आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में साझा विरासत को बताया दोनों देशों की आत्मीयता का सेतु, पाली भाषा पर एआई से शोध की संभावनाओं पर भी दिया जोर
आगरा,श्रीलंका। भारत और श्रीलंका के बीच संबंध केवल भौगोलिक निकटता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा इतिहास, रामायण परंपरा, बौद्ध दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत ने दोनों देशों को सदियों से जोड़ रखा है। इस विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संवाद को विस्तार देना जरूरी है।
यह बात डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी ने बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय, कोलंबो में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन इंडिया एंड श्रीलंका-2026’ में मुख्य वक्ता के रूप में कही। https://timesofindia.indiatimes.com/india/ramayana-a-common-cultural-narrative-for-india-sri-lanka-says-lankan-minister-jeevan-thondaman/articleshow/108154912.cms
सम्मेलन में भारत और श्रीलंका के सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और आर्थिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर विद्वानों ने विचार साझा किए। केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर के नेतृत्व में आगरा के शैक्षणिक दल ने सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान भारतीय शोधकर्ताओं ने विभिन्न विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए और दोनों देशों के बीच अकादमिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ (केएमआई), डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के लिए यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन महत्वपूर्ण रहा। कुलपति प्रो. आशु रानी के मार्गदर्शन में केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर अपने शैक्षणिक दल के साथ कोलंबो पहुंचे। आगरा की सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्था स्वास्तिक हैंडराइटिंग वेलफेयर ट्रस्ट की सचिव श्रुति दास और आईटी इंचार्ज अंशिका मित्तल ने भी सम्मेलन में भाग लिया और अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।https://newsonair.gov.in/jaya-sri-maha-bodhi-living-symbol-of-india-sri-lanka-spiritual-heritage-ashokan-legacy/
दीप प्रज्वलन के साथ सम्मेलन का शुभारंभ
बुधवार को सम्मेलन के पहले दिन उद्घाटन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन और भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने के साथ हुई। इस अवसर पर बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के कुलपति प्रो. वेन. होमगामा धम्मानंद थेरो, डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कुलपति प्रो. आशु रानी, केएमआई के निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर, पद्मश्री डॉ. ऊषा यादव और प्रो. मोरागोल्लागामा उपरतना थेरो उपस्थित रहे। श्रीलंका के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में सरस्वती वंदना को ज्योति मित्तल (नूतन) ने स्वर दिए।
सम्मेलन का उद्देश्य भारत और श्रीलंका की साझा विरासत को समझना, सांस्कृतिक संवाद को प्रोत्साहित करना तथा शैक्षणिक और शोध संबंधों को मजबूत करना रहा। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संपर्कों और परंपराओं पर चर्चा के साथ साहित्य, धर्म, समाज और संस्कृति के विविध पक्षों को सामने रखा गया।
इस अवसर पर शोध समालोचना से संबंधित पुस्तक का विमोचन भी किया गया। पुस्तक के संपादन मंडल में शामिल प्रो. शिखा श्रीधर, संगीता कुमार, विनीता कुमार, हंसिका कुमारी, नूतन अग्रवाल, डॉ. कामना सिंह, डॉ. प्रेमलता और निखिल कुमार को सम्मानित किया गया। सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले लेखकों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।
रामायण और बौद्ध धर्म साझा विरासत के प्रमुख आधार
सम्मेलन के पूर्ण सत्र का विषय ‘भारत और श्रीलंका के बीच सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समझ का विकास’ रहा। सत्र की अध्यक्षता भारत की ओर से प्रो. शिखा श्रीधर और श्रीलंका की ओर से वरिष्ठ प्रो. मोरागोल्लागामा उपरतना थेरो ने की। डॉ. संगीता कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहीं। सत्र का संचालन वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. हसनथा वसना समरसिंघा ने किया।
