पेम्ब्रोलिजुमैब, डुरवालुमैब और ओसिमर्टिनिब समेत कई दवाएं सूची में शामिल
2019 में 42 दवाओं पर लागू हुई थी व्यवस्था, 526 ब्रांडों के दाम 90% तक घटे थे
आगरा। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 137 दवाओं की कीमतें घटने का रास्ता साफ हो गया है। केंद्र सरकार ने इन दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा 30 प्रतिशत तय की है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी।
सरकार का अनुमान है कि दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) में मौजूदा कीमतों के मुकाबले 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है और मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।https://todaynewstrack.com/2026/10/cancer-medicines-price-reduction-india-2026/
यह फैसला उन कैंसर दवाओं पर लागू होगा जो अभी निर्धारित अधिकतम कीमत वाली अनुसूचित श्रेणी में नहीं आतीं। सूची में पहले से इस्तेमाल हो रही दवाओं के साथ पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल हैं। सरकार ने यह कदम दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर को कम करने के लिए उठाया है।
कौन-कौन सी कैंसर दवाएं सूची में शामिल हैं?
केंद्र की अधिसूचना में 137 दवाओं के नाम दिए गए हैं। इनमें पेम्ब्रोलिजुमैब, डुरवालुमैब और ओसिमर्टिनिब जैसी दवाएं शामिल हैं। सूची में स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डेनोसुमैब भी है।
कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली अन्य दवाओं में बेवेसिजुमैब, पेगफिलग्रास्टिम, रिबोसिक्लिब और एबेमासिक्लिब भी शामिल हैं। बेवेसिजुमैब का इस्तेमाल कोलन, ओवरी और सर्वाइकल कैंसर के उपचार में किया जाता है। पेगफिलग्रास्टिम कैंसर के मरीजों में न्यूट्रोपीनिया का खतरा कम करने के लिए दी जाती है।
इस सूची में इम्यूनोथेरेपी की दवाएं भी हैं, जिनका इस्तेमाल 20 से अधिक प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है। सूची विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के आधार पर तैयार की गई है और जरूरत के अनुसार इसमें आगे बदलाव किया जा सकता है।
क्या ये दवाएं बाजार में नई आई हैं?
नहीं। 137 दवाओं की सूची का मतलब यह नहीं है कि ये सभी दवाएं पहली बार बाजार में आई हैं। इनमें कई दवाएं पहले से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही हैं। अब इनके मूल्य निर्धारण में व्यापारिक मार्जिन की सीमा लागू की जा रही है।
इससे पहले वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर इसी तरह का प्रयोग किया था। उस व्यवस्था के बाद 526 ब्रांडों की अधिकतम खुदरा कीमतों में 90 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई थी। अब सरकार ने इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाकर 137 दवाओं को इसमें शामिल किया है।
कितने रुपये घटेंगे, कितना सस्ता होगा इलाज?
सरकार के आकलन के मुताबिक, नई व्यवस्था से संबंधित दवाओं की एमआरपी में लगभग 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। हालांकि, हर दवा में एक जैसी कटौती नहीं होगी। कीमत में वास्तविक बदलाव संबंधित दवा की मौजूदा कीमत, निर्माता की बिक्री कीमत और उसके व्यापारिक मार्जिन पर निर्भर करेगा।
अभी सभी दवाओं की पुरानी और नई एमआरपी का अलग-अलग अंतिम ब्योरा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। निर्माताओं को अधिसूचना जारी होने के सात दिन के भीतर संशोधित कीमतों की जानकारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को देनी है। इसलिए किसी खास दवा के दाम में कितने रुपये की कमी होगी, इसकी पुष्टि संशोधित मूल्य सूची जारी होने के बाद ही की जा सकेगी।
सरकार का अनुमान है कि इस कदम से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। यह अनुमान है, प्रत्येक मरीज को मिलने वाली तय बचत नहीं। मरीज को वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके इलाज में कौन-सी दवा इस्तेमाल होती है और उसकी कीमत कितनी घटती है।
30 प्रतिशत मार्जिन का क्या मतलब है?
