ब्रज खंडेलवाल
आगरा। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताजमहल एक बार फिर तस्वीरों के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह स्मारक भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से लेकर आज के स्मार्टफोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक फोटोग्राफी की बदलती दुनिया का गवाह रहा है। वर्ष 1878 में शुरू हुए प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो की विरासत और राजा दीन दयाल की ऐतिहासिक तस्वीरों से लेकर डायना बेंच और सोशल मीडिया की तस्वीरों तक ताज की कहानी बताती है कि तकनीक चाहे जितनी बदले, इस स्मारक को देखने और कैमरे में उतारने का आकर्षण आज भी कायम है।
19 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व फोटोग्राफी दिवस का इतिहास कैमरे और तस्वीरों की तकनीकी यात्रा से कहीं आगे दिखाई देता है। तस्वीरों ने बीते समय को संभालकर रखने का काम किया है और इसी वजह से पुराने कैमरों से खींचे गए चित्र आज इतिहास को समझने का माध्यम बने हुए हैं। ताजमहल भी इस दृश्य यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसके बदलते रूप, आसपास का वातावरण और अलग-अलग समय की तस्वीरें एक लंबे दौर को सामने लाती हैं।
आगरा में इस विरासत की एक खास कड़ी एमजी रोड स्थित प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और इसकी छठी पीढ़ी इस काम को आगे बढ़ा रही है। उस समय तस्वीर बनाना आज की तरह कुछ सेकंड का काम नहीं था। बिजली की सुविधा आम नहीं थी। भारी कैमरों को संभालना पड़ता था और फोटो तैयार करने के लिए अलग अंधेरा कमरा बनाया जाता था।
पुराने डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटो तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में समय, धैर्य और तकनीकी समझ की जरूरत होती थी। एक तस्वीर के पीछे कई चरणों में मेहनत करनी पड़ती थी। इस दौर की फोटोग्राफी में फोटोग्राफर की नजर और हाथ का कौशल बेहद महत्वपूर्ण था।
प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल सहित आगरा के कई ऐतिहासिक स्मारकों को अपने कैमरे में दर्ज किया। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह पुस्तक उस समय के शहर और उसके ऐतिहासिक स्थलों को तस्वीरों के माध्यम से समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
भारतीय फोटोग्राफी के इतिहास में राजा दीन दयाल का नाम भी खास स्थान रखता है। वर्ष 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत की तस्वीरों को बड़े स्तर पर दर्ज किया। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।
उनका काम आज के मोबाइल कैमरे से बिल्कुल अलग था। बड़े लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर उन्हें लंबी यात्राएं करनी पड़ती थीं। कई बार बैलगाड़ियों और सहायकों की मदद लेनी पड़ती थी। उन्होंने महलों, किलों, मंदिरों, मस्जिदों और दूसरे स्मारकों के साथ राजसी जुलूस, हाथी और शिकार के दृश्य भी कैमरे में दर्ज किए।
दीन दयाल की तस्वीरों में केवल इमारतों की सुंदरता नहीं थी। उनके कैमरे ने तत्कालीन रियासती जीवन, पहनावे, दरबार, रस्मों और राजसी ठाठ को भी सुरक्षित किया। आज उनके कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें पुरानी तकनीक की निशानी लगती हैं, लेकिन उनसे तैयार तस्वीरों में 19वीं सदी के भारत की झलक साफ दिखाई देती है। उनकी फोटोग्राफी यह भी बताती है कि अच्छी तस्वीर के लिए महंगे उपकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण फोटोग्राफर की नजर होती है।
ताजमहल इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां रोशनी और मौसम हर दिन तस्वीर का रूप बदल देते हैं। सुबह की धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरे रंग में दिखाती है। दोपहर में इसकी चमक अलग नजर आती है और शाम के समय स्मारक का रूप बदल जाता है। पूर्णिमा की रात चांदनी इसकी तस्वीर को बिल्कुल अलग एहसास देती है।
यमुना भी ताज के फ्रेम को नया रूप देती है। नदी में दिखाई देता प्रतिबिंब तस्वीर में गहराई जोड़ता है। धुंध होने पर दृश्य रहस्यमय लगता है, जबकि बादलों के बीच ताज की तस्वीर में अलग प्रभाव दिखाई देता है। मेहताब बाग से लिया गया दृश्य हो या मुख्य द्वार से दिखाई देने वाला पारंपरिक फ्रेम, हर स्थान से स्मारक का अलग रूप सामने आता है।
ताजमहल की तस्वीरों को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाले दृश्यों में डायना बेंच का फ्रेम भी शामिल है। वर्ष 1992 में राजकुमारी डायना की ताजमहल के सामने खींची गई तस्वीर ने इस स्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित फोटो स्पॉट बना दिया।
ताजमहल को वर्ष 1983 में यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला। वर्ष 2007 में इसे न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में भी शामिल किया गया। इसके बाद भी इसकी तस्वीरों का सफर लगातार आगे बढ़ता रहा। आज यहां आने वाले पर्यटक पेशेवर कैमरों के साथ मोबाइल फोन से भी तस्वीरें लेते हैं।
स्मार्टफोन ने फोटोग्राफी को हर व्यक्ति तक पहुंचा दिया है। सेल्फी, रील और सोशल मीडिया पोस्ट ने ताजमहल की तस्वीरों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने का नया रास्ता बनाया है। पहले जहां एक तस्वीर के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ती थी, वहीं अब कुछ सेकंड में कई फ्रेम तैयार हो जाते हैं।
फिर भी ताजमहल की तस्वीरों का आकर्षण कम नहीं हुआ। इसकी वजह शायद यह है कि हर व्यक्ति इस स्मारक को अपनी नजर से देखता है। किसी के लिए यह वास्तुकला है, किसी के लिए प्रेम की निशानी और किसी के लिए रोशनी, पानी और आसमान के बीच बना एक खूबसूरत दृश्य।
भारी कैमरे से स्मार्टफोन तक पहुंची यह यात्रा बताती है कि फोटोग्राफी की तकनीक लगातार बदलती रही, लेकिन देखने की चाह नहीं बदली। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताजमहल यही संदेश देता नजर आता है कि बेहतरीन तस्वीर केवल कैमरे से नहीं बनती, उसके पीछे देखने वाली आंख और सही पल को पहचानने वाली नजर भी जरूरी होती है।
