राम-सीता विवाह प्रसंग पर भावविभोर हुआ कथा पंडाल, जनकपुर से अयोध्या तक बापू ने सुनाया प्रेम, त्याग और भक्ति का प्रसंग
आगरा। रामनाम से जीवन में प्रेम, त्याग और सद्भाव का भाव आता है। जिसने रामनाम को पकड़ लिया, उसे अपनी अस्मिता को गिरने नहीं देना चाहिए। साधु कोई पद या क्रिया नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। साधु के जीवन में सरलता और संतोष होता है, कुटिलता नहीं। यह बात मोरारी बापू ने करुणानिधान परिवार की ओर से जेपी वेडिंग ग्राउंड, फतेहाबाद रोड पर आयोजित रामकथा के सातवें दिन कही। कथा में साधु के स्वरूप, त्याग, गुरु-कृपा, रामनाम, स्वाध्याय, सत्य और ईमानदारी से लेकर श्रीराम-सीता विवाह तक के प्रसंग सुनाए गए। श्रीराम के जनकपुर पहुंचने, सीता स्वयंवर, शिवधनुष भंग, परशुराम संवाद और चारों भाइयों के विवाह के प्रसंग ने कथा पंडाल को भक्ति और आनंद से भर दिया। बापू ने कहा कि मंदिर में दर्शन के साथ धर्म को घर के व्यवहार में उतारना जरूरी है। रिश्वत लेने और देने, दोनों को गलत बताते हुए उन्होंने प्रेम, सद्भाव, संयम और सत्य के मार्ग पर चलने की सीख दी।

मोरारी बापू ने कथा के आरंभ में साधु के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा, “साधु कोई पद नहीं है, कोई क्रिया नहीं है। साधु तो एक स्वभाव है।” उन्होंने कहा कि साधु का स्वभाव सरल होता है। उसमें कुटिलता नहीं होती और वह सदा संतोष में रहता है। बापू ने कहा कि विवेक और धैर्य की असली परीक्षा सामान्य परिस्थितियों में नहीं, बल्कि आपातकाल में होती है। कठिन समय में जो व्यक्ति अपने विवेक और धैर्य को बनाए रखता है, वही साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
बापू ने कथा आयोजन को लेकर चल रही एक भ्रांति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह भ्रम है कि बापू की कथा करवाने के लिए इतने हजार या इतने लाख रुपये देने पड़ते हैं। मानस अमूल्य है। उसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता और कथा को किसी मूल्य के बंधन में नहीं बांधा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “मेरा मानस कहता है जिसमें कोई लोभ नहीं वह रघुनाथ हैं।” बापू ने कहा कि जिसे सत्य की साधना नहीं मिली, वह ऋषित्व की ओर नहीं पहुंचा है।
महाप्रभु वल्लभाचार्य का स्मरण भजन के माध्यम से किया गया। इसी दौरान 2003 में आगरा की धरती पर कही गई ‘मानस तेजो महल’ कथा की स्मृतियों को भी याद किया गया। बापू की उस कथा से जुड़ी पुस्तक ‘मानस तेजो महल’ का विमोचन किया गया। बापू ने कहा कि भीतर के तेजो महल का सृजन तभी होता है, जब मनुष्य त्याग को स्वीकार करता है। श्रेष्ठता को प्राप्त किए बिना त्याग की वास्तविकता समझ में नहीं आती। उन्होंने कहा कि जिसने रामनाम को पकड़ लिया, उसे अपनी अस्मिता को गिरने नहीं देना चाहिए।
सामाजिक जीवन में ईमानदारी की बात करते हुए बापू ने रिश्वत लेने और देने, दोनों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि पाप केवल रिश्वत लेने वाले पर नहीं, बल्कि देने वाले पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि जिस पर राम की अति कृपा होगी, वही रामकथा तक पहुंचेगा। शायर परवीना के एक शेर का उल्लेख करते हुए उन्होंने भाव रखा कि जीवन की राह ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो मनुष्य को प्रभु से दूर कर दे।
बापू ने कहा कि मंदिर में जाकर दर्शन करना आवश्यक है, लेकिन धर्म की वास्तविक परीक्षा घर के व्यवहार में होती है। परिवार और सामाजिक जीवन में प्रेम, सद्भाव और संयम होना चाहिए। धर्म केवल मंदिर में दर्शन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे घर और व्यवहार में भी उतारना जरूरी है।
कथा के दौरान बापू ने कुछ फिल्मी गीतों की पंक्तियां भी गाईं। उन्होंने कहा कि हर गीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं होता। कुछ गीत सीधे ईश्वर साधना, भक्ति और आस्था की ओर ले जाते हैं। ‘लो आ गई उनकी याद’, ‘प्रभु नहीं आए’, ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन’ और ‘दीवानों से मत पूछो, दीवानों पर क्या गुजरी है’ जैसे गीतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इनके मूल में भी आध्यात्मिक भाव खोजा जा सकता है। गीत हो या कथा, यदि वह मनुष्य को भीतर से प्रभु की ओर ले जाए तो वह साधना का माध्यम बन जाता है।
बापू ने स्वाध्याय और कथा वाचन को नियमित रूप से करने की सीख दी। उन्होंने कहा कि कलियुग की विशेषता है कि यदि मनुष्य मानसिक रूप से भी किसी का भला सोचता है तो उसका फल मिलता है। उन्होंने कहा, “जिसका हृदय मानस से भरा है, वह पाप नहीं कर सकता।” निंदा और ईर्ष्या के स्वभाव से बचने की सीख देते हुए बापू ने कहा कि जिसका स्वभाव ही निंदा और ईर्ष्या करना है, वह अपने माता-पिता तक की निंदा और ईर्ष्या कर सकता है। मनुष्य को अपने भीतर प्रेम और सद्भाव विकसित करना चाहिए।