सरकार ने निर्माता से स्टॉकिस्ट या वितरक को दवा बेचने की कीमत के आधार पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय की है। अधिसूचना के अनुसार, एमआरपी की गणना में व्यापारिक मार्जिन 30 प्रतिशत से अधिक नहीं रखा जा सकेगा। इसके बाद लागू जीएसटी जोड़ा जाएगा।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी दवा की स्टॉकिस्ट या वितरक को बिक्री कीमत 70 रुपये है, तो 30 प्रतिशत व्यापारिक मार्जिन के हिसाब से जीएसटी से पहले उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 100 रुपये होगी। यदि उसी दवा की मौजूदा एमआरपी 300 रुपये है, तो नए नियम के तहत गणना से निकली अधिकतम कीमत 100 रुपये और लागू जीएसटी होगी।http://137-cancer-medicines-new-prices-from-november-9-2026
हालांकि, यदि किसी दवा की मौजूदा एमआरपी नई गणना से निकली कीमत से कम है, तो कंपनी को पुरानी कम कीमत ही बनाए रखनी होगी। यानी नियम का उद्देश्य कीमत घटाना है, पहले से कम कीमत पर बिक रही दवा का दाम बढ़ाना नहीं।
9 नवंबर से अस्पतालों और दुकानों पर लागू होंगे नए दाम
निर्माताओं को संशोधित एमआरपी की सूची एनपीपीए और संबंधित राज्य औषधि नियंत्रक को भेजनी होगी। दवा कंपनियों को नई कीमतें अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने और अस्पतालों, वितरकों तथा खुदरा विक्रेताओं तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
9 नवंबर से संबंधित दवाएं संशोधित कीमत पर ही बेची जानी हैं। अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को भी नई कीमतों की निगरानी करनी होगी और अपनी वेबसाइट पर संशोधित मूल्य सूची प्रदर्शित करनी होगी। नियमों का उल्लंघन होने पर अधिक वसूली गई रकम ब्याज सहित जमा कराने की कार्रवाई हो सकती है।
सरकार ने दवा कंपनियों को इन दवाओं का मौजूदा उत्पादन और आपूर्ति बनाए रखने को भी कहा है, ताकि कीमतें कम होने के कारण बाजार में दवाओं की कमी न हो।
पहले की व्यवस्था और नई पहल में अंतर
औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माता सामान्यतः शुरुआती एमआरपी तय करते हैं। सरकार का कहना है कि कुछ कैंसर दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली एमआरपी के बीच अंतर काफी अधिक पाया गया। इसी अंतर को कम करने के लिए नई व्यवस्था लागू की गई है।
एनपीपीए के आकलन में गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर औसत व्यापारिक बढ़ोतरी करीब 170 प्रतिशत तक पाई गई, जबकि कुछ मामलों में यह 700 प्रतिशत तक थी। नई व्यवस्था का उद्देश्य अत्यधिक मार्जिन कम करना है, ताकि महंगी दवाओं का खर्च मरीजों और उनके परिवारों पर कम पड़े।
सुप्रीम कोर्ट में दवाओं की कीमतों पर सुनवाई
दवाओं की कीमतों और व्यापारिक मार्जिन का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठा। सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता केसी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को सुनवाई पूरी हुई और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक कैंसर मरीज के उपचार में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन की कीमत में बड़े अंतर का उदाहरण दिया। अदालत के सामने रखे गए विवरण के अनुसार, वितरक को लगभग 11 हजार रुपये में उपलब्ध इंजेक्शन के लिए अस्पताल ने 1.30 लाख रुपये वसूले। पीठ ने लगभग 15 रुपये में खुदरा विक्रेता को मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए मरीज से 250 रुपये लिए जाने पर भी सवाल उठाया।
केंद्र सरकार ने दवाओं की कीमतों और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाने के लिए उठाए गए कदमों का पक्ष रखा। निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अस्पतालों के संचालन और चौबीसों घंटे सेवाएं उपलब्ध कराने की लागत का उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि अस्पताल चलाने की जरूरत दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन का औचित्य नहीं बन सकती।
