है। कार्यक्रम में हिंदी के इतिहास, साहित्य, वर्तमान प्रभाव और वैश्विक विस्तार को सामने रखते हुए छात्राओं को भाषा के अधिकाधिक प्रयोग के लिए प्रेरित किया गया।
