आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय समेत तीन संस्थानों के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और हिंदी-पाली अध्ययन में सहयोग पर चर्चा
आगरा, श्रीलंका। भारत और श्रीलंका की साझा सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और दोनों देशों के संबंध मजबूत करने पर कोलंबो में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा समेत तीन संस्थानों के संयुक्त तत्वावधान में हुई संगोष्ठी में बौद्ध दर्शन, हिंदी-पाली भाषा, नारी जीवन, संगीत परंपराओं और पर्यटन पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुसार दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। भारतीय दूतावास, कोलंबो के प्रथम सचिव (ईएंडसी) सौरभ सभलोक मुख्य अतिथि रहे। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुईं। पद्मश्री प्रो. उषा यादव और केलणिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. लक्ष्मण सेनेविरत्न अतिथि वक्ता रहे। https://www.hcicolombo.gov.in/

संगोष्ठी के संयोजक एवं विश्वविद्यालय के केएमआई निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय की प्रवक्ता डॉ. निरोषा सल्वतुर तथा स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की शिक्षिका एवं श्रीलंका संयोजक अतिला कोतलावल ने आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।https://todaynewstrack.com/2026/10/india-sri-lanka-cultural-relations-colombo-seminar/
प्रो. शंपा चौधरी और प्रो. जया शर्मा ने मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। इसके बाद प्रो. प्रदीप श्रीधर ने विषय प्रवर्तन करते हुए भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन संदर्भों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस तरह की संगोष्ठियां दोनों देशों के शिक्षाविदों, साहित्यकारों और शोधकर्ताओं को अपने ज्ञान एवं अनुभव साझा करने का मंच प्रदान करती हैं। साझा सांस्कृतिक विरासत को समझने और उस पर शोध को आगे बढ़ाने के लिए दोनों देशों के संस्थानों के बीच संवाद महत्वपूर्ण है।
आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक संबंधों पर जोर
मुख्य अतिथि सौरभ सभलोक ने कहा कि भारत और श्रीलंका की सभ्यताएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं और दोनों देशों के संबंध वर्तमान में उच्च स्तर पर हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक संकट या प्राकृतिक आपदा के समय भारत श्रीलंका के साथ खड़ा होता है और सहायता के लिए आगे आता है। उन्होंने तमिलनाडु से श्रीलंका तक जलमार्ग के माध्यम से आवागमन की सुविधा का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच संपर्क और सहयोग संबंधों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
सभलोक ने भारत और श्रीलंका के बीच मुक्त व्यापार समझौते का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि श्रीलंका भारत के लिए निर्यात का एक प्रमुख केंद्र है। उनके अनुसार, आर्थिक सहयोग के साथ भाषाई और सांस्कृतिक स्तर पर होने वाले समझौते भी दोनों देशों के संबंधों को और मजबूती दे सकते हैं। संगोष्ठी में दोनों देशों की साझा विरासत के साथ आपसी संपर्क और सहयोग को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
पाली पांडुलिपियों के अध्ययन में सहयोग की पहल
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी ने विश्वविद्यालय में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों और उनके संरक्षण के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में लगभग 1500 से 2000 पांडुलिपियां हैं, जिनमें सबसे अधिक पाली भाषा में हैं। इन पांडुलिपियों को ज्ञान भारतम एप के माध्यम से डिजिटल रूप में उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है।https://www.mea.gov.in/india-sri-lanka-relations.htm
उन्होंने बताया कि पाली भाषा की पांडुलिपियों को पढ़ने और उनके अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए श्रीलंका के बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय के साथ समझौता किया गया है। इस सहयोग से पाली भाषा में उपलब्ध ज्ञान और प्राचीन साहित्य को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने हिंदी और सिंहली भाषा के अध्ययन तथा शोध को आगे बढ़ाने के लिए संस्थागत सहयोग की संभावनाएं भी व्यक्त कीं। उन्होंने आशा जताई कि इस दिशा में जल्द ही हिंदी-सिंहली शोध संस्थान की स्थापना की जा सकेगी।