याचिकाओं में गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों के नियमन, चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य या मार्जिन सीमा और जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। अब अदालत के फैसले से दवाओं की कीमतों के व्यापक नियमन पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
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देश में हर दिन 4,301 नए कैंसर मरीजों का अनुमान
2,380 मौतें; दवाओं के दाम घटाने के लिए केंद्र का बड़ा फैसला
2025 में भारत में कैंसर के 15.69 लाख नए मामले और 8.68 लाख मौतें अनुमानित; उत्तर प्रदेश में 2.26 लाख नए मामले और 1.25 लाख मौतों का अनुमान। गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने की मंजूरी, सरकार ने सालाना 2,500 करोड़ रुपये की बचत का अनुमान जताया।
भारत में कैंसर मरीजों की संख्या और इलाज का खर्च स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती हैं। कैंसर के इलाज में ऑपरेशन और अस्पताल में भर्ती होने के अलावा कई मरीजों को लंबे समय तक महंगी दवाओं की जरूरत पड़ती है। ऐसे में नए मरीजों, मौतों और दवाओं की कीमतों से जुड़े सरकारी आंकड़े आम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
भारत सरकार के संसदीय जवाबों में वर्ष 2025 के लिए देश में कैंसर के 15,69,793 नए मामले और 8,68,588 मौतें अनुमानित हैं। इसका औसत निकालें तो हर दिन करीब 4,301 नए मामले और 2,380 मौतों का अनुमान बनता है। ये अनुमानित आंकड़े हैं, इन्हें अस्पतालों में दर्ज वास्तविक मामलों या अंतिम मृत्यु-पंजीकरण की संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में भी स्थिति गंभीर है। राज्य में वर्ष 2025 के लिए कैंसर के 2,26,125 नए मामले और 1,25,184 मौतें अनुमानित हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने 8 अक्टूबर 2026 को गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन को अधिक व्यापक रूप से सीमित करने की मंजूरी देने की घोषणा की। सरकार का अनुमान है कि इससे मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
2020 से 2025 तक देश में कैंसर के मामले कितने बढ़े?
भारत सरकार के संसदीय जवाबों में दिए गए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम (NCRP) के अनुमानों के अनुसार, देश में हर साल नए कैंसर मामलों की संख्या बढ़ी है।
| वर्ष | अनुमानित नए मामले | पिछले वर्ष से बढ़ोतरी |
| 2020 | 13,92,179 | — |
| 2021 | 14,26,447 | 34,268 |
| 2022 | 14,61,427 | 34,980 |
| 2023 | 14,96,972 | 35,545 |
| 2024 | 15,33,055 | 36,083 |
| 2025 | 15,69,793 | 36,738 |
वर्ष 2020 में नए मामलों का अनुमान 13.92 लाख था, जो 2025 में बढ़कर करीब 15.70 लाख हो गया। पांच साल में सालाना नए मामलों के अनुमान में 1,77,614 की बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2024 में 15,33,055 नए मामले अनुमानित थे। 2023 के मुकाबले यह संख्या 36,083 अधिक थी। वर्ष 2025 के लिए अनुमानित मामले 15,69,793 हैं, यानी 2024 की तुलना में 36,738 अधिक।
इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि देश में इस समय केवल इतने ही कैंसर मरीज हैं। हर साल सामने आने वाले नए मामले और कैंसर के साथ जीवित रह रहे कुल मरीजों की संख्या अलग-अलग होती है। कुल मरीजों में इलाज करा रहे और इलाज के बाद जीवित लोग भी शामिल हो सकते हैं।
2025 में हर दिन कितने नए मामले और कितनी मौतें?
10 मार्च 2026 को राज्यसभा में दिए गए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के जवाब के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में कैंसर के 15,69,793 नए मामले और 8,68,588 मौतें अनुमानित हैं।
| विवरण | वर्ष 2025 का अनुमान |
| नए कैंसर मामले | 15,69,793 |
| प्रतिदिन नए मामलों का औसत | करीब 4,301 |
| कैंसर से मौतें | 8,68,588 |
| प्रतिदिन मौतों का औसत | करीब 2,380 |
ये आंकड़े कैंसर के स्वास्थ्य बोझ को समझने में मदद करते हैं। हालांकि, नए मामलों और मौतों की संख्या को एक ही समय के मरीजों का सीधा अनुपात नहीं मानना चाहिए। किसी वर्ष कैंसर से मरने वाले लोगों में ऐसे मरीज भी हो सकते हैं, जिनमें बीमारी का पता पहले के वर्षों में चला था।
उत्तर प्रदेश में पांच साल में कितने बढ़े कैंसर के मामले?