मुख्य वक्ता प्रो. आशु रानी ने कहा कि रामायण परंपरा और बौद्ध धर्म भारत-श्रीलंका की आध्यात्मिक निकटता के प्रमुख आधार रहे हैं। सम्राट अशोक द्वारा महेंद्र और संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजना तथा संघमित्रा द्वारा बोधिवृक्ष की शाखा वहां ले जाना दोनों देशों के ऐतिहासिक और धार्मिक संबंधों का उल्लेखनीय उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि साझा विरासत को केवल इतिहास के रूप में देखने के बजाय वर्तमान पीढ़ी से जोड़ना भी जरूरी है। विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं और साहित्यकारों के बीच नियमित संवाद से दोनों देशों की सांस्कृतिक परंपराओं को बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिलेगा। इससे शोध के नए विषय सामने आएंगे और विद्यार्थियों को भी भारत-श्रीलंका संबंधों के विभिन्न पहलुओं को जानने का अवसर मिलेगा।
पाली पांडुलिपियों पर एआई से शोध की संभावनाएं
प्रो. आशु रानी ने पाली भाषा से जुड़ी पांडुलिपियों और शोध की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में पाली भाषा की अच्छी संख्या में पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से पाली भाषा और उससे जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री पर शोध कार्य किए जा सकते हैं।
पाली भाषा बौद्ध साहित्य और दर्शन के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस भाषा में उपलब्ध प्राचीन साहित्य और पांडुलिपियों का अध्ययन बौद्ध परंपराओं, विचारों और ऐतिहासिक संपर्कों को समझने में सहायक हो सकता है। एआई आधारित तकनीकों के इस्तेमाल से पांडुलिपियों के अध्ययन, पाठ की पहचान और शोध सामग्री के व्यवस्थित विश्लेषण में नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। कुलपति ने इस दिशा में शैक्षणिक सहयोग और शोध को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत-श्रीलंका संबंधों को मजबूत करने पर जोर
बुद्धिस्ट एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के कुलपति प्रो. वेन. होमगामा धम्मानंद थेरो ने दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मैत्री का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने बौद्ध परंपरा, साझा सांस्कृतिक मूल्यों और शैक्षणिक सहयोग को मजबूत बनाने पर जोर दिया। उनके अनुसार, इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शोध, ज्ञान के आदान-प्रदान और परस्पर समझ को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।https://indianexpress.com/article/lifestyle/art-and-culture/sri-lanka-envoy-gifts-india-two-paintings-depicting-arrival-of-ashokas-son-daughter-8571315/
भारतीय दूतावास की ओर से द्वितीय सचिव रमैया चंद्र शेखरन ने भी भारत और श्रीलंका के संबंधों के महत्व पर प्रकाश डाला। सम्मेलन में वक्ताओं ने दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक संपर्कों को विस्तार देने की संभावनाओं पर विचार साझा किए।
भारतीय शोधकर्ताओं ने प्रस्तुत किए शोधपत्र
सम्मेलन में भारतीय और श्रीलंकाई विद्वानों ने विभिन्न विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। भारतीय शोधपत्र प्रस्तुतकर्ताओं में एकता अग्रवाल, डॉ. कामना सिंह, डॉ. डब्ल्यू. एम. अमिला दामयंती, डॉ. मधु वशिष्ठ, प्रो. मीरा अग्रवाल, हंसिका कुमारी, वेन. वाघ सचिन कैलास, राजवीर सिंह ओझा, प्रो. शम्पा चौधरी, प्रो. जया शर्मा, सोरन सिंह, डॉ. सुनीता सिंह, प्रियंका खंडेलवाल, डॉ. मधु ओझा, ज्योति मित्तल, श्रीमती चथुरिनी, डॉ. प्रेमलता प्रयागराज, श्रुति दास, अंशिका मित्तल और अखिल शर्मा शामिल रहे।
इन शोधपत्रों के माध्यम से विभिन्न विषयों पर अकादमिक विचार प्रस्तुत किए गए। सम्मेलन में शोध और संवाद को दोनों देशों की साझा विरासत के अध्ययन का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया। विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं की भागीदारी से विचारों के आदान-प्रदान का अवसर मिला।
शिक्षाविदों और विद्वानों की रही सहभागिता
सम्मेलन में प्रो. शिखा श्रीधर, प्रो. नीलिमा सिंह, प्रो. भावना पोखरना, प्रो. लक्ष्मण सेनवीरत्ने, प्रो. गीता यादवेंदु, प्रो. अल्पना मोहन और वेन. प्रो. मावतगामा पेमानंद थेरो सहित अनेक शिक्षाविदों एवं विद्वानों ने भाग लिया। विभिन्न सत्रों का संचालन वेन. बेरलापनातारा धम्मरामा थेरो और विजिटिंग लेक्चरर डॉ. जे. ए. डी. सरसी उपेक्षिका रणसिंघे ने किया।
दो दिवसीय सम्मेलन में भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों को अकादमिक दृष्टि से समझने पर जोर दिया गया। आगरा के डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी के साथ पाली भाषा पर तकनीक आधारित शोध की संभावनाएं भी चर्चा में आईं। साझा विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और दोनों देशों के शैक्षणिक संस्थानों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने का विचार सम्मेलन के प्रमुख संदेशों में शामिल रहा।