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए बापू ने भारद्वाज, कपिल, आचार्य चरक, कश्यप और मनु आदि ऋषियों का स्मरण किया। मनुस्मृति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि किसी ग्रंथ की कोई बात पसंद न आए तो उसे छोड़ सकते हैं, लेकिन उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। पितृपक्ष के निकट आने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह पितरों के प्रति तर्पण की परंपरा है, उसी तरह रामकथा के माध्यम से हम अपने ऋषियों की ज्ञान परंपरा को स्मरण और सम्मान का तर्पण कर रहे हैं।
राम प्रकटीकरण की कथा को आगे बढ़ाते हुए बापू ने भगवान श्रीराम के जन्म की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राम जन्म के आनंद में मानो सूर्य भी अपनी गति भूल गया। राम का जन्म पूरे ब्रह्मांड के लिए आनंद और मंगल का क्षण है। भगवान शंकर और कागभुशुंडि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बापू ने भगवान राम के बाल स्वरूप और माता कौशल्या की गोद का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राम आनंद-सिंधु और सुख-राशि हैं, जिनका नाम आदि-अनादि है।
दशरथ पुत्रों के नामकरण का प्रसंग सुनाते हुए बापू ने कहा कि रामनाम त्रेता से बंधा हुआ नहीं है। भगवान शिव सदैव रामनाम का जाप करते हैं। इसी रामनाम की परंपरा में प्रभु का नाम राम हुआ। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नामों की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि ऋषि वशिष्ठ ने राजा दशरथ को समझाया कि तुम्हारे लिए ये केवल चार पुत्र नहीं, बल्कि चार वेदों के सूत्र हैं। कुमार अवस्था का वर्णन करते हुए बापू ने कहा कि गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के बाद श्रीराम ने अपनी दिनचर्या में माता-पिता, गुरु और अतिथि के चरण स्पर्श को स्थान दिया। उन्होंने अभिभावकों से कहा कि बच्चों को बचपन से ही घर से निकलने से पहले माता-पिता और बड़ों को प्रणाम करने की सीख देनी चाहिए।
बापू ने कहा कि संत कहते हैं—जिसका चरित्र होता है, कथा उसी की सुनाई जाती है। यही कारण है कि रामचरितमानस केवल एक कथा नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का ग्रंथ है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में अनेक गीत कुछ दशकों बाद भुला दिए जाते हैं, लेकिन रामचरितमानस और भागवत कथा की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। भगवान राम के अवतार कार्य में आई बाधाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने ताड़का वध का प्रसंग सुनाया। इसके बाद विश्वामित्र के साथ आगे बढ़ते हुए श्रीराम के गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचने और अहल्या उद्धार का वर्णन किया। बापू ने कहा कि गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या का प्रसंग यह सिखाता है कि भूल करने वाला हर व्यक्ति पापी नहीं होता।
जनकपुर पहुंचने पर राजा जनक द्वारा श्रीराम के दर्शन का प्रसंग सुनाते हुए बापू ने कहा कि जनक परम वैरागी थे, लेकिन राम के दर्शन होते ही उनके भीतर अनुराग उमड़ पड़ा। उन्होंने राम को देखते ही पहचान लिया और उनका मन राममय हो गया। श्रीराम और सीता के प्रथम दर्शन, सीता की पार्वती आराधना, जनक की प्रतिज्ञा और शिवधनुष भंग का प्रसंग आगे बढ़ा। धनुष टूटने के बाद परशुराम के आगमन और श्रीराम के साथ उनके संवाद का वर्णन भी बापू ने भावपूर्ण ढंग से किया।
इसके बाद अयोध्या में विवाह का निमंत्रण भेजा गया। बारात जनकपुर पहुंची और श्रीराम सहित चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ। विवाह पंचमी के मंगल प्रसंग के बीच जनकपुर आनंद से भर उठा। विदाई की बेला में राजा जनक की व्याकुलता और प्रेम का भाव भी बापू ने भावपूर्ण ढंग से सुनाया। इसके बाद चारों भाइयों और नववधुओं का अयोध्या में स्वागत हुआ और बालकांड का यह मंगलमय प्रसंग पूर्ण हुआ। राम-सीता विवाह की महिमा बताते हुए बापू ने मानस की पंक्तियां सुनाईं—
“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥”
बापू ने इसका भाव बताते हुए कहा कि सीता और रघुनाथजी के विवाह प्रसंग को जो प्रेमपूर्वक गाते और सुनते हैं, उनके जीवन में सदा उत्साह और मंगल बना रहता है।
कथा के दौरान मोरारी बापू ने एत्मादपुर स्थित छोटू महाराज सिनेमा, बैम्बू वाटर पार्क परिसर में रामकथा के प्रदर्शन का भी उल्लेख किया और इसकी सराहना की। उन्होंने कहा कि कथा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के प्रयास भी अपने आप में सेवा का माध्यम हैं। रामनाम, साधु के स्वभाव, त्याग, सत्य, स्वाध्याय, परिवार और सामाजिक जीवन के संदेशों से होते हुए श्रीराम-सीता विवाह तक पहुंची कथा ने सातवें दिन श्रद्धालुओं को भक्ति, प्रेम और आनंद से भर दिया।