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025 के लिए कैंसर के 2,26,125 नए मामले और 1,25,184 मौतें अनुमानित हैं। राज्यसभा में 10 मार्च 2026 को पेश राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, राज्य में नए मामलों और मौतों के अनुमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
| वर्ष | अनुमानित नए मामले | अनुमानित मौतें |
| 2021 | 2,06,088 | 1,14,128 |
| 2022 | 2,10,958 | 1,16,818 |
| 2023 | 2,15,931 | 1,19,563 |
| 2024 | 2,21,000 | 1,22,365 |
| 2025 | 2,26,125 | 1,25,184 |
इन अनुमानों के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश में सालाना नए मामलों की संख्या 20,037 बढ़ी है। इसी अवधि में अनुमानित मौतों में 11,056 की बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2025 के अनुमान के हिसाब से उत्तर प्रदेश में हर दिन करीब 620 नए कैंसर मामले सामने आने का औसत बनता है। वहीं, प्रतिदिन मौतों का औसत करीब 343 है। ये औसत अनुमानित वार्षिक आंकड़ों को 365 दिनों से भाग देकर निकाले गए हैं।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये पूरे उत्तर प्रदेश के आंकड़े हैं। इन्हें आगरा जिले के मरीजों की संख्या नहीं माना जा सकता। आगरा में हर साल कितने नए मरीज मिल रहे हैं, कितने मरीजों की मौत हो रही है और जिले में कुल कितने लोग कैंसर का इलाज करा रहे हैं, इसके लिए जिला स्तर के अलग आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत होगी।
पहले के सरकारी आंकड़ों में कितनी मौतें दर्ज की गईं?
भारत सरकार ने वर्ष 2023 में लोकसभा में दिए गए जवाब में वर्ष 2020 से 2022 तक कैंसर से होने वाली अनुमानित मौतों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए थे।
| वर्ष | भारत में अनुमानित मौतें | उत्तर प्रदेश में अनुमानित मौतें |
| 2020 | 7,70,230 | 1,11,491 |
| 2021 | 7,89,202 | 1,14,128 |
| 2022 | 8,08,558 | 1,16,818 |
इन आंकड़ों में भी हर साल बढ़ोतरी दिखाई देती है। बाद में संसद में पेश किए गए वर्ष 2025 तक के अनुमानों में भारत में कैंसर से मौतों की संख्या 8,68,588 और उत्तर प्रदेश में 1,25,184 बताई गई।
किसी भी खबर में मौतों के आंकड़े देते समय संबंधित वर्ष और सरकारी स्रोत का उल्लेख करना जरूरी है। वर्ष 2022 के आंकड़े को वर्ष 2025 का आंकड़ा बताना तथ्यात्मक गलती होगी।
कैंसर के मामले बढ़ने के पीछे क्या कारण हैं?
स्वास्थ्य मंत्रालय के संसदीय जवाब में ICMR की ओर से कैंसर के अनुमानित मामलों में बढ़ोतरी के कई कारण बताए गए हैं। इनमें बेहतर जांच तकनीक, बीमारी का अधिक पता चलना, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और बुजुर्ग आबादी का बढ़ता हिस्सा शामिल हैं।
स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने और इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने की प्रवृत्ति में वृद्धि से भी अधिक मामले सामने आ सकते हैं। तंबाकू और शराब जैसे जोखिम कारक भी कैंसर की रोकथाम के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, सभी प्रकार के कैंसर के कारण एक जैसे नहीं होते। किसी व्यक्ति में कैंसर होने का कारण केवल इन सामान्य कारकों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
कैंसर की दवाएं सस्ती करने के लिए केंद्र सरकार का क्या फैसला है?
केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग ने 8 अक्टूबर 2026 को गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन नियंत्रण का दायरा बढ़ाने की मंजूरी की घोषणा की।
सरकार का उद्देश्य ऐसी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण बढ़ाना है, जिन पर पहले से आवश्यक दवाओं जैसी मूल्य सीमा लागू नहीं थी। दवा की आपूर्ति शृंखला में अलग-अलग स्तरों पर जुड़ने वाले व्यापार मार्जिन से मरीज के लिए अंतिम कीमत बढ़ सकती है।

- गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 प्रतिशत तक सीमित करने की मंजूरी।
- कुछ दवाओं की कीमतों में अधिकतम 70 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना का अनुमान।
- मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का सरकारी अनुमान।
- दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए निर्माताओं को मौजूदा उत्पादन स्तर कायम रखने की शर्त।
- ब्रांडेड, जेनेरिक, देश में निर्मित और आयातित दवाओं सहित विभिन्न श्रेणियों को व्यवस्था में शामिल करने की योजना।
सरकार की ओर से बताई गई 70 प्रतिशत तक संभावित कमी का मतलब यह नहीं है कि हर कैंसर दवा की कीमत निश्चित रूप से इतनी ही घटेगी। इसी तरह, 2,500 करोड़ रुपये की बचत भी अनुमान है, प्रत्येक मरीज को मिलने वाली तय रकम नहीं।
क्या सभी दवाओं पर नई कीमतें लागू हो गई हैं?