विश्वविद्यालय की ओर से पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और उनके अध्ययन के लिए किए जा रहे प्रयासों को भारत-श्रीलंका के शैक्षणिक संबंधों के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे दोनों देशों के शोधार्थियों को प्राचीन साहित्य, भाषा और ज्ञान परंपराओं के अध्ययन में सहयोग मिलने की संभावना है।
साहित्य और लोकपरंपराएं दोनों देशों को जोड़ती हैं
पद्मश्री प्रो. उषा यादव ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य और संस्कृति समाज को जोड़ने के सशक्त माध्यम हैं। भारत और श्रीलंका की लोकपरंपराओं, धार्मिक मान्यताओं, कथाओं और जीवन मूल्यों में अनेक समानताएं दिखाई देती हैं। इन समानताओं को समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं।
केलणिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. लक्ष्मण सेनेविरत्न ने भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म तथा प्राचीन ज्ञान परंपराओं के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने इन संबंधों को त्रेता युग से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि श्रीलंका में लगभग 80 वर्षों से हिंदी की पढ़ाई हो रही है। वहां के 17 विश्वविद्यालयों में से नौ में हिंदी पढ़ाई जा रही है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष से श्रीलंका में श्रीलंकाई हिंदी साहित्य को विकसित करने की पहल भी की गई है।
संगोष्ठी में भाषा और साहित्य को दोनों देशों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया। हिंदी के अध्ययन के विस्तार और श्रीलंका में हिंदी साहित्य के विकास से भारतीय साहित्य तथा श्रीलंकाई सांस्कृतिक अनुभवों को एक-दूसरे तक पहुंचाने के अवसर बढ़ सकते हैं।
कथक प्रस्तुति और पुस्तक का विमोचन
संगोष्ठी के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। डॉ. निरोषा सल्वतुर और अतिला कोतलावल ने आभार व्यक्त किया। तिलिनि लियनगे ने ‘कथा सोलह शृंगार’ विषय पर कथक नृत्य प्रस्तुत किया। भारतीय प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि सौरभ सभलोक ने सम्मान पत्र वितरित किए।
इस अवसर पर नूतन अग्रवाल ने ‘एक किनारे भारत, जिसके दूजे लंका की सीमा…’ पंक्तियों के माध्यम से भारत और श्रीलंका के रिश्तों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया। हिंदी साहित्यकार कामना सिंह की पुस्तक ‘शिव शक्ति’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, संगीत और नृत्य के माध्यम से दोनों देशों की सांस्कृतिक निकटता को सामने रखा गया।https://www.incredibleindia.gov.in/
तकनीकी सत्र में बौद्ध दर्शन, नारी जीवन और संगीत पर शोधपत्र
संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के विभिन्न आयामों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। सत्र की अध्यक्षता सबरागामुवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो. संगीत रत्नायक ने की, जबकि संचालन श्री कृष्ण ने किया।
राजकीय महाविद्यालय, आगरा कैंट की प्राचार्य एवं हिंदी विभाग की प्रो. मनीषा, बीडी जैन कन्या महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष प्रो. मीरा अग्रवाल, इतिहास विभाग की सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. मधु वशिष्ठ, आर्य कन्या पीजी कॉलेज, हापुड़ की संगीत विभाग की प्रो. जया शर्मा, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के भाषा निपुणता संवर्धन विभाग की डॉ. सरसी राणसिंह और होमागम महिन्द राजपक्ष विद्यालय की हिंदी शिक्षिका निमेषा संदीपनी दयावंश ने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
शोधपत्रों के माध्यम से बौद्ध दर्शन, नारी जीवन, संगीत परंपराओं और भारत-श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों से जुड़े विषयों पर विचार रखे गए। कार्यक्रम के समापन पर स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की हिंदी शिक्षिका एवं श्रीलंका हिंदी मित्र मंडल की सचिव अमानी विक्रमारच्ची ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में भाषा, साहित्य, धर्म, संगीत और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से दोनों देशों की साझा विरासत को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