सरकारी घोषणा में व्यवस्था को मंजूरी दिए जाने की बात कही गई है। इसके बाद स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के अधीन विशेषज्ञ समिति को इस व्यवस्था में शामिल की जाने वाली दवाओं की सूची को अंतिम रूप देना है। इसके बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की ओर से निर्णय और अधिसूचना की प्रक्रिया जरूरी है।
इसलिए 8 अक्टूबर 2026 को मंजूरी की तारीख कहना सही है, लेकिन इसे सभी संबंधित दवाओं की नई कीमतें लागू होने की तारीख नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक कीमतों में बदलाव की पुष्टि के लिए अंतिम दवा सूची और NPPA की अधिसूचना देखना जरूरी है।
कैंसर की दवाओं को सस्ता करने की पहल कब शुरू हुई?
कैंसर की दवाओं को किफायती बनाने के लिए केंद्र सरकार कई वर्षों से अलग-अलग उपाय करती रही है। इनमें जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता, आवश्यक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और गैर-अनुसूचित दवाओं पर व्यापार मार्जिन की सीमा शामिल है।
2008: जन औषधि योजना की शुरुआत
नवंबर 2008 में केंद्र सरकार के औषध विभाग ने सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जन औषधि योजना शुरू की। बाद में इसका नाम प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) हुआ। इसकी दवा सूची में कैंसर के इलाज से संबंधित दवाएं भी शामिल हैं।
2013: दवाओं के मूल्य नियंत्रण का आधार
ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई। NPPA को निर्धारित दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने का अधिकार मिला।
2019: 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर मार्जिन सीमा
27 फरवरी 2019 को NPPA ने 42 चयनित गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत व्यापार मार्जिन की सीमा लागू की। सरकार के अनुसार, इससे 526 ब्रांड की अधिकतम खुदरा कीमत औसतन करीब 50 प्रतिशत घटी और मरीजों को सालाना लगभग 984 करोड़ रुपये की बचत हुई।
2022: आवश्यक दवाओं की सूची में बदलाव
राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM), 2022 के आधार पर कैंसर की निर्धारित दवाओं के मूल्य नियंत्रण को आगे बढ़ाया गया। वर्ष 2024 में सरकार ने बताया कि कैंसर की 131 दवा फॉर्मूलेशन की कीमतें तय की गई थीं, जिनमें से 120 NLEM 2022 के अंतर्गत थीं।
2024: संसद में सस्ती दवाओं का मुद्दा
26 जुलाई 2024 के लोकसभा प्रश्न संख्या 64 में सांसद हनुमान बेनीवाल और प्रदीप कुमार सिंह ने कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या और दवाओं को किफायती बनाने के उपायों पर सवाल उठाए। जवाब में केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा के मंत्रालय ने मूल्य नियंत्रण, जन औषधि और अन्य योजनाओं की जानकारी दी।
2026: व्यापक मूल्य नियंत्रण को मंजूरी
8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन नियंत्रण का दायरा बढ़ाने की मंजूरी देने की घोषणा की। इस फैसले से सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत का अनुमान बताया गया।
2026 के फैसले का मुद्दा किसने उठाया और मंजूरी किसने दी?
औषध विभाग की 8 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति में महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक के राज्य अधिकारियों, मरीजों तथा नागरिक समाज की ओर से दवाओं की अधिक कीमतों पर चिंता जताए जाने का उल्लेख है। उपलब्ध विज्ञप्ति किसी एक व्यक्ति को पूरे प्रस्ताव का मूल प्रवर्तक नहीं बताती।
मंजूरी केंद्र सरकार की ओर से दी गई। लेकिन उपलब्ध सरकारी विज्ञप्ति के आधार पर किसी एक मंत्री या सांसद को इस पूरे प्रस्ताव का व्यक्तिगत लेखक या अकेला अनुमोदक बताना सही नहीं होगा।
सरकार ने NPPA के बाजार विश्लेषण का हवाला देते हुए गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर औसतन करीब 170 प्रतिशत मार्कअप और कुछ मामलों में 700 प्रतिशत या उससे अधिक मार्कअप की बात कही। इसी तरह की कीमत संबंधी समस्या कम करने के उद्देश्य से व्यापक व्यापार मार्जिन सीमा का फैसला बताया गया।
अब तक कैंसर की दवाओं पर कितनी बचत का अनुमान है?
सरकार ने अलग-अलग उपायों के तहत दवाओं की कीमतों और संभावित बचत से संबंधित आंकड़े दिए हैं।
| सरकारी उपाय | दवाओं का दायरा | सरकारी आंकड़ा |
| आवश्यक दवाओं की मूल्य सीमा | कैंसर की 131 दवा फॉर्मूलेशन | सालाना करीब 294 करोड़ रुपये की बचत |
| 2019 का व्यापार मार्जिन नियंत्रण | 42 चयनित गैर-अनुसूचित दवाएं, 526 ब्रांड | सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत |
| अक्टूबर 2026 में मंजूर विस्तार | गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं का व्यापक दायरा | सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित बचत |
संसदीय जवाबों के अनुसार, वर्ष 2024 में 131 कैंसर दवा फॉर्मूलेशन की कीमतों में वर्ष 2015 के स्तर की तुलना में करीब 20 प्रतिशत कमी बताई गई थी। मार्च 2026 की सरकारी विज्ञप्ति में यह कमी करीब 21 प्रतिशत बताई गई।
इन तीनों बचत की रकम को जोड़कर कुल बचत निकालना सही नहीं होगा। ये अलग-अलग दायरे और समय से संबंधित आंकड़े हैं। वर्ष 2026 की अनुमानित बचत में पहले से लागू मूल्य नियंत्रण उपायों के साथ कुछ ओवरलैप भी हो सकता है।
कितने मरीजों को सस्ती या मुफ्त कैंसर दवाएं मिल रही हैं?
कैंसर के इलाज में दवाओं की कीमतों के अलावा उनकी उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। सरकार ने सस्ती दवाओं, रियायती फार्मेसी और स्वास्थ्य बीमा से संबंधित कई योजनाएं चलाई हैं।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत जेनेरिक दवाएं किफायती कीमत पर उपलब्ध कराई जाती हैं। 26 जुलाई 2024 के लोकसभा जवाब में सरकार ने कैंसर के इलाज से संबंधित 83 उत्पाद जन औषधि केंद्रों की दवा सूची में शामिल होने की जानकारी दी थी।
सरकार के अनुसार, जन औषधि की दवाएं कई मामलों में ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार के कैंसर की हर दवा प्रत्येक केंद्र पर उपलब्ध है। किसी दवा की उपलब्धता उसके फॉर्मूलेशन, केंद्र के स्टॉक और मरीज की चिकित्सकीय जरूरत पर निर्भर करती है।
आधिकारिक वेबसाइट: https://janaushadhi.gov.in/
AMRIT फार्मेसी
Affordable Medicines and Reliable Implants for Treatment (AMRIT) पहल के तहत कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की दवाएं रियायती कीमतों पर उपलब्ध कराने का उद्देश्य है।
वर्ष 2024 के संसदीय जवाब में सरकार ने AMRIT फार्मेसियों के माध्यम से 5,200 से अधिक प्रकार की दवाओं, इम्प्लांट और अन्य चिकित्सा उत्पादों की उपलब्धता का उल्लेख किया था। यह संख्या सभी श्रेणियों के उत्पादों की थी, केवल कैंसर की दवाओं की नहीं।
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB PM-JAY) के तहत पात्र परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित उपचार के लिए प्रति परिवार प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिलता है। कैंसर के उपचार से संबंधित पात्र अस्पताल सेवाएं भी योजना के अंतर्गत शामिल हैं।
योजना का लाभ पात्रता, सूचीबद्ध अस्पताल और निर्धारित उपचार पैकेज के नियमों के अनुसार मिलता है। इसे हर मरीज के लिए सभी दवाओं की बिना शर्त मुफ्त उपलब्धता नहीं माना जाना चाहिए।
आधिकारिक वेबसाइट: https://pmjay.gov.in/
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाएं और जांच
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय मुफ्त दवा पहल और मुफ्त जांच सेवाओं के माध्यम से सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में आवश्यक दवाएं और जांच उपलब्ध कराने का प्रावधान है। कैंसर की आवश्यक दवाएं जिला और उप-जिला अस्पतालों की आवश्यक दवा सूची में भी शामिल की जाती हैं।
हालांकि, किसी विशेष दवा की उपलब्धता अस्पताल की सूची, स्टॉक और मरीज की जरूरत पर निर्भर कर सकती है।
कितने मरीजों को वास्तव में दवाएं मिल रही हैं?
जिन सरकारी दस्तावेजों का इस रिपोर्ट में उल्लेख है, उनमें देशभर में सस्ती कैंसर दवाएं प्राप्त करने वाले अलग-अलग मरीजों की एकीकृत और वर्तमान संख्या नहीं दी गई है।
सरकारी रिकॉर्ड में दवाओं की सूची, मूल्य नियंत्रण, अस्पताल में भर्ती, योजनाओं के खर्च और उपलब्ध सेवाओं से संबंधित जानकारी मिलती है। लेकिन इनसे यह निश्चित रूप से नहीं निकाला जा सकता कि कितने अलग-अलग मरीजों को नियमित रूप से दवाएं मिल रही हैं, कितनों को पूरी जरूरत के अनुसार दवा मिली और कितनों को दवा खरीदने में परेशानी हुई।
इसका अर्थ यह नहीं है कि मरीजों को दवाएं नहीं मिल रही हैं। इसका मतलब केवल इतना है कि उपलब्ध दस्तावेजों से इस सवाल का सटीक राष्ट्रीय आंकड़ा प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
देश में कैंसर के इलाज की कितनी सुविधाएं स्वीकृत हैं?
10 मार्च 2026 को राज्यसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने तृतीयक कैंसर उपचार सुविधाओं को मजबूत करने की योजना के तहत कई संस्थानों और केंद्रों की जानकारी दी।
| सुविधा | स्वीकृत संख्या |
| स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) | 19 |
| टर्शियरी केयर कैंसर सेंटर (TCCC) | 20 |
| वित्त वर्ष 2025-26 के लिए स्वीकृत डे केयर कैंसर सेंटर | 297 |
इसके अतिरिक्त, सरकार ने सभी 22 नए AIIMS में कैंसर उपचार सुविधाओं को मंजूरी देने और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आवश्यक दवाओं तथा जांच सेवाओं का समर्थन करने की जानकारी दी।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी सुविधा का स्वीकृत होना और उसका पूरी तरह चालू होना अलग-अलग बातें हैं। इन संख्याओं को देश में सभी प्रकार के कैंसर अस्पतालों की कुल संख्या भी नहीं माना जाना चाहिए।
कैंसर के आंकड़ों और सरकारी योजनाओं की जानकारी कहां मिलेगी?
कैंसर के मरीजों, दवाओं की कीमतों और इलाज की सुविधाओं से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड देखने के लिए इन आधिकारिक स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है।
1. राज्यसभा का 10 मार्च 2026 का जवाब
प्रश्न संख्या 2037 में वर्ष 2021 से 2025 तक के अनुमानित मामलों, राज्यवार मौतों और कैंसर उपचार सुविधाओं की जानकारी दी गई है।
3. लोकसभा का 26 जुलाई 2024 का जवाब
प्रश्न संख्या 64 में कैंसर की दवाओं के मूल्य नियंत्रण, 131 दवा फॉर्मूलेशन और जन औषधि से संबंधित जानकारी दी गई है।
4. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR)
कैंसर अनुसंधान, राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री और संबंधित रिपोर्टों के लिए आधिकारिक वेबसाइट।
5. औषध विभाग, भारत सरकार
जन औषधि परियोजना और दवाओं की कीमतों से संबंधित सरकारी जानकारी।
दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण का इंतजार
भारत में कैंसर के अनुमानित नए मामले वर्ष 2020 के 13.92 लाख से बढ़कर वर्ष 2025 में 15.69 लाख से अधिक हो गए हैं। वर्ष 2025 में देश में 8.68 लाख से अधिक मौतें अनुमानित हैं। उत्तर प्रदेश में इसी वर्ष 2.26 लाख से अधिक नए मामले और 1.25 लाख से अधिक मौतों का अनुमान है।
